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संजय कुमार का कॉलम:क्या मोदी सरकार महामारी के कुप्रबंधन के दोष से बच पाएगी

2 महीने पहले
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संजय कुमार, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएडीएस) में प्रोफेसर और राजनीतिक टिप्पणीकार - Dainik Bhaskar
संजय कुमार, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएडीएस) में प्रोफेसर और राजनीतिक टिप्पणीकार

इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। ऐसा हो या न हो, लेकिन कुप्रबंधन के लिए केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकार पर दोष डालने की कोशिश कारगर नहीं है। आम आदमी को लगता है कि यह सरकार केवल एक व्यक्ति, नरेंद्र मोदी, चला रहे हैं, इसलिए सरकार के काम में जो भी अच्छा-बुरा होता है, लोगों में इसका श्रेय या दोष नरेंद्र मोदी को देने की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।

जिन्होंने महामारी की वजह से किसी करीबी को खोया है, उनके लिए यह त्रासदी भूलना मुश्किल है। इसमें कोई शक नहीं है वे इसके लिए मोदी को ही दोष देंगे। उधर कई लोग इस समय उन्हें दोष दे रहे हैं, लेकिन गुजरते समय के साथ कई इस पीड़ा को अपनी किस्मत मान लेंगे। जो लोग कोविड से सीधे प्रभावित नहीं हुए, लेकिन डर में जीते रहे, वे भी शायद चीजें सामान्य होते ही यह सब भूलने लगें। अभी ऐसे लोग भी हैं जो व्यक्तिगत रूप से पीड़ित नहीं हैं, पर मोदी से नाखुश हैं, लेकिन वे महामारी की दूसरी लहर को संभालने में कुप्रबंधन के लिए सरकार को सबसे जल्दी माफ कर देंगे।

भारतीयों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है, जीवन की हानि, महंगे इलाज के कारण आर्थिक नुकसान और रोजगार की हानि हुई है। इनमें से कुछ मुश्किलें विभिन्न स्वरूपों में जारी रहेंगी और उन परिवारों के लिए स्थिति बुरी बनी रहेगी, जिन्होंने कमाने वाला सदस्य खो दिया।

सरकार भी महामारी से पीड़ा पर लोगों की प्रतिक्रिया को लेकर अनिश्चित लग रही है। क्या लोग सरकार के प्रति आलोचनात्मक रहेंगे या समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। पिछले कुछ हफ्तों में सरकार की पहल और कार्यों को देखकर मुझे लग रहा है कि सरकार ने पहले ही छवि बनाने का प्रयास शुरू कर दिया है। वह कभी फ्रंटफुट पर आ जाती है, तो कभी बैकफुट पर।

फ्रंटफुट पर तब, जब टूल किट मुद्दे पर कांग्रेस को चुनौती देती है, जिसे लेकर दावा है कि वह सरकार और प्रधानमंत्री की छवि खराब करने के लिए बनाई गई थी और भारतीय स्ट्रेन को मोदी स्ट्रेन कह रही है। लेकिन सरकार तब बैकफुट पर दिखती है जब वह लोगों के विभिन्न वर्गों को खुश करने का प्रयास करती है। किसान पिछले 6 महीने से धरने पर बैठे हैं। हालांकि वार्ता के कई दौर हुए लेकिन हल नहीं निकला।

बढ़ते असंतोष को देख सरकार ने वैश्विक कीमतों के बढ़ने के बावजूद डीएपी खाद पर सब्सिडी 140 फीसदी बढ़ाकर किसानों को खुश करने की पहल की। केंद्र सरकार ने कीमत बढ़ने का पूरा बोझ खुद वहन करने का फैसला लिया है। यह उल्लेखनीय है कि डीएपी यूरिया के बाद सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली खाद है। प्रधानमंत्री ने पीएम-किसान योजना की आठवीं किश्त भी जारी की, जिसके तहत 20,667.75 करोड़ रुपए करीब 9.50 करोड़ हितग्राहियों के खाते में डाले गए।

निम्न वर्ग भी महामारी के दौरान हुई परेशानियों से खासा नाराज लग रहा है। केंद्र सरकार ने शहरी मध्यमवर्ग की अप्रसन्नता पहचानकर तुरंत विभिन्न महंगाई भत्ते बढ़ाए, जिससे केंद्रीय क्षेत्र में काम कर रहे 1.50 करोड़ कॉन्ट्रैक्ट और अनौपचारिक कामगारों को लाभ होगा।

दूसरी लहर के चरम पर होने के समय कुछ समय तक लगभग गायब रहे प्रधानमंत्री मोदी अब फिर कमान संभालते दिख रहे हैं, वह चाह अस्पतालों में बिस्तरों की उपलब्धता हो, ऑक्सीजन सप्लाई या जरूरी दवाएं। वैक्सीन की सप्लाई को लेकर सकारात्मक संदेश और दिलासे दिए जा रहे हैं। हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्ष वर्धन ने डीआरडीओ द्वारा विकसित की गई एंटी-कोविड दवा, 2डीजी का पहला बैच जारी किया।

यह सच है कि सरकार विभिन्न वर्गों को लाभ देने का प्रयास कर रही है, ‘सकारात्मक संदेश’ देने की कोशिश कर रही है कि सरकार संकट में उनके साथ है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पर्याप्त है और समय पर किया गया है। लोकसभा चुनाव अब भी तीन वर्ष दूर हैं। सरकार के पास छवि दोबारा बनाने और चीजों को अपने पक्ष में करने का पर्याप्त समय है। लेकिन सवाल यही है कि क्या लोग महामारी के कुप्रबंधन के कारण मिले दर्द को भूलने के लिए तैयार हैं?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)