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शेखर गुप्ता का कॉलम:भारत की पाकिस्तान के प्रति गर्मजोशी क्यों, मोदी सरकार अचानक तालिबान और पाक से बात क्यों कर रही है

3 महीने पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar
शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

जम्मू -कश्मीर के प्रमुख गठबंधन ‘पीएजीडी’ ने दिल्ली में सर्वदलीय बैठक के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निमंत्रण स्वीकार कर लिया तो महबूबा ने बयान जुमलेबाजी करते हुए कहा कि ‘अगर भारत तालिबान से बात कर रहा है तो पाकिस्तान से बात करने में क्या बुराई है?’ सवाल तो अच्छा है, मगर भारत तालिबान से क्यों बात करेगा? तालिबान ने आईसी-814 विमान के अपहरण कांड के दौरान भारत के साथ जैसा अपमानजनक बर्ताव किया उसे भारत कभी नहीं भूलेगा।

तालिबान का पाकिस्तान से जो गर्भनाल वाला जुड़ाव है, उसके चलते तालिबान भी भारत की परवाह नहीं करेगा। तो अब क्या बदल गया है? यही वजह है जिसने हमें पश्चिम की ओर देखने को मजबूर किया। चीन, ‘क्वाड’, हिंद-प्रशांत मसले आदि के कारण पूरब पर तो हम ध्यान दे ही रहे हैं। फिलहाल भारत का रणनीतिक ज़ोर पश्चिम की ओर है।

भारत तालिबान से इसलिए बात कर रहा है क्योंकि वह जीत रहा है। शुरू में मुजाहिदीन, दकियानूसी अफगानों के रूप में उसने अपनी ताकत के चरम पर पहुंचे सोवियत संघ को परास्त किया। ऐसा उसने अमेरिका, पाकिस्तान, सऊदी अरब, चीन आदि की मदद से किया। अब तालिबान के रूप में इसी संगठन ने दुनिया की एकमात्र महाशक्ति को परास्त किया है। ऐसा उसने पाकिस्तान की मदद से किया है। इसकी वजह यह है कि अमेरिकी शासन लक्ष्य को लेकर अस्पष्ट था। क्या वह अल-क़ायदा को नष्ट करना चाहता था? जब तक वह ऐसा करने में सफल हुआ, तब तक अलक़ायदा ‘आईएसआईएस’ बन गया।

आखिर अमेरिका कब अपनी जीत का ऐलान करके वापस लौटता? अगर लक्ष्य अफगानिस्तान को आतंकवाद के अभयारण्य के तौर पर नष्ट करना था, तो यह तब तक नहीं हो सकता था जब तक ऐसा ही लक्ष्य पाकिस्तान में हासिल न हो, अफगानिस्तान की सरहद से लगे विशाल क्षेत्र में ही नहीं बल्कि रावलपिंडी में पाकिस्तानी फौज के मुख्यालय ‘जीएचक्यू’ के आकाओं की सोच में भी।

एक के बाद एक कई किताबों ने साफ बता दिया है कि आईएसआई और पाकिस्तानी फौज ने किस तरह अमेरिका के साथ दोहरा खेल किया। वह पाकिस्तानी मदद के बिना वैसी सफलता नहीं हासिल कर सकता था जैसी अल-क़ायदा के खिलाफ हासिल की। इसलिए वह पाकिस्तान पर इस बात के लिए ज़ोर नहीं डाल सकता था कि वह तालिबान से अपना रिश्ता तोड़े। यही वजह है कि अमेरिका अपनी सबसे लंबी लड़ाई हार कर लौट गया है।

अब अपनी इज्जत बचाने के लिए अमेरिका इसे इस तरह पेश कर सकता है कि उसने अफगानिस्तान को काफी स्थिर हालत में लाने के बाद छोड़ा है और यह कि तालिबान की इस बात पर भरोसा कर सकते हैं कि वह किसी और आतंकवादी नेटवर्क को पनपने नहीं देगा। अब अमेरिका की आखिरी ख़्वाहिश यही होगी कि अफगानिस्तान फिर से भारत-पाकिस्तान की प्रतिद्वंद्विता का अखाड़ा बन जाए।

