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हरिवंश का कॉलम:क्या ‘डिजाइनर बेबी’ बनाना नैतिक रूप से सही होगा, ‘जीनोम एडिटिंग’ से बदलेगी दुनिया

5 महीने पहले
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हरिवंश, राज्यसभा के उपसभापति - Dainik Bhaskar
हरिवंश, राज्यसभा के उपसभापति

तवारीख में 2020, कोविड अभिशाप के रूप में दर्ज रहेगा। पर 2020 में विज्ञान, मानव नियति को मोड़ देने वाली ‘सौगात’ देने के लिए भी स्मरण रहेगा। इसी वर्ष केमिस्ट्री का नोबेल पुरस्कार दो महिलाओं को मिला। अमेरिकी जेनिफर डॉडना के साथ फ्रांस की माइक्रोबायोलॉजिस्ट एमैनुएल चारपेंटियर को। जेनिफर को श्रेय है, ‘जीन एडिटिंग पद्धति अनुसंधान’ का। इसे ‘क्रिसपर’ भी कहते हैं।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इसे भविष्य का चमत्कार कह रहा है। कोविड से लड़ने में जीनोमिक्स विश्वसनीय साबित हुए हैं। आने वाले दौर में सूक्ष्म वायरसों का हमला हुआ, तो भी मानव इसके बल सफल मुकाबला करेगा। जैव आतंकवाद की चुनौतियों में भी यह प्रभावी होगा।

‘क्रिसपर’ तकनीक मूल वायरस के डीएनए को टुकड़ा-टुकड़ा कर अप्रभावी कर देती है। पिछले 8 वर्षों में लाइलाज बीमारियां ठीक करने के लिए इस तकनीक के दो दर्जन से अधिक मानव परीक्षण हुए। यह बड़ा प्रभावी साबित हुआ। महज दो वर्षों पहले (2018) ही चीन के एक वैज्ञानिक ने दो जुड़वा बच्चियों की ‘जीन एडिटिंग’ की थी।

उन्हें एड्स कभी न हो, इसके लिए उनके जीन में संशोधन किया था। माना जा रहा है कि सिजोफ्रेनिया, एड्स, कैंसर, दृष्टिहीनता आदि लाइलाज बीमारियों से मनुष्य की भावी पीढ़ी मुक्त हो सकती है। ‘जीन एडिटिंग’ से डिजाइनर बेबी (मनपसंद शिशु) पाने की ख्वाहिश वास्तविकता में बदल सकती है।

क्या इस तकनीक के आम जीवन में प्रयोग की इजाजत मिलनी चाहिए, ताकि हर माता-पिता मनपसंद शिशु पा सकें? यह गंभीर व जटिल सवाल है। क्या इंसान ज्ञान के उस मुकाम पर पहुंच गया है, जहां वह ‘जीनोम एडिटिंग’ से नैसर्गिक मिली कमियों, अधूरेपन या बीमारियों से मुक्त हो सके?

यह प्रश्न मानवता-संसार संबंधी है। प्रकृति जैसे इंसान को गढ़ती है, उसमें बदलाव या परिवर्तन कर हम नए ढंग से गढ़ें या नहीं? लाखों-करोड़ों वर्ष लगे जीव संरचना के स्वाभाविक व नैसर्गिक विकास क्रम में। यह प्रकृति की देन है। आज मानव के पास ‘कोड ऑफ लाइफ’ को हैक करने की योग्यता है। माना जा रहा है, डिजिटल क्रांति का अगला पड़ाव जेनेटिक क्रांति है। पर नैतिक व सामाजिक दृष्टि से यह उलझा सवाल है।

क्या जो सिर्फ इंटेलिजेंट या श्रेष्ठ खिलाड़ी या कलाकार शिशु चाहेंगे, वैसा ही समाज बनेगा? इसमें निजी आजादी व सामूहिक दायित्व का सवाल खड़ा होगा? क्या दुनिया एकरसा होगी? इंसान ही मानव को नया रूप देने की ओर कदम बढ़ाएगा? फिर बाजार का हस्तक्षेप है। इस टेक्नोलॉजी का व्यवसायीकरण है। लाभ-लोभ का द्वंद्व अलग है।

अमेरिका के विशिष्ट पत्रकार हैं, वाल्टर इसाकसन। वह दुनिया के विलक्षण और गंभीर जीवनीकार माने जाते हैं। उन्होंने लिओनार्दो दा विंची, स्टीव जॉब्स की जीवनी लिखी। ‘आइंस्टीन: हिज लाइफ एंड यूनिवर्स’ लिखी। सभी अत्यंत रोचक। जिन इंसानों की जिज्ञासा ने हमें मोहा, जिन्होंने दुनिया को नया मोड़ दिया, उन पर लिखा।

अब वाल्टर इसाकसन ने जेनिफर डॉडना की जीवनकथा लिखी है। ‘द कोड ब्रेकर: जेनिफर डॉडना, जीन एडिटिंग, एंड द फ्यूचर ऑफ द ह्यूमन रेस’। इस पुस्तक में वाल्टर ने जेनिफर की उस उत्कंठा को केंद्रीय विषय बनाया है, जिसका परिणाम है जीन एडिटिंग का ईजाद। वाल्टर मानव समूह के भविष्य पर होने वाले इसके असर को लेकर सकारात्मक हैं। पर मानते हैं कि दुनिया काल के उस मोड़ पर खड़ी है, जहां यह तय होना है कि आने वाले बच्चों के लिए संसार कैसा रहे?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)