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मदन सबनवीस का कॉलम:तीसरी लहर के लिए बिजनेस क्या तैयारियां कर सकते हैं, नियमों में पारदर्शिता पर हो जोर

3 महीने पहले
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मदन सबनवीस, चीफ इकोनॉमिस्ट, केयर रेटिंग्स - Dainik Bhaskar
मदन सबनवीस, चीफ इकोनॉमिस्ट, केयर रेटिंग्स

भारतीय बिजनेस करीब 15 महीनों में दो बार झटके सह चुके हैं, जिनमें दो लॉकडाउन हुए। सवाल यह है कि क्या हमने सबक सीखे? यहां ‘हम’ से मतलब है सरकार, स्थानीय प्राधिकरण, बिजनेस इकाइयां, कानून प्रवर्तन एजेंसियां और लोग। यह जरूरी है क्योंकि अब तीसरी लहर की बात हो रही है।

बिना तैयारी के लागू किए गए पहले लॉकडाउन में बिजनेस को गंभीर नुकसान हुआ था, खासतौर पर सर्विस सेक्टर को। चूंकि लॉकडाउन राष्ट्रव्यापी था, इसलिए असर भी ज्यादा हुआ। दूसरा लॉकडाउन मई में लगभग पूरी तरह लगकर, जून अंत तक चलता रहा। यह अलग था क्योंकि राज्यों ने इसके नियम तय किए। केंद्र ने लॉकडाउन नहीं लगाया, बल्कि न लगाने की सलाह दी क्योंकि इससे लाखों लोगों की आजीविका प्रभावित होती।

एक तरह से उसने स्वीकार किया कि पहले लॉकडाउन ने कई जिंदगियों को नुकसान पहुंचाया। लेकिन राज्यों के अपने नियम थे और भ्रम की स्थिति भी पैदा हुई क्योंकि केंद्र ने राज्यों के बीच सामग्री के आवागमन की अनुमति दी थी, लेकिन राज्यों ने सेवाओं और गैर-जरूरी वस्तुओं पर प्रतिबंध लगाए थे। इससे ई-कॉमर्स में अव्यवस्था रही कि वे जरूरी सामान तो बेच सकते थे, लेकिन गैर-जरूरी नहीं। रेस्त्रां, मॉल आदि को लेकर भी अलग-अलग नियम रहे।

महाराष्ट्र में सकारात्मक नतीजा देखा गया कि पांच स्तर की गंभीरताएं पहचानी गईं और जिलों को तय मापदंडों के आधार पर विभिन्न हाइरार्की में बांटा गया। यह उपयोगी है और सभी राज्यों के लिए प्रारूप की तरह है, जहां स्तर 1 में पूरी आजादी थी और स्तर 5 में बिल्कुल नहीं। राज्यों को बिजनेस में पारदर्शिता के लिए यह मॉडल अपनाना चाहिए।

तीसरी लहर आएगी या नहीं, तय नहीं है। लेकिन राज्य तैयारी कर रहे हैं। यह संकेत है कि किस बिजनेस को, कैसे तैयारी करनी चाहिए। आइए अलग-अलग सेगमेंट देखते हैं। सबसे पहले एसएमई को और विघटन के लिए तैयार रहना होगा और इसलिए लेबर और कैश फ्लो की सावधानी से योजना बनानी होगी। प्रवासी श्रमिकों का मुद्दा उनके लिए दो बार चुनौती भरा था इसलिए रोजगार की किसी भी योजना में इस आकस्मिकता का ध्यान रखना चाहिए। बैंक से कर्ज लेने में भी सावधानी रखनी होगी।

दूसरा, बड़े बिजनेस के लिए निवेश की योजना सावधानी से बने और किसी भी दबी हुई मांग के संकेत को, खासतौर पर सितंबर में, न्यू नॉर्मल न मानें। देखो और इंतजार करो नीति अपनाएं। इंवेंटरी की योजना बनाना जरूरी है क्योंकि इसमें सक्रिय पूंजी लागत शामिल है।

तीसरा, होटल, रेस्त्रां, मॉल, थियेटर और पर्यटन जैसी सेवाओं के लिए और बुरे का अनुमान लगाना होगा। ये सेक्टर पूरे साल दबाव में रहेंगे इसलिए अगले 9 महीने चुनौतीपूर्ण होंगे। बेशक दबी हुई मांग के कारण थोड़ा-बहुत उछाल आएगा, खासतौर पर यात्रा और मनोरंजन में। यात्रा प्रतिबंधों के साथ ईंधन की बढ़ती कीमतों ने कई एयरलाइंस को फ्लाइट संख्या कम करने को मजबूर किया है। रेस्त्रां को 100% ऑक्यूपेंसी पाने में वक्त लगेगा, जबकि होटल भी क्वारेंटाइन यात्रियों के जरिए रेवेन्यू हासिल करने में संघर्ष करते रहेंगे।

स्थानीय प्राधिकरणों का लक्ष्य लोगों का आ‌वागमन सीमित रखते हुए बिजनेस चालू रखने होना चाहिए। जरूरी और गैर-जरूरी वस्तुओं और सेवाओं के बीच अंतर को खत्म करना चाहिए और सीमित घंटों तथा उपस्थिति के साथ, अलग-अलग दिनों में सभी उद्यमों के संचालन की व्यवस्था होनी चाहिए। देखा गया है कि दूसरी लहर में वायरस 15 दिन में ही व्यापक इलाकों में फैल गया था। इसलिए राज्यों को विभिन्न जिलों में गंभीरता का स्तर बताते हुए परिस्थिति के प्रति जागरूकता लानी होगी, ताकि बिजनेस पहले से सुधारात्मक उपाय कर सकें।

एक तरह से यह अच्छा है कि तीसरी लहर को लेकर डर है क्योंकि इससे सभी को लॉकडाउन की नौबत आने से पहले अपनी भूमिका की योजना बनाने में मदद मिलेगी। सबसे जरूरी है कि सभी पांच स्तरों के लिए लॉकडाउन की एसओपी में पारदर्शिता हो। इससे बिजनेस को मदद मिलेगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)