भारत इस हकीकत को कबूल रहा है। वह अपने पूरब में चाहे कि अमेरिका ‘क्वाड’ में अहम सहयोगी हो और अपने पश्चिम के लिए इसके खिलाफ काम करे, यह नहीं चलेगा। इसलिए भारत तालिबान से संपर्क बना रहा है। यानी भारत-पाकिस्तान को भी रिश्ते ठीक करने पड़ेंगे। अगर तालिबान सत्ता में होगा तो आईएसआई भारत के खिलाफ उसका इस्तेमाल करने के बारे में सोच सकता है। इसके अलावा, भारत या अमेरिका यह नहीं चाहेंगे कि अफगानिस्तान में हालात ऐसे बनें कि पाकिस्तान जीत जाए। यह इस बड़े रहस्य का भी खुलासा कर देता है कि भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम क्यों हो गया है।

कश्मीर में नई पहल इसी का अगला तार्किक कदम है। अब ‘राष्ट्र विरोधी गुपकार गिरोह’ दिल्ली का सहयोगी बन गया है। दोनों पक्ष ने अपने अतिवादी तेवर छोड़े हैं। उम्मीद है कि जम्मू-कश्मीर में केंद्र सरकार जिस नए नेतृत्व को तैयार करने की कोशिश कर रही है, उसके मजबूत होते ही उसे पूर्ण राज्य का दर्जा दे देगी। भारत के सामने कश्मीर घाटी में एक साफ हकीकत मुंह बाये खड़ी है। उम्मीद तो थी कि केंद्रीय शासन के बाद आतंकवाद खत्म हो जाएगा लेकिन लोगों में असंतोष बढ़ने से यह मजबूत हुआ है।

पश्चिम में और दूर जाएं तो ईरान में भी बदलाव हो रहा है। इब्राहिम रायसी जाने-माने रूढ़िवादी, कट्टरपंथी हैं और वे ख़ुमैनी के संभावित उत्तराधिकारी माने जाते हैं। लेकिन बाइडेन प्रशासन चाहेगा कि उनकी राजनीतिक ताकत इतनी बढ़े कि वे उसके साथ परमाणु संधि बहाल करें। ऐसा हुआ तो ईरान को बाज़ार और तेल सप्लाई उपलब्ध हो जाएगी। यह इस क्षेत्र में सबके लिए लाभकारी होगा। भारत में कश्मीर से लेकर मध्य एशिया और ईरान तक एक ही भूभाग है जिस पर बसे लोग गहरे और व्यापक जनसांख्यिकीय, जातीय, धार्मिक सूत्रों से जुड़े हैं।

पूरी तस्वीर इन्हीं वजहों से बदल रही है। कोई भी बड़ा देश नहीं चाहता कि उसके लिए दो मोर्चे खुल जाएं। बाइडेन ने सबसे पहले पुतिन से शिखर बैठक इसलिए की क्योंकि उन्हें एहसास है कि अमेरिका एक साथ रूस और चीन से रिश्ते खराब नहीं रख सकता। इसी तरह, गलवान के बाद मोदी के लिए दो सक्रिय मोर्चे संभालना संभव नहीं है। इसलिए पाकिस्तान के प्रति गर्मजोशी भारत के लिए रणनीतिक अनिवार्यता बन गई।

हारकर लौटा अमेरिका
अमेरिका अपनी सबसे लंबी लड़ाई हार कर लौट गया है। अब अपनी इज्जत बचाने के लिए अमेरिका इसे इस तरह पेश कर सकता है कि उसने अफगानिस्तान को काफी स्थिर हालत में लाने के बाद छोड़ा है और यह कि तालिबान की इस बात पर भरोसा किया जा सकता है कि वह अब किसी और आतंकवादी नेटवर्क को पनपने नहीं देगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)