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एन. रघुरामन का कॉलम:बिना व्यापार मूल्यों के, सिर्फ लाभ पर नजर रखने से शायद ही कोई बिजनेस बहुत लंबा चले

12 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

मंगलवार को मेरे सहकर्मी और मैंने नासिक में सादी दाल-खिचड़ी खाने का फैसला लिया। नई पीढ़ी की तरह हमने फूड डिलिवरी ऐप से ऑर्डर करने का सोचा। चूंकि बाहर बारिश हो रही थी और सड़क पर कीचड़ के कारण चलना मुश्किल होता, इसलिए हम ऑनलाइन सेवा पर गए।

ऐप पर 200 से 249 रुपए तक की खिचड़ी दिख रही थी। चूंकि मैं मोबाइल पर लोकेशन ऑन नहीं रखता हूं, इसलिए मुझे डिलिवरी के लिए पता टाइप करना पड़ा। हमें अपनी जगह का पिनकोड और लैंडमार्क नहीं पता था, इसलिए ऐप पर पूरी जानकारी नहीं भर पाए। मजबूर होकर हमें उस रेस्त्रां में जाना पड़ा, जो हमने ऐप पर देखा था और वहां हम हैरान रह गए।

वहां 200 रुपए की खिचड़ी 125 रुपए की थी। हमने दक्षिण से उत्तर भारतीय तक, कई व्यंजनों की कीमतें देखीं। मेन्यू में जो मसाला डोसा 55 रुपए का था, वह ऐप पर डिलिवरी के साथ 125 रुपए का था। इसी तरह 50 रुपए के व्यंजन ऐप पर 100 रुपए में बिक रहे थे।

इससे मुझे वे बिजनेस याद आए जो एक तय लाभ प्रतिशत पर चलते थे। मेडिकल से लेकर किराना दुकानों तक, आपको कुछ डिस्काउंट मिलता था। डिस्काउंट का कोई तय प्रतिशत नहीं होता था लेकिन उत्पाद की कीमत, मुद्रित (प्रिटेंड) मूल्य से कम हो जाती थी। व्यापारियों के लिए यह ‘मैं भी खुश, मेरा ग्राहक भी खुश’ वाली स्थिति होती थी। इस तरह उत्पादकों द्वारा दिया जाने वाला प्रॉफिट मार्जिन ग्राहकों के साथ साझा होता था।

मैंने कभी अपने माता-पिता को दुकानदार से बड़ा डिस्काउंट मांगते नहीं देखा। उन्हें यह अपने आप मिल जाता था क्योंकि वे इन दुकानों के नियमित ग्राहक थे। मेरे पिता की तय दुकानें थीं, फिर वह कपड़े हों, किताबें, रेस्त्रां या किराना। इलेक्ट्रिक सामान खरीदना तब लग्जरी था और इनकी खरीदारी बहुत कम होती थी।

समय के साथ ये दुकानें, खासतौर पर मेडिकल स्टोर को अगली पीढ़ी चलाने लगी, जिसने मार्जिन साझा करना बंद कर दिया और मुद्रित मूल्य पर उत्पाद बेचने लगे। इसीलिए इन डिलिवरी ऐप ने यही डिस्काउंट ग्राहकों को देना शुरू किया और धीरे-धीरे इन दुकानों का बिजनेस छीनने लगे।

जब मेडिकल दुकानदारों को इसका अहसास हुआ कि ज्यादातर ग्राहक दवाएं लेने ऐप्स पर जा रहे हैं, तो इन्होंने फिर हर चीज पर 15% से ज्यादा डिस्काउंट देना शुरू कर दिया और मुफ्त होम डिलिवरी भी देने लगे। लेकिन कुछ ग्राहक अब इन ऐप के प्रति वफादार हो गए क्योंकि उन्हें दो चीजें मिल रही थीं, पहला डिस्काउंट और दूसरा, पर सबसे जरूरी, घर पर किसी भी समय डिलिवरी।

इन ऐप ने धैर्यपूर्वक इंतजार किया कि ग्राहकों का बड़ा हिस्सा इतना आलसी हो जाए कि पानी की बोतल तक ऑनलाइन ऑर्डर करे। जब इन ऐप को लगा कि ग्राहक सुविधा के लिए कीमत चुकाएंगे तो उसने चुपके से डिलिवरी चार्ज जोड़ दिए।

उनके ऐप पर ग्राहकों की बड़ी संख्या ने उन्हें उत्पादक से भी डिस्काउंट मांगने का साहस दे दिया। ईमानदारी से कहूं तो इन ऐप की न दुकानें हैं, इन्हें न किराया चुकाना होता है, न बिजली बिल और न ही बुहत से कर्मचारियों को वेतन देना होता है। मैंने अक्सर देखा है कि जब स्थिति एकतरफा हो जाती है तो कोई बराबरी लाने के लिए नए हथियार के साथ बाजार में उतरता है, जैसे ये ऐप आए।

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