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मनीष अग्रवाल का कॉलम:मेट्रो रेल प्रोजेक्ट खर्च का 50-60% क्यों नहीं निकाल पाते

2 दिन पहले
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मनीष अग्रवाल, पार्टनर, प्राइसव - Dainik Bhaskar
मनीष अग्रवाल, पार्टनर, प्राइसव

पिछले 10 सालों में 11 शहरों में मेट्रो शुरू हुई है। जिसकी कुल लंबाई 780 किलोमीटर है और 578 किलोमीटर का निर्माण चल रहा है। अगले कुल सालों में आठ अन्य शहरों में भी हम मेट्रो शुरू होते हुए देखेंगे और 20 अन्य योजना के विभिन्न चरणों में हैं। इससे शहरी सीमाओं का नया आकार लेना जारी रहेगा। हालांकि, मेट्रोरेल की फायनेंसिंग आज भी चिंता का विषय है। निजी फायनेंसिंग के कई मॉडलों के बावजूद इसमें बहुत प्रगति नहीं हुई है।

मेट्रो रेल परियोजनाएं कुल प्रोजेक्ट खर्च का 50-60% निकालने में भी क्यों सक्षम नहीं हैं? शहर के लिए मेट्रो उत्पन्न हुए आर्थिक मूल्य को परियोजना के लिए वित्तीय मूल्य में बदलना बहुत मुश्किल रहा है। किराया पहला ऐसा तरीका है, जिससे आर्थिक मूल्य को वित्तीय मूल्य में बदला जा सकता है। हालांकि पूरी कीमत के आधार पर किराया वसूलना कठिन है और यह सार्वजनिक परिवहन के अन्य तरीकों में भी नहीं हो सकता। पहली बात तो यह है कि ट्रैक की क्षमता का पूरा उपयोग समय के साथ धीरे-धीरे होता है।

इसका मतलब है कि कुछ सवारियों पर ही तय कीमत का बोझ नहीं डाला जा सकता, इससे किराया बहुत अधिक हो जाएगा। इस कीमत को सवारियों से वसूल करना यथार्थवादी नहीं है। इससे कुछ लोग यातायात के वैकल्पिक तरीके को प्राथमिकता देंगे। जन नीति को लेकर एक सवाल भी है, क्या किराया अधिकतम राजस्व के लिए तय होना चाहिए या अधिक से अधिक लोग सवारी कर सकें (या अधिक से अधिक लोगों को लाभ हो)?

लोग अपने यातायात के साधन को कीमत, समय और सुविधा को देखकर ही तय करते हैं। समय और सुविधा के कई पहलू मेट्रो प्रोजेक्ट के नियंत्रण से बाहर होते हैं। पहुंच में आसानी और प्रसार, फीडर सेवा (बस, ऑटो या निजी वाहन) की उपलब्धता पर निर्भर करते हैं। भौतिक ले-आउट और एकीकृत टिकट प्रणाली इसे हासिल करने के कुछ तरीके हैं। पार्किंग की कीमत भी अन्य टूल है, जो सार्वजनिक परिवहन को आकर्षक बनाता है।

सार्वजनिक परिवहन के कई तरीकों को एकीकृत करना अभी एक ऐसा साधन है, जिसका भारत में इस्तेमाल कम हो रहा है। सिटी प्लानिंग को मेट्रो रेल नेटवर्क के साथ एकीकृत करना भी कम हो रहा है। दिल्ली में मेट्रो नेटवर्क के विकास ने शहर के फैलाव को आगे बढ़ाने में मदद की। इससे लोग अपने काम के स्थान से दूर रहने लगे। हालांकि नए बिजनेस क्षेत्र और आवसीय इलाके विकसित नहीं हुए, जिससे लोगों को लंबी यात्रा की जरूरत पड़ी और सभी के एक ही जगह जाने की वजह से मेट्रो में लगातार भीड़ बढ़ती रही।

मेट्रो स्टेशनों के निकट व्यावसायिक और आवासीय क्षेत्रों का विकास अधिकतर शहरों में अब भी प्लानिंग के ही स्तर पर है। इससे क्षमता का अधिकतम विकास होता है और प्रतिकिलोमीटर अधिक किराया भी वसूला जा सकता है। इससे यात्री की जेब पर अधिक भार नहीं पड़ता, क्योंकि यात्रा छोटी होने से टिकट पर कुल खर्च बहुत अधिक नहीं होता। इस विषय के और भी महत्वपूर्ण पहलू हैं, जिनपर चर्चा अगले लेख में की जाएगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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