परदे के पीछे / सार्थक, सकारात्मक और सानंद फिल्म है 15 अगस्त

जयप्रकाश चौकसे

जयप्रकाश चौकसे

Apr 17, 2019, 12:01 AM IST



Has a meaningful, positive and pleasurable film August 15
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Has a meaningful, positive and pleasurable film August 15
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माधुरी दीक्षित नेने ने मराठी भाषा में एक फिल्म बनाई है, जो यूट्यूब पर प्रदर्शित हो चुकी है। कथा इस तरह है कि मुंबई की एक झोपड़पट्टी में 15 अगस्त का उत्सव मनाया जा रहा है। झंडा गाड़ने के लिए जमीन में एक छोटी गोलाई का संकरा गड्डा खोदा गया है। बच्चे वहां कंचे खेल रहे हैं।  एक कंचा उस गड्ढे में गिर जाता है। बालक अपना हाथ डालता है परंतु हाथ बाहर नहीं निकाल पाता। जीवन में हम कभी अच्छी नीयत से काम करना चाहते हैं परंतु फंस जाते हैं। यह जरूरी नहीं है कि नेक इरादे हमेशा अच्छे नतीजे ही दें। वहां जमा भीड़ सुझाव देती है। जितने लोग जमा है, सभी अलग-अलग सुझाव देते हैं। फायर ब्रिगेड को भी सूचना दी जाती है।

 

बस्ती में एक गरीब पेंटर है, जो ब्राह्मण कन्या से प्रेम करता है। कन्या का विवाह एक आप्रवासी भारतीय से होने वाला है। उसने कहीं कन्या की तस्वीर देख ली थी। कन्या का परिवार प्रसन्न है कि वह शादी करके अमेरिका में बस जाएगी। कन्या और विवाह के लिए आतुर आप्रवासी एक रेस्तरां में जाते हैं। कन्या दलित प्रेमी की बात बताकर कहती है कि वह उसके प्रेमी की एक पेंटिंग खरीद ले और इस उपकार के एवज में वह उससे शादी कर लेगी। आप्रवासी कहता है कि वह पेंटिंग खरीद लेगा और परिवार को राजी करके उसकी शादी भी उसके प्रेमी से करा देगा। वह जानता है कि वह अपने प्रेमी को कभी नहीं भूल पाएगी। वे दोनों लौटते हैं और सारा सच बता देते हैं। वह अपनी लाई हीरे की अंगूठी भी गरीब प्रेमी को देता है, जो उसके कांपते हाथों से गिरकर उसी गड्ढे में गिर जाती है, जिसमें बालक का हाथ फंसा है। किसी तरह हाथ बाहर निकाला जाता है। कंचे के साथ हीरे की अंगूठी भी निकल आती है। प्रवासी युवा दलित की पेंटिंग खरीद लेता है और कन्या के दलित प्रेमी से विवाह का रास्ता भी बना देता है। इस सब में सुबह से शाम हो जाती है और झंडा वंदन भी किया जाता है। ‘पंद्रह अगस्त’ नामक इस फिल्म को अभिजीत जयकर ने निर्देशित किया है।


गौरतलब है कि सुपर सितारा माधुरी दीक्षित ने अमेरिका में बसे डॉ. नेने से विवाह किया है और कुछ वर्ष अमेरिका में बिताकर दोनों भारत में ही बस गए हैं। ऐसा कहा जाता है कि हाथों में कंपन होने के कारण डॉ. नेने ने सर्जरी छोड़ दी है और वे एक मेडिकल कॉलेज में बिना कोई मेहनताना लिए पढ़ाते हैं। इन्हीं दिनों दिखाए जा रहे सीरियल ‘लेडीज स्पेशल’ में सर्जन नायक के साथ ऐसा ही कुछ होता है। अफसानों में यथार्थ ऐसे ही प्रवेश करता है। हमारा राजनीतिक यथार्थ अफसाने की तरह काल्पनिक है। बहरहाल, नेने दंपती की फिल्म में प्रवासी युवा का दरियादिल होना तो स्वाभाविक है। दरअसल, व्यक्तियों का श्रेणीकरण और मिजाज का साधारणीकरण नहीं किया जा सकता। कुछ प्रवासी भारतीय चुनावों को भी प्रभावित करते हैं। कुछ प्रवासी आधुनिकता के सैटेलाइट  को पकड़ने का प्रयास करते हैं और पंखविहीन  इन लोगों की पकड़ में आधुनिकता का सैटेलाइट नहीं आता और इस प्रक्रिया में उनके पैरों के नीचे से उनकी पारम्परिकता की जमीन भी खिसक जाती है।


बहरहाल, ओ’हेनरी की कथा ‘लास्ट लीफ’ में एक बीमार कन्या के मन में भ्रम प्रवेश कर गया कि दरख्त से आखिरी पत्ता गिरते ही वह मर जाएगी। पतझड़ का मौसम है। बस्ती में रहने वाला एक पेंटर, जो अपनी एक पेंटिंग भी नहीं बेच पाया था वह बरसती रात में वृक्ष की एक टहनी पर पत्ता पेंट कर देता है। तूफानी रात के बाद सुबह होती है। लड़की पत्ता देखती है। उसमें जीवन के प्रति विश्वास लौट आता है। उसके भ्रम पत्ते के मानिंद झड़ जाते हैं। वह दोगुने जोश से जीने लगती है। उधर बूढ़ा असफल पेन्टर निमोनिया का शिकार होकर मर जाता है। सफलता के छलावे में जाने कितने लोग अपना सबकुछ गंवा देते हैं। इस फिल्म में विकास के दावे का खोखलापन भी उजागर होता है कि एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी धारावी आज भी कायम है। आज भी बच्चों के कंचे गड्ढों में गिर जाते हैं। आप्रवासी का प्रवेश परीकथा के समान है। यह फिल्म दर्शक को ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ की भी याद दिलाती है। बहरहाल, माधुरी नेने और उनके पति को सार्थक सानंद फिल्म बनाने की बधाई। पूरी फिल्म में हास्य की धारा प्रवाहित है।

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