परदे के पीछे / द्ररावपथी, दरबार और संस्कार

जयप्रकाश चौकसे

जयप्रकाश चौकसे

Mar 14, 2020, 12:29 AM IST

दक्षिण भारत में अल्प बजट में बनी गैर सितारा फिल्म ‘द्ररावपथी’ ने पहले दिन ही अपनी पूंजी वसूल कर ली। गौरतलब है कि इसी फिल्म के साथ ‘दरबार’ नामक सुपर सितारा फिल्म का प्रदर्शन भी हुआ था, परंतु उसे उतने दर्शक नहीं मिले। बॉक्स ऑफिस पर यह प्रकरण दीए और तूफान के बीच का सा द्वंद्व बन गया। ऐसा कई बार हुआ है कि अल्प बजट की सिताराविहीन फिल्में सफल रही हैं। अमिताभ बच्चन के दौर में अमोल पालेकर की फिल्मों ने भी लाभ कमाया है।

यश चोपड़ा की अल्प बजट की फिल्म ‘नूरी’ की कमाई से उनकी बहु सितारा फिल्म ‘काला पत्थर’ के घाटे की भरपाई हुई। दरअसल संगीतकार खय्याम साहब ने नूरी का अकल्पन किया था। उन्हें फिल्म मुनाफे का भागीदार भी बनाया गया था। उनको शिकायत रही कि बंदरबांट के कारण उन्हें अपना पूरा लाभांश प्राप्त नहीं हुआ। खय्याम साहब इतने सरल थे कि उन्हें ज्ञात ही नहीं था कि मुनाफा भी ललाट देखकर तिलक लगाने की तरह होता है। 


इस प्रकरण में सबसे अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि अल्प बजट की सफल फिल्म अंतरजातीय प्रेम विवाह की मुखालफत करती है। फिल्म में संदेश है कि उच्च जाति की कन्या सोच-समझकर प्रेम करे। हिदायत दी गई है कि दलित वर्ग के युवा से दूरी बनाए रखे। फिल्म की बॉक्स ऑफिस पर प्राप्त अपार सफलता यह तथ्य रेखांकित करती है कि अवाम भी संकीर्णता का हामी है। निदा फाजली ने संकेत दिया था कि मौला बच्चों को गुड़-धानी दे, सोच-समझ वालों को थोड़ी सी नादानी दे।

आज अवाम संकीर्णता के पक्ष में खड़ा दिख रहा है। मराठी भाषा में बनी फिल्म ‘सैराट’ में प्रस्तुत किया गया कि अंतरजातीय प्रेम विवाह करने वालों को उन दोनों के परिवार के सदस्यों ने ही मार दिया था। ‘सैराट’ के अंतिम दृश्य में उन दोनों का अबोध शिशु जीवित है जो संकेत था कि भविष्य में कुरीतियां समाप्त हो जाएंगी। सुना है कि सैराट के हिंदी में बने चरबे में शिशु को भी मार दिया गया, परंतु जख्मी कन्या जीवित है। संभवत: यह सफल फिल्म के भाग दो की संभावना को देखकर किया गया। 


दशकों पूर्व गिरीश कर्नाड की फिल्म ‘संस्कार’ भी सराही गई थी। संस्कार में बचपन से ही दो ब्राह्मण गहरे मित्र रहे हैं। उनमें से एक को दलित स्त्री से प्रेम हो जाता है और वह उसी के साथ रहने लगता है। कालांतर में उस ब्राह्मण की मृत्यु हो जाती है तो वह अपने प्रेमी पति के बचपन के मित्र से पूछने आती है कि क्या मरने वाले का अंतिम संस्कार ब्राह्मणों की विधि से किया जाएगा?

इस प्रकरण पर निर्णय के लिए वह कुछ समय मांगता है, मन के द्वंद्व को शांत करने के लिए वह नदी में स्नान करने जाता है। वहीं स्त्रियों के लिए बने घाट पर गीली साड़ी में उस दलित स्त्री को पानी से निकलते देखता है। वह उसकी देह के सौंदर्य से अभिभूत होकर सोचता है कि उसके बाल सखा ने कितना सुखी जीवन जीया होगा। वह निर्णय देता है कि मृतक का अंतिम संस्कार ब्राह्मण विधि से हो। 


यह तथ्य भी सामने है कि राजनीति में भी चुनाव क्षेत्र में अधिक मतदाता जिस जाति के होते हैं, चुनाव लड़ने का अवसर भी उसे ही दिया जाता है। हमारी गणतंत्र व्यवस्था में जातिवाद ने दरारें बना दी हैं और कालांतर में व्यवस्था ढह सकती है। यह भी चिंतनीय है कि अपेक्षाकृत कम सफल फिल्म जातिवाद पर प्रहार करने वाली फिल्म है। 

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