पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर
डाउनलोड करें
अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी अभिनीत फिल्म ‘बुड्ढा होगा तेरा बाप’ के अंतिम दृश्य में एक अपराध दल के सभी सदस्य मार दिए जाते हैं। नायक एक मरियल सदस्य को जीवित छोड़ देता है, उससे कहता है कि अब वह सरगना पद पर विराजमान हो सकता है। कमजोर सदस्य दुख जाहिर करता है कि वह किस पर शासन करे? सारे सदस्य मर चुके हैं, हथियार टूटे हुए हैं, कुरुक्षेत्र में लड़े गए 18 दिवसीय युद्ध के पश्चात केवल महिलाएं, उम्रदराज लोग और कमजोर बच्चे ही बचे थे। युद्ध में शामिल सभी राज्यों के खजाने खाली हो चुके थे। शस्त्र बेचने वालों के पास भव्य भवन और अकूट धन भरा था, परंतु रोटी नहीं थी। बाजार टूट गए थे, व्यापारी अत्यंत दुखी थे। सभी राज्यों में मरघट वाली शांति भांय-भांय कर रही थी। ‘बुड्ढा होगा तेरा बाप’ का नायक रंगीन मिजाज है। वहां लंपट नहीं है, परंतु छेड़छाड़ में उसे मजा आता है। उसके स्वभाव को ठीक से नहीं समझ पाने वाली पत्नी उससे अलग हो जाती है। नायक अपने पुत्र को बचा लेता है और पत्नी से कहता है कि अब उस बुड्ढे को विदा होने दो। नायिका जवाब देती है...‘बुड्ढा होगा तेरा बाप’। सुखांत फिल्म है। बहरहाल, एक प्रांत के शिखर नेता ने बयान दिया है कि उनके प्रांत में आईपीएल क्रिकेट होगा, परंतु दर्शक नहीं होंगे, क्योंकि कोरोना वायरस के इस भयावह दौर में भीड़ जमा होने की इजाजत नहीं दी जा सकती। स्टेडियम में सन्नाटा हो, कोई ताली न बजाए, त्रुटि होने पर गाली न दे तो खेलने का क्या मजा? फिल्म जगत में फिल्मों का प्रदर्शन टाला जा रहा है। हर क्षेत्र में प्राकृतिक आपदा हो, महामारी हो या कोई भी संकट हो, अधिक कष्ट आम आदमी पाता है, परंतु कोरोना वायरस किसी भेद को नहीं समझता। साधन संपन्न और साधनहीन दोनों ही वर्ग वायरस से प्रभावित हो रहे हैं। कोरोना पूरे विश्व को एक गांव में बदल सकता है। याद आती है ‘मेरा नाम जोकर’ के गीत की पंक्तियां- ‘खाली खाली कुर्सियां हैं, खाली-खाली डेरा है, खाली खाली तंबू है, बिना चिड़िया के रैन बसेरा है यह घर न तेरा है न मेरा है।’ विगत कुछ वर्षों से अवाम गैरजरूरी चीजें खरीद रहा है। महंगे मोबाइल सस्ते मोबाइल से अधिक बिक रहे हैं। हमारे इंदौर के मित्र महेश जोशी कहते हैं कि खरीदने की प्राथमिकता को उल्टा कर दिया गया है। उपभोक्तावाद का धीमा जहर अब असर दिखा रहा है। यह तथ्य याद दिलाता है फिल्म ‘चोरी चोरी’ के शैलेंद्र रचित गीत की- ‘जो दिन के उजाले में न मिला दिल ढूंढ रहा है ऐसे सपने को, इस रात की जगमग में खोज रही हूं अपने को।’ काबिले गौर है शब्द ‘जगमग’ का उपयोग। भारत में गर्मी के आगमन से कोरोना वायरस बेअसर हो सकता है। कोरोना से बचाव की दवा खोजी जा रही है। मनुष्य कभी हार नहीं मानता। ज्ञातव्य है कि ‘डेकोमेरॉन’ नामक गल्प का स्पष्ट सार है कि प्लेग फैलने के कारण कुछ लोग पहाड़ की एक गुफा में बस गए हैं। समय व्यतीत करने के लिए हर सदस्य को एक कहानी सुनानी होती है। इन कथाओं का संग्रह है ‘डेकोमेरॉन’। अंग्रेजी के पहले कवि चौसर की ‘पिलग्रिम्स प्रोग्रेस’ भी तीर्थ यात्रा पर जा रहे यात्रियों द्वारा कथा कहने की बात करती है। कथा कहने और और सुनने से भी जिया जा सकता है। आज हम खोखली गहराइयों में जी रहे हैं। सियासत में खो-खो खेला जा रहा है और अवाम आपसी कबड्डी और खो-खो में रमा हुआ है।
Copyright © 2021-22 DB Corp ltd., All Rights Reserved
This website follows the DNPA Code of Ethics.