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  • Yogi Adityanath BJP Has No Compulsion In The Politics Of Uttar Pradesh, 36% MLA Heavy On 64% MLA In Protest

अभय कुमार दुबे का कॉलम:उत्तर प्रदेश की राजनीति में योगी आदित्यनाथ भाजपा की कहीं मजबूरी तो नहीं, विरोध में 64% विधायक पर 36% विधायक भारी

6 दिन पहले
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अभय कुमार दुबे, सीएसडीएस, दिल्ली में प्रोफेसर और भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक - Dainik Bhaskar
अभय कुमार दुबे, सीएसडीएस, दिल्ली में प्रोफेसर और भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक

अगर भाजपा जैसी पार्टी एक ऐसे मुख्यमंत्री के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का फैसला करे जिसके खिलाफ 64% विधायक हों, तो उस मुख्यमंत्री को क्या कहा जाएगा? ज़ाहिर है कि वह मुख्यमंत्री पार्टी की पसंद नहीं बल्कि मजबूरी होगा। उत्तर प्रदेश की राजनीति में योगी आदित्यनाथ भाजपा की ऐसी ही मजबूरी बनकर उभरे हैं।

पहले भाजपा सोचती थी कि उसने नाना प्रकार की जातियों को साथ लेकर 50% की जो चुनावी हिंदू एकता बनाई है, उसे साधे रखने के लिए बिना जात-पात का यह भगवा वस्त्रधारी योगी काम का साबित होगा। चूंकि उसे प्रशासनिक अनुभव नहीं है, इसलिए पीएमओ और सीएमओ की जुगलबंदी के ज़रिये दिल्ली से उप्र की सरकार नियंत्रित हो सकेगी। साथ ही चूंकि यह योगी नाथपंथियों की गोरख पीठ के मठाधीश हैं, इसलिए इन्हें सारे देश में पार्टी के स्टार-प्रचारक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। नाथपंथी असम से कर्नाटक तक सारे देश में फैले हैं।

दूसरे, मौखिक हिंसा में माहिर और उग्र हिंदुत्व के प्रतीक के रूप में युवा योगी भाजपा के राष्ट्रवादी जनाधार के लिए आकर्षक नज़ारा पेश करते थे। ऊपर से गोरखपीठ कमज़ोर हिंदू जातियों के बीच प्रतिष्ठित भी है। विचारधारात्मक रूप से देखें तो ऊंची जाति (क्षत्रिय) में जन्मे योगी के नेतृत्व में कमज़ोर जातियों की गोलबंदी को हिंदुत्ववादी समरसता के लिए आदर्श की तरह देख सकते थे।

इन्हीं कारणों से भाजपा 2017 के बाद से योगी आदित्यनाथ को कभी सामान्य मुख्यमंत्री के रूप में न देखकर खास हैसियत से नवाज़ती रही। लेकिन, उप्र के चुनाव से छह महीने पहले अब भाजपा को पता चल गया है कि योगी में ऐसा कुछ और भी है, जिसका उसे अनुमान नहीं था। 36% विधायकों ने आलाकमान के प्रतिनिधि से साफ कह दिया है कि अगर योगी को हटाया गया तो 2022 में पराजय निश्चित है। भाजपा की विडंबना है कि उसे 64 पर 36 की यह संख्या भारी लग रही है।

नतीजतन अगला चुनाव योगी के नेतृत्व में ही लड़ने का फैसला हुआ है। अगर ब्राह्मण, कुर्मी, लोधी, राजभर, निषाद और जाट नाराज़ हैं तो बने रहें। शायद भाजपा के रणनीतिकारों को लग रहा है कि यह नाराज़गी विभिन्न युक्तियों से अगले कुछ महीनों में मंद की जा सकती है। पश्चिमी उप्र में अगर गन्ना किसानों का बकाया दिलवा सकें तो उनका रोष पहले जैसा नहीं रह जाएगा। अगर किसी ब्राह्मण को उपमुख्यमंत्री बनवा सकें, तो विकास दुबे एनकाउंटर से पैदा हुए विप्र समाज के क्षोभ का निवारण हो सकता है। बाकी बिरादरियों को भी कुछ न कुछ दे देंगे।

वैसे भी उप्र की हर बिरादरी का राजनीतिक नेतृत्व दो भागों में बंटा है। एक हिस्सा वह है जो संघ की कतारों से निकल कर आया है। वह किसी कीमत पर पार्टी का साथ नहीं छोड़ेगा। एक बड़ा हिस्सा वह है जो फायदे की जुगाड़ में भाजपा के साथ आया था। लेकिन, उसे भी तो अपनी नाराज़गी व्यक्त करने के लिए कोई न कोई राजनीतिक ध्रुव चाहिए। उप्र की विपक्षी शक्तियां आज की तारीख तक वैसे राजनीतिक ध्रुव मुहैया कराने में नाकाम हैं। विपक्ष की कमज़ोरी उप्र में भाजपा के लिए बेचैनियों के बीच राहत का स्रोत बनी हुई है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)