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मदन सबनवीस का कॉलम:क्या एक और प्रोत्साहन पैकेज आएगा और हमें उससे क्या मिलेगा?

2 महीने पहले
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मदन सबनवीस, चीफ इकोनॉमिस्ट, केयर रेटिंग्स - Dainik Bhaskar
मदन सबनवीस, चीफ इकोनॉमिस्ट, केयर रेटिंग्स

ऐसी उम्मीद की जा रही थी दूसरी लहर में लगभग सभी राज्यों में लॉकडाउन के बाद सरकार पिछले साल की तरह एक और राहत कार्यक्रम लाएगी। लॉकडाउन की घोषणा राष्ट्रीय स्तर पर नहीं हुई इसलिए तकनीकी रूप से इसका भार केंद्र पर नहीं है। अब सरकार ने संकेत दिए हैं कि प्रोत्साहन पैकेज आ सकता है। लेकिन यह प्रोत्साहन क्या होगा? सरकार की तरफ से यह प्रोत्साहन या तो टैक्स कटौती या व्यय आवंटन के रूप में होता है। यहीं कड़े फैसले लेने चाहिए।

हाल में हुई जीएसटी काउंसिल की बैठक से टैक्स दर को लेकर बहुत उम्मीद नहीं मिली है। इसलिए अप्रत्यक्ष करों में टैक्स राहत की उम्मीद कम है। लॉकडाउनों की वजह से अंतत: टैक्स कलेक्शन पर असर पड़ेगा। अप्रैल में दिखा उछाल निश्चिततौर पर मई और जून में नहीं दिखेगा। इसलिए वस्तुओं और सेवाओं में जीएसटी में कटौती की उम्मीद कम है।

सरकार ईंधन पर भी टैक्स में छूट की इच्छुक नहीं दिखती। लॉकडाउन में कम आवागमन से पेट्रोल की मांग घटी है। गैर-जरूरी वस्तुओं और सेवाओं ने पिछले दो महीनों में प्रतिरोध देखा है जो जून तक जारी रह सकता है। इससे डीजल की मांग भी घटी है। वहीं जीएसटी कलेक्शन बढ़ने के बावजूद ईवे बिल घटे हैं।

इस परिस्थिति में सरकार को प्रत्यक्ष करों में बदलावों पर विचार करना होगा। यहां भी समस्या है। कोविड से पहले के दौर में कॉर्पोरेट टैक्स दर में पहले ही कटौती हो चुकी है और फिर से ऐसा करने की मंशा नहीं होगी। लेकिन एसएमई की मदद के लिए इसपर विचार कर सकते हैं। आयकर दर कम की जा सकती हैं, लेकिन यह सरकार के लिए एक सुनिश्चित किटी है क्योंकि यह वर्ग कभी भी औपचारिक कर के जाल से बाहर नहीं निकल सकता है। इसलिए इस कटौती की संभावना भी कम है।

हमारे लिए अच्छी खबर आरबीआई के सरप्लस का लगभग एक लाख करोड़ रुपए का ट्रांसफर है जो वित्तीय क्षेत्र से सरप्लस ट्रांसफर के रूप में बजट के मुकाबले करीब 46,000 करोड़ रुपए अधिक है। आमतौर पर अनुमान होता है कि ऐसी राशि का इस्तेमाल ज्यादा व्यय पर हो सकता है। लेकिन इस साल ऐसा नहीं होगा क्योंकि टैक्स के रेवेन्यू में और साथ ही शायद विनिवेश तथा स्पैक्ट्रम बिक्री में गिरावट आएगी। इसकी उच्च सरप्लस से आंशिक भरपाई होगी। इसलिए सरप्लस से प्रोत्साहन पर शायद सरकार गंभीरता से विचार न करे।

इसलिए व्यय पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा। यहां भी हम कुछ व्यय विशुद्ध रूप से जनकल्याण के दृष्टिकोण से होंगे। जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में संक्रमण से बिगड़ी स्थिति को देखते हुए सरकार को नरेगा पर खर्च बढ़ाना होगा। साथ ही वैक्सीनेशन को लेकर भी चिंता बढ़ी है। इसमें तेजी लाने के लिए सरकार पर दबाव है। चूंकि टीके के स्थानीय उत्पादकों के पहले लॉट के अनुबंध तय थे, हो सकता है भविष्य के लॉट उसी कीमत पर न मिलें। कोई भी आयात ऊंची कीमत पर होगा। इसलिए दोनों कार्यक्रमों पर कम से कम 20-40,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त व्यय हो सकता है।

सरकार पिछले साल के मोराटोरियम प्रोग्राम और सरकार की गांरटी वाली ऋण व्यवस्था पर गंभीरता से विचार कर सकती है। नीति के स्तर पर सरकार ने ज्यादातर विकल्प खत्म कर लिए हैं, जो पिछले साल आत्मनिर्भर योजना में आए थे।

इस सभी को देखते हुए इसकी संभावना कम लगती है कि इस साल महत्वपूर्ण वित्तीय घाटा होगा। मौजूदा राहत कार्यक्रमों को बढ़ाया जा सकता है। लेकिन इन उपायों से परे शायद ज्यादा गुंजाइश न हो क्योंकि राजस्व की स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। राहत उपायों में राज्यों द्वारा सहयोग बुद्धिमानी होगी, जैसा कि महाराष्ट्र और कर्नाटक कर चुके हैं। यही सारे दरवाजे खुले रखने का एकमात्र रास्ता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)