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रुचिर शर्मा का कॉलम:कोरोना ने लगातार विजेताओं को हराया है, जिस देश ने जीत का दावा किया वहीं दूसरी लहर आ गई

6 महीने पहले
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रुचिर शर्मा - Dainik Bhaskar
रुचिर शर्मा

अक्सर पूछा जाने वाला सवाल है, कौन-से देश महामारी के खिलाफ जीत रहे हैं। इसका एक ही अनुकूल जवाब है। यह महीने पर निर्भर है। वायरस ने लगातार विजेताओं को पराजित और पराजितों को विजेता बनाया है। कुछ समय पहले तक अमेरिका और यूके को ‘गैर-उदारवादी जनवादी’ नेतृत्व में वायरस से लड़ने में अयोग्य माना गया।

अब उनकी ही तेजी से टीकाकरण करने और छुटि्टयों के सुरक्षित होने के लिए सराहना हो रही है। इस बीच एशिया से यूरोप तक जिन देशों की पहले वायरस को रोकने के लिए तारीफ हो रही थी, वे दोबारा तेज संक्रमण या धीमे टीकाकरण से पीड़ित हैं। इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि कैसे तेजी से इन सभी मामलों में सफलता-असफलता का बखान करने के लिए व्यापक राष्ट्रीय और सांस्कृतिक स्टीरियोटाइप इस्तेमाल किए गए, और उतनी ही जल्दी इन्हें भुला भी दिया गया।

जीत की रणनीतियों की तलाश दक्षिण कोरिया और ताइवान से शुरू हुई, जहां कम मामलों का श्रेय ब्यूरोक्रेसी की तैयारियों और अनुशासित समाजों को दिया गया। लगातार 102 दिन तक नया स्थानीय मामला नहीं आने के बाद पिछले सितंबर में थाईलैंड को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मॉडल घोषित किया था।

कई विश्लेषकों ने तो सफाई और सामाजिक स्पर्श से परहेज आदि की थाईलैंड और मेकॉन्ग क्षेत्र की संस्कृतियों को भी श्रेय दिया। भारत में कम मौतों के लिए जीवनशैली से जुड़ी बातों को जिम्मेदार बताया गया। कहा गया कि घनी आबादी में जीवन बीतने, गंदा खाने और पानी पीने से करोड़ों भारतीयों में रोगाणुओं के लिए ‘अंदरूनी इम्यूनिटी’ होती है। फिर पिछले महीने थाईलैंड और भारत में कोरोना के मामले तेजी से बढ़ने लगे।

पश्चिम में भी सफलता की स्टीरियोटाइप कहानियां रहीं, जो ज्यादा नहीं चलीं। स्वीडन में हल्के लॉकडाउन की कई लोगों ने सराहना की। उन्होंने कहा कि देश की ‘अनुपालन की संस्कृति’ के कारण लोग सुरक्षित व्यवहार करेंगे। फिर वहां केस बढ़े और स्वीडन के राजा ने ही अपनी रणनीति को असफल माना।

जर्मनी ने जब पहली लहर को रोका तो मैंने और कई विश्लेषकों ने माना कि यह उसकी असरदार सरकार से लेकर सहकारी संघवाद के कारण हुआ। कई लोगों ने तार्किक आबादी को इसका श्रेय दिया, जिसने ‘सांइटिस्ट इन चीफ’ एंगेला मर्केल की बात मानी। फिर सर्दियों में दूसरी लहर और घातक आई।

शायद कनाडा की तुलना में कोई भी देश बुरी तरह नहीं गिरा। कनाडाई लोगों ने गर्व से बेहतर स्वास्थ्य सेवा और सामुदायिक भावना और ‘समझदार’ राजनीतिक संस्कृति को इसका श्रेय दिया। अब अमेरिका व कनाडा में तेजी से टीकाकरण हो रहा है।

कनाडा में दैनिक केस लोड अमेरिकी दर से ज्यादा हो गया। कनाडाई अब अमेरिका के वैज्ञानिक ज्ञान की प्रशंसा करते हैं। ऐसा ही यूरोपियन कर रहे हैं। लेकिन इतिहास यह तय करेगा कि 2021 के मई में नहीं, बल्कि महामारी के पूरे दौर में राष्ट्रों ने कैसा प्रदर्शन किया।

किसी बड़े देश ने हर्ड इम्यूनिटी हासिल नहीं की है। दोबारा अर्थव्यवस्थाएं खोलना और लॉकडाउन परीक्षण-और-त्रुटि प्रयोग रहे हैं, जो दुनियाभर में अलग-अलग गति से हो रहे हैं। किसी को नहीं पता कि इनका अंत कैसे करना है। टीके वास्तव में चमत्कारिक हथियार हो सकते हैं जो आखिरकार इस लड़ाई को जीतेंगे।

हालांकि, यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ने सावधान किया है कि टीके भले ही प्रभावी हैं, लेकिन अभी यह नहीं समझा गया कि क्या वे सभी वैरिएंट पर काम करेंगे। उसने जीत की घोषणा नहीं की है।

अव्यावहारिक महामारी वैज्ञानिकों को सबक: लड़ाई के बीच में विजेता चुनना एक गलती है। याद कीजिए कि इस महीने नए विजेता घोषित करने की हड़बड़ी में पहले पिछले महीने की जीत के दावे कितने बुरे थे। ध्यान रखें कि वायरस की लंबे समय तक बने रहने की योजना है।

सबसे जरूरी, यह देखें कि सांस्कृतिक स्टीरियोटाइप कितनी बुरी तरह से सफलता-असफलता को बताते हैं। ये कभी देशों के उदय या गिरने का अनुमान लगाने के लिए उपयोगी नहीं हैं। कोरोनावायरस ने फिर उनकी उथली सोच उजागर कर दी है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)