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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:किसको मुजरिम समझें, किसे दोष लगाएं, देश में अपराध और दंड विधान अलग-अलग

एक महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

सिनेमाघर बनाने के लिए लाइसेंस प्राप्त करने की प्रक्रिया जटिल है। इस काम के लिए कई विभागों से प्रमाण पत्र लेना पड़ता है। यहां तक कि संस्था को बंद करने के लिए भी बहुत विभागों से आज्ञा प्राप्त करनी होती है। गोया कि बंदूक रखने का लाइसेंस आसानी से मिल जाता है। बंदूक का लाइसेंस रखने वाले की मृत्यु हो जाने पर उसके उत्तराधिकारी के नाम बंदूक लाइसेंस ट्रांसफर हो जाता है, परंतु सिनेमा मालिक की मृत्यु होने पर उसके उत्तराधिकारी को लाइसेंस ट्रांसफर नहीं होता।

स्क्रीन राइटर और फिल्म निर्देशक बाबूराम इशारा की फिल्म ‘चेतना’ में कॉल गर्ल की व्यथा-कथा प्रस्तुत की गई थी। इस फिल्म में नादिरा ने उम्रदराज महिला का पात्र अभिनीत किया था। व्यवसाय में प्रवेश करने वाली युवती के लिए उम्रदराज नादिरा कहती है कि ‘वह उस युवती में अपना बीता हुआ कल देखती है और उस क्षेत्र में प्रवेश करने वाली युवती, नादिरा में अपना आने वाला कल देख सकती है।’

इस तरह तवायफ उस जादुई मर्तबान की तरह हो जाती है, जिसमें वर्तमान, अतीत और भविष्य देखा जा सकता है। फिल्म निर्माता-निर्देशक करदार की नादिरा अभिनीत फिल्म ‘जादू’ में एक सिपाही और जिप्सी कन्या की प्रेम कथा प्रस्तुत की गई थी, जिसकी प्रेरणा उन्हें एक जर्मन नाटक से मिली थी। ज्ञातव्य है कि करदार का अपने क्षेत्र में इतना दबदबा था कि फिल्म के संगीत निर्देशक नौशाद को फिल्म में संगीत समायोजन के लिए पश्चिमी सिंफनी से प्रेरणा लेनी पड़ी और उन्हें गंवारी ठेका छोड़ना पड़ा था। सभी जानते हैं कि अमेरिका में गन खरीदने या रखने के लिए लाइसेंस नहीं लेना पड़ता।

अमेरिकन बिना बंदूक रखे स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करता। इसी विचार से प्रेरित फिल्म ‘ए हिस्ट्री ऑफ वायलेंस’ बनी है। गन का इतिहास प्राचीन है और भूगोल विराट है। हमारे उत्तरप्रदेश में बिना लाइसेंस के हथियारों का जखीरा मौजूद है। वहां मानते हैं कि ‘वह नागरिक ही क्या जिसके पास कम से कम एक अदद बंदूक नहीं हो और उसके द्वारा अदालत में कोई मुकदमा नहीं दायर किया गया हो।’ फिल्म ‘गोलियों की रासलीला...’ में प्रस्तुत किया गया कि एक बंदूक बाजार है, जहां सब्जियों और फलों से अधिक दुकानों में हथियार बेचे जाते हैं।

उत्तरप्रदेश में चुनाव की घोषणा होते ही अवैध हथियार मंडी में रौनक आ जाती है। वहां आज भी कहावत में यकीन किया जाता है कि ‘सत्ता बंदूक की नली से प्राप्त होती है।’ मैक्सिम गोर्की का कथन है कि ‘हर गोली किसी न किसी महिला को लगती है। कोई महिला पिता खोती है, कोई महिला संतान होती है।

हर हालत में महिला ही निशाने पर होती है।’ बंदूक के ट्रिगर पर अधिकार हमेशा वैचारिक संकीर्णता का होता है। उन उंगलियों का क्या दोष जो बंदूक का घोड़ा दबाती हैं ? कभी निशाने पर गौरी लंकेश होती हैं, कभी विद्वान दाभोलकर होता है। यह सिलसिला तो महात्मा गांधी और जॉन.एफ.कैनेडी से शुरू होता है।

अमेरिकन फिल्म ‘क्लास ऑफ 1984’ में एक स्कूल के सभी छात्र कक्षा में पिस्तौल लिए आते हैं। एक मामूली कहासुनी में एक अमीरजादा अपने साथी को गोली मार देता है। पुलिस वाला पूछता है कि क्या उसने यह हिंसा अपने स्कूल में सीखी? छात्र कहता है कि ‘उसने अपने पिता से सीखा, जिन्होंने बिना आज्ञा लिए एक पड़ोसी को अपने परिसर में आता देखा, तो गोली मार दी थी।’

वहां मान्यता है कि घर और परिसर एक प्राइवेट किला है और बिना आज्ञा के प्रवेश करना निजता भंग करने का अपराध है। हर देश में अपराध और दंड विधान अलग-अलग है। सुभाष कपूर की फिल्म ‘बुरे फंसे ओबामा’ में एक प्रदेश में संचालित अपराध पाठशाला में कम से कम एक कत्ल करने पर ही सदस्य को स्थाई होने का प्रमाण पत्र मिलता है।