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बाॅलीवुड फिल्मों में भावहीन मनुष्य अवधारणाएं

8 महीने पहलेलेखक: जयप्रकाश चौकसे
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प्रतीकात्मक फोटो।

अमेरिकन फिल्मकार ग्रीफिथ प्राय: एक फिल्म आधी बनाकर, दूसरी प्रांभ कर देते थे और दूसरी फिल्म का प्रदर्शन पहले होता था, पहले शुरू की गई फिल्म का प्रदर्शन बाद में होता था। उनकी ‘बर्थ ऑफ ए नेशन’ और ‘इंटोलरेंस’ के साथ भी ऐसा ही हुआ। इंटोलरेंस एक सच्ची घटना से प्रेरित फिल्म है। अपने अधिकार के लिए हड़ताल पर बैठे 23 कर्मचारियों को पुलिस ने गोली मार दी थी। एक बार ऐसा भी हुआ है कि मुंबई की कपड़ा मिलों के मालिक ने एक मजदूर संगठन के नेता को भारी रकम दी कि वे हड़ताल को लंबा खींचें, ताकि अन्य प्रांतों से आए मजदूर निराश होकर अपने जन्म स्थान पर लौट जाएं। मुंबई में रहने वाले कर्मचारियों को उनके अधिकार दे दिए जाएंगे। लंबी हड़ताल के समय मिल की पुरानी मशीनों का कबाड़ बेच दिया जाएगा और कालांतर में मिल की जमीन पर बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर दी जाएंगी। मुंबई की फीनिक्स मिल में बहुमंजिला बन गए हैं और सिनेमाघर भी बने हैं। अजीब बात यह है कि मजदूूर संगठन के स्वयंभू नेता का नाम सामंतवादी था। सामंतवादी प्रवृत्तियां अजर-अमर हैं। गणतंत्र का मुखौटा भी वे धारण करती हैं।  मणिरत्नम की अभिषेक बच्चन अभिनीत फिल्म ‘गुरु’ का नायक अपना कॅरियर एक मजदूर की तरह शुरू करता है और अपनी प्रतिभा, परिश्रम तथा जुगाड़ से अनेक मिलों का मालिक बन जाता है। वह चार लूमों का लाइसेंस लेता है और चालीस अवैध लूम चलाता है। वह बिजली और पानी की भी चोरी करता है। उसका प्रतिद्वंद्वी कच्चे माल का आयात करता है। माल के भारत पहुंचते ही केंद्रीय सरकार उसका आयात शुल्क दोगुना कर देती है। इस भुगतान को करने के बाद कपड़े का निर्माण मूल्य इतना अधिक हो जाएगा कि भारी घाटा हो सकता है। कुछ महीनों बाद आयात शुल्क घटा दिया जाता है और गुरु घंटाल वह कच्चा माल खरीद लेता है। इस घटनाक्रम में प्रतिद्वंद्वी की हत्या का मामला भी  शामिल है। कातिल कभी पकड़ा ही नहीं गया। मारियो पुजो ने अपने उपन्यास ‘गॉड फादर’ में लिखा है कि सारे औद्योगिक घरानों की नींव अपराध पर खड़ी की जाती है।  शेयर मार्केट भी भावना से संचालित है। इसमें सरकार का जुगाड़ भी शामिल है कि किस तरह बजट के कारण गिरे हुए शेयर बाजार को उठाने की जुगाड़ की जाए। अमेरिकन शेयर मार्केट का केंद्र वॉलस्ट्रीट है और भारत का दलाल स्ट्रीट। बिचौलिए व्यवस्था के हित में तिकड़मबाजी करते हैं। बलराज साहनी अभिनीत ‘सट्‌टा बाजार’ में इसका विवरण दिया गया था। मारथा नुसबॉम की किताब ‘पॉलिटिकल इमोशन’ में इस आशय की बात कही गई है कि मनुष्य सद्व्यवहार का निर्माण स्वयं करता है और संस्थाएं बुरा आचरण करना सिखाती हैं। पुरातन संस्थाएं यह कार्य सदियों से कर रही हैं। कुछ किताबें बुरे सामाजिक व्यवहार की पाठशालाएं सिद्ध हुई हैं।  भावना की धुरी पर ही जीवन चक्र घूमता है। संकीर्णता के पक्षधर नेता भावना भड़काते हैं। भावना के नाम पर अवाम का शोषण करते हैं। मनुष्य भेड़ों की तरह भावना की लाठी से हांके जाते हैं। भावना का प्रत्यारोपण भी किया जाता है। तमाम दंगे भावना को उकसाकर कराए जाते हैं। भीड़ में भावना का मनोविज्ञान ही काम करता है। सद्व्यवहार करने वाले व्यक्ति के अवचेतन में बुराई और नकारात्मकता का प्रत्यारोपण कर दिया जाता है। इस तरह की शल्यक्रिया करने के लिए पुरातन अफीम का इस्तेमाल क्लोरोफॉर्म की जगह किया जाता है। मायथोलॉजी और मिथ मेकर्स का शासन चल रहा है। झूठ प्रचारित करना एक शास्त्र के रूप में उभरा है। भावना के सामाजिक एवं सार्वजनिक क्षेत्र में दुरुपयोग के कारण अब भावनाहीन मनुष्य एक विकल्प की तरह सामने आता है। अल्बर्त कामू ने भावनारहित प्राणी का आकल्पन विगत सदी के मध्यकाल में ही कर लिया था। खाकसार की कथा ‘एक सेल्समैन की आत्मकथा’ का पात्र भी शवयात्रा में शामिल होने से पहले अपनी आंख में प्याज के रस की दो बूंद डाल लेता है। हुक्मरान जनसभा में मगरमच्छ के आंसू बहाता है, अवाम पर इन आंसुओं का इतना असर होता है कि वे भूख और बेरोजगारी के कष्ट भूल जाते हैं। 

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