परदे के पीछे / सपनों के सौदागर और सौदागर के सपने

जयप्रकाश चौकसे

जयप्रकाश चौकसे

Feb 18, 2020, 01:34 AM IST

फिल्मकार और नेताओं की विचार प्रक्रिया में यह बात एक समान है कि दोनों ही अधिकतम की प्रशंसा समान शिद्धत से चाहते हैं। एक दर्शक को खुश करना चाहता है, दूसरा मतदाता को लुभाना चाहता है। इसके लिए दोनों ही सारे जतन और जुगाड़ करते हैं। नेता अपने घोस्ट राइटर से कहता है कि भाषण में कुछ ऐसे वाक्य अवश्य हो कि आवाम तालियां बजाने लगे। फिल्मकार अपने लेखक के साथ मिलकर कुछ ऐसे दृश्य रचते हैं, जिन्हें देखते हुए दर्शक तालियां बजाएं। पटकथा लेखन के स्वांग में इसे ‘क्लैप ट्रैप’ कहा जाता है। कलाकार भी जानते हैं कि किस संवाद के बोलने पर ताली बजाई जाएगी।


इतना ही नहीं, फिल्मकार वस्त्र बनाने वालों से यह चाहता है कि पात्रों की पोशाक में ऐसा कुछ हो कि दर्शक का ध्यान उस तरफ जाए। अपनी रोमांटिक भूमिकाओं के दौर में ऋषि कपूर विविध रंग के स्वेटर पहनते थे और उनके पास स्वेटर का जखीरा बन गया था। राजकुमार ने बलदेव राज चोपड़ा की एक फिल्म में चमड़े के सफेद जूते पहने और हर दृश्य में उनके जूते से ही शॉट शुरू किया जाता था।

फिल्म की सफलता के पश्चात राजकुमार ने फिल्मकार से कहा- ‘जॉनी, सुना है आप आजकल हमारे जूतों की कमाई खा रहे हो’। हरफनमौला कलाकार किशोर कुमार ने सनकीपन की छवि गढ़ी थी, जिसका इस्तेमाल करके वे अनचाहे लोगों को अपने से दूर रखने में सफल हुए, परंतु राजकुमार सौ प्रतिशत स्वाभाविक सनकी व्यक्ति थे।

प्रेमनाथ अपनी दूसरी पारी में सनकी हो गए थे। एक फिल्मकार 18 तारीख को उन्हें अनुबंधित करने आया। उन्होंने 18 लाख मेहनताना मांग लिया। फिल्मकार हाजिर जवाब था उसने कहा कि वह अगले माह की दो तारीख को उन्हें अनुबंधित करने आएगा।


राजेश खन्ना गुरु कुर्ता पहनते थे, क्योंकि उनका पृष्ठ भाग शरीर के अनुपात से अधिक बड़ा था। कपड़ों द्वारा शरीर का बेढंगापन छिपाया जाता है। अब्बास-मस्तान और उनके भाई हमेशा सफेद रंग के कपड़े पहनते थे। दो भाई डायरेक्शन करते, दो भाई पटकथा लिखते थे और एक भाई संपादन करता था। उन्होंने हमेशा विदेशी फिल्मों का देसी चरबा बनाया।

संगीतकार नौशाद के संगीत कक्ष में हमेशा सफेद चादर बिछी होती थी और जरा सा दाग भी नजर आ जाए तो वे काम रोक देते थे। ए.आर.रहमान हमेशा रात में ही धुन बनाते थे। उनके संगीत कक्ष में एक बड़ी मोमबत्ती रखी जाती थी और उसके बुझते ही वे काम बंद कर देते थे। हवा के कारण मोमबत्ती रात 10 बजे ही बुझ जाए तो वे काम करना बंद कर देते थे।

आमिर खान अभिनीत ‘पीके’ में एक संवाद इस आशय का है कि पृथ्वी एक छोटा सा गोला है, उससे बड़े-बड़े अनगिनत गोले हैं और इस छोटे से गोले के एक छोटे से शहर में बैठा यह स्वयंभू आदमी कहता है कि उसने सब कुछ रचा है। सभी देशों के फिल्मकार अधिकतम को पसंद कर आने वाली फिल्म बनाना चाहते हैं। वह फिल्म के विधिवत प्रदर्शन के पूर्व फिल्म का प्रदर्शन बिना किसी पूर्व प्रचार के किसी भी शहर में कर देते हैं और दर्शक प्रतिक्रिया का अध्ययन करते हैं।


मनोज कुमार प्रदर्शन पूर्व अपने मित्रों के लिए एक शो रखते थे। उनके निर्देशानुसार प्रोजेक्शन करने वाले कभी भी इलेक्ट्रिसिटी जाने के बहाने फिल्म रोक देते। इस तरह फिल्म के यकायक रुक जाने पर दर्शक की प्रतिक्रिया उन्हें संकेत देती थी कि कितनी रुचि से फिल्म देखी जा रही थी। फिल्मकारों का हाल उन पांच अंधों की तरह है जो हाथी का वर्णन कर रहे हैं।

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