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चेतन भगत का कॉलम:टीकाकरण में हमने क्या गलतियां कीं और उन्हें कैसे सुधार सकते हैं; सबसे बड़ी गलती थी- 2020 में वैक्सीन हासिल करने की चिंता न करना

एक वर्ष पहले
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चेतन भगत, अंग्रेजी के उपन्यासकार हैं। - Dainik Bhaskar
चेतन भगत, अंग्रेजी के उपन्यासकार हैं।

हर भारतीय डरा हुआ है और कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं। आज मैं उन बड़ी गलतियों के बारे में बात कर रहा हूं, जो हमने एक राष्ट्र के रूप में की हैं और जिन्हें टाला जा सकता है। इसमें सबसे बड़ी गलती थी- 2020 में वैक्सीन हासिल करने की चिंता न करना।

आज इजरायल, ब्रिटेन, यूएई और अमेरिका जैसे अनेक देश कोविड से बाहर आ रहे हैं। इसकी मुख्य वजह वैक्सीन अभियान हैं। जबकि, हमने वैक्सीन के स्रोत को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं। हम अवैज्ञानिक बने रहे। यह समझने के लिए कि हमने क्या गलत किया, हम प्रमुख वैक्सीनों की टाइमलाइन को दोबारा देखें।

दो सबसे बड़ी वैक्सीन, बायोएनटेक और मॉडर्ना के विकास का काम जनवरी 2020 में ही शुरू हो गया था। फोसन नामक चीनी फार्मा कंपनी ने बायोएनटेक के विकास के लिए उसमें 13.5 करोड़ डॉलर का निवेश भी कर दिया था। अप्रैल 2020 में फायजर ने बायोएनटेक में साझेदारी कर 18.5 करोड़ डॉलर का निवेश किया। इसलिए वैक्सीन को फायजर-बायोएनटेक वैक्सीन के नाम से जाना गया।

बायोएनटेक को जून 2020 में 100 करोड़ डॉलर यूरोपियन यूनियन से और सितंबर 2020 में 44.5 करोड़ डॉलर जर्मनी से मिले। चीन, यूरोप और अमेरिका ने इसमें भागीदारी की। ऐसे ही कई अन्य वैक्सीनों में हुआ। लेकिन भारत कहीं नहीं था। इस समय भारत क्या कर रहा था? मार्च 2020 में हम थाली बजा रहे थे। जून में हमारी प्राथमिकता सुशांत सिंह कांड था। सितंबर में हम बॉलीवुड के नशे पर चिंतित थे।

अन्य देशों को वैक्सीन बनाने दो, हम बाद में कोई जुगाड़ कर लेंगे, इस रुख की वजह से आज लोग मर रहे हैं। मैं कोई फायजर-बायोएनटेक वैक्सीन की वकालत नहीं कर रहा हूं। पर अनेक देशों ने पहले से साझेदारी करके अच्छी कीमत पर पर्याप्त वैक्सीन सुरक्षित की। हमने नहीं की। असल में दिसंबर 2020 में फाइजर भारत में वैक्सीन की मंजूरी के लिए आया था।

हमने उसे करने के लिए एक लंबी लिस्ट थमा दी। उसने फरवरी 2021 में आवेदन ही वापस ले लिया। क्योंकि हम फायजर को शर्तें नरम करके कुछ लाभ (हे ईश्वर, लाभ) कैसे लेने दे सकते थे। सौभाग्य से निजी संस्थान सीरम ने ऑक्सफोर्ड-एस्ट्रजेनेका के साथ एक अरब खुराक का समझौता कर लिया। इसका 10% भारत के लिए था। जिन कुछ भारतीयों को वैक्सीन लगी है, वह इसी लकी इवेंट के कारण हुआ।

इसके बावजूद हम सीरम को गरियाने लगे, उसे कीमत कम करने कहने लगे (क्योंकि, हे ईश्वर लाभ) और उसके मालिक को सुरक्षा के लिए लंदन जाना पड़ा। देश में वयस्कों को दो अरब खुराकों की जरूरत है। अभी हमारे पास वह नहीं है। हां, हमने एक वैक्सीन बनाई। भारत बायोटेक की कोवैक्सीन एक अच्छी वैक्सीन है। हालांकि, भारत बायोटेक की क्षमता कम है। हमें अच्छी वैक्सीन की बड़ी संख्या में और तेजी से लगाने की जरूरत है।

भारत के लिए वैक्सीन की आवश्यक खुराक हासिल करने के लिए हमें दुनिया की सभी वैक्सीनों की जरूरत है, चाहे देसी हो या विदेशी। यह कहना कि हमें विदेशी वैक्सीन की क्या जरूरत है, ऐसा ही है, जैसे किसी शादी के लिए हमें कैटरर्स की क्या जरूरत है, जबकि मेरी मां बहुत अच्छी रोटी बनाती है।

निश्चित ही वह 10 रोटी बना सकती है, लेकिन हमारे हजारों मेहमान हैं। ऐसे में क्या हम समय पर केटरर को बुक नहीं करते? चुनाव व कुंभ भी ऐसी गलतियां हैं, जिन्हें टाला जा सकता था। हालांकि कोरोना का एकमात्र समाधान उचित वैक्सीनेशन कार्यक्रम ही है। कुल मिलाकर 200 करोड़ वैक्सीन अगले तीन महीनों में लगनी चाहिए।

गलती सुधारें
हमें वैक्सीन हासिल करने के लिए दुनिया भर के हर वैक्सीन उत्पादक या देश को भुगतान करने, बहलाने और सौदेबाजी की जरूरत है। प्रीमियम दर पर भी वैक्सीन की कीमत लॉकडाउन, कष्टों और मौतों की कीमत के सामने कुछ नहीं है। हमने गलतियां की हैं। हम उसे ठीक करें। ताकि अगले तीन महीने में हर वयस्क को वैक्सीन लग जाए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)