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नवनीत गुर्जर का कॉलम:तेरी गाड़ी, मेरा सिर! समाधान क्या; दुनिया में ऐसा कोई मसला नहीं है जिसका कोई समाधान संभव न हो

12 दिन पहले
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नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर - Dainik Bhaskar
नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

किसानों को आखिर क्या हो गया है? उत्तरप्रदेश में लखीमपुर खीरी की सड़कों में इनके कौन से आम गड़े हैं जो अपना घर, अपना खेत, सबकुछ छोड़कर पुलिस के डंडे खाने पर विवश हैं। कोई राज्य सरकार, कोई प्रशासन यह जानना या समझना नहीं चाहता। हो सकता है, उन किसानों की मांगों में कोई गलती हो, हो सकता है वे कुछ ऐसा मांग रहे हों जो देना मुश्किल हो, लेकिन कोई तो समाधान होगा! दुनिया में ऐसा कोई मसला नहीं है जिसका कोई समाधान संभव न हो। शर्त ये है कि कोई उस तरफ कोशिश करे। चाहे किसान पक्ष, चाहे शासन पक्ष!

आखिर कोई तो वजह होगी कि लगभग सालभर से ये किसान खेत छोड़कर सड़क पर बैठे हुए हैं। उनके सूरज की किरणें धुआं फांक रही हैं। साये पिण्ड छुड़ाकर भाग रहे हैं। उनके घर, जैसे अपना ही पता पूछ रहे हों। बिस्तरों पर सन्नाटा पड़ा सो रहा है। उनका चांद, जैसे पीपल का सूखा पत्ता। उनकी रातें सांय-सांय। ... और चेहरा जैसे चेहरा नहीं, उसका एहसास भर रह गया है। कोई तो इसकी वजह तलाशे! कोई तो तह तक जाने की कोशिश करे!

फिर ये मंत्री या नेता क्या खाते हैं? जिन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता। लखीमपुर खीरी की घटना में कहा जा रहा है कि एक मंत्री के बेटे ने कुछ किसानों को अपनी गाड़ी के नीचे कुचल दिया। हत्या का मुकदमा भी कायम हुआ है। हालांकि सच क्या है, इसका फैसला तो कोर्ट ही करेगा लेकिन क्या उस मंत्री पुत्र को जिंदा लोगों को कुचलते वक्त जरा भी हिचकिचाहट नहीं हुई होगी।

निश्चित रूप से नहीं ही हुई होगी। तभी तो कुचल दिया! तो सवाल ये उठता है कि उसकी भावना, उसकी सहानुभूति, ऐसे किस देश, किस संस्कृति से प्रेरित हैं जो जिंदा लोगों पर गाड़ी चढ़ा देने के लिए उकसाती हैं और किंचित् अफसोस भी नहीं करती! दरअसल, सरकार कोई भी हो, और किसी की भी हो उसका स्वभाव एक जैसा होता है।

लखीमपुर में अगर कांग्रेस सड़क पर आई है तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वह किसान हितैषी है। उसने भी अपने शासन में कई राज्यों में किसानों को बूटों तले रौंदा है। इसलिए राजनीति किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इस समस्या का तो बिलकुल नहीं। समाधान के लिए सहृदयता चाहिए।

कांग्रेस से भी इसकी उम्मीद करना बेमानी ही होगा। दरअसल, सत्ता एक ऐसी किताब है जो अक्षर-अक्षर बनती है और अक्षर-अक्षर टूटती, बिखरती और बदलती है। चुनाव इस किताब का मुख पृष्ठ है। लखीमपुर में तमाम राजनीतिक पार्टियां अपनी चुनावी किताब के लिए आकर्षक मुख पृष्ठ बनाने में लगी हुई हैं। जहां तक लखीमपुर में हुए अमानुषिक कृत्य का सवाल है, यह हर हाल में निंदनीय है और शर्मनाक भी। इसलिए कि हिंसा किसी भी हाल में, किसी भी सूरत में, सही नहीं ठहराई जा सकती।

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