परदे के पीछे / ‘इंडिया सॉन्ग’ : एक महिला के प्रतिरोध की फिल्म

जयप्रकाश चौकसे

जयप्रकाश चौकसे

Feb 10, 2020, 12:15 AM IST

मार्गरेट डुरास की अमेरिकन फिल्म ‘इंडिया सॉन्ग’ 1975 में प्रदर्शित हुई थी। भारत में वह दौर आपातकाल का था। कथा भारत में स्थित ब्रिटिश दूतावास में काम करने वाली स्त्री एना मारिया स्ट्रेटर की है। कथासार यह है कि राष्ट्र और महिलाएं हर तरह के दबाव का सार्थक विरोध कर सकती हैं।

वह स्त्री दूतावास के परिसर के बाहर नहीं जाती। उसके अवचेतन में कुछ रहस्यमयी कराह हमेशा ध्वनित होती रहती है। उसके अपने जीवन में कोई अभाव या कष्ट नहीं है, परंतु अजनबियों की पीड़ा उसे हमेशा सालती है। अजनबियों की वह हमदर्द अनचाहे ही हो गई है।


फिल्मकार शिवम नायर जिनकी तापसी पन्नू अभिनीत ‘नाम शबाना’ सफल सार्थक फिल्म थी, की एक पटकथा पाकिस्तान में स्थित भारतीय दूतावास पर केंद्रित है। घरेलू हिंसा और दंगों के कारण दूतावास की इमारत खाली कराई गई और ताला लगा दिया गया। इस आपाधापी में एक भारतीय महिला कर्मचारी भीतर ही रह गई।

वह अपने काम में इस तरह डूबी हुई थी कि उसे वास्तविकता का भान ही नहीं हुआ। वह कई दिनों तक नितांत अकेली कमरे में बंद रही। ग्वालियर की रेणु शर्मा ने उस स्त्री की मनोदशा पर गीत लिखा था, ‘दीवारों पर सीलन जल्दी बयां नहीं होती, कान तो होते हैं, परंतु उनकी जुबां नहीं होती, आवाजें लेकर गूंगे हैं इस बस्ती में लोग, सबके अंदर दीमक सबको एक ही रोग, दिल ने जब ढांढस पाया, एक यही दीवार का साया, दीवारों पर लिखा लेता है जो दुनिया से कह नहीं पाया, सुनते आए थे कि इनमें जां नहीं होती, कान तो होते हैं, परंतु दीवारों की जुबां नहीं होती।’

बहरहाल पटकथा पर फिल्म अभी तक बन नहीं पाई। हर फिल्म के लिए कुछ जतन, कुछ जुगाड़ करने पड़ते हैं। अधूरी रही फिल्में और पटकथा लिखने के बाद नहीं बन पाने वाली फिल्मों की संख्या प्रदर्शित फिल्मों से अधिक है।


‘इंडिया सॉन्ग’ की कुछ शूटिंग श्रीलंका में हुई थी। ज्ञातव्य है कि दीपा मेहता की फिल्म ‘वाटर’ की शूटिंग हुड़दंगियों ने बनारस में नहीं होने दी तो दीपा मेहता ने श्रीलंका में शूटिंग की। वहां कुछ साम्य बनारस से है और कमी को सेट लगाकर पूरा कर लिया जाता है। ज्ञातव्य है कि जॉन अब्राहम अभिनीत फिल्म ‘मद्रास कैफे’ की शूटिंग भी श्रीलंका में हुई थी। फिल्म में लंदन स्थित मद्रास कैफे में राजीव गांधी की हत्या का षड्यंत्र रचा गया, ऐसा प्रस्तुत किया गया था। डेविड लीन की फिल्म ‘द ब्रिज ऑन द रिवर काई’ की शूटिंग भी श्रीलंका में हुई थी। 


एक दौर में हिंदुस्तानी फिल्मों के गीतों का प्रसारण रेडियो सीलोन से होता था। अमीन सयानी की बिनाका गीतमाला बहुत लोकप्रिय थी। कहा जाता है कि अमेरिका, श्रीलंका में ‘वॉइस ऑफ अमेरिका’ नामक रेडियो प्रारंभ करना चाहता था। यह प्रस्तावित प्रचार तंत्र एशिया की राजनीति को प्रभावित कर सकता था। रूस ने भारत पर यह दबाव बनाया कि श्रीलंका में अमेरिकन रेडियाे स्थापित नहीं हो पाए।

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सा कहा जाता है कि भारत ने आपरोक्ष रूप से लिट्‌टे नामक संस्था की सहायता की। उद्देश्य स्पष्ट था कि श्रीलंका में अशांति फैलते ही अमेरिका अपना प्रस्तावित रेडियो स्टेशन बनाने का विचार रद्द कर देगा। यह भी कहा जाता है कि बोफोर्स सौदे का कमीशन लिट्टे को सशक्त करने के लिए दिया गया था।


राजनीति के सारे रहस्य कभी उजागर नहीं होते। कुछ तो देश की सुरक्षा के लिए गोपनीयता बनाए रखी जाती है और कुछ गलतियों को ढांके रखने के लिए किया जाता है। कुटि्ठया में गुड़ फोड़ा जाता है कि कहीं अवाम हकीकत जान न ले। ओलिवर स्टोन राजनीति पर ‘जॉन एफ के’ बनाई थी।

उनकी फिल्म ‘पैटन’ भी महान मानी जाती है। हमारे यहां प्रकाश झा ने ‘मृत्युदंड’ और ‘गंगाजल’ बनाई, परंतु उनकी रणबीर कपूर और कटरीना कैफ अभिनीत फिल्म ‘राजनीति’ तो ‘गॉडफादर’ का चरबा सिद्ध हुई। व्यवस्था शासित सेंसर बाेर्ड भी इसकी आज्ञा नहीं देता। 


डेविड लीन की फिल्म ‘द ब्रिज ऑन द रिवर काई’ में एक क्रांतिकारी से मिलने उसकी बहन आती है। यह महिला अपने समाज कल्याण कार्य के लिए अवाम द्वारा पूजी जाती है। क्रांतिकारी भाई, बहन के बैग में एक बम रख देता है। बहन यह नहीं जानती। क्रांतिकारी का एक साथी पूछता है कि यह काम उसने क्यों किया?

क्रांतिकारी जवाब देता है कि जब उसकी बहन पकड़ी जाएगी तो अवाम में आक्रोश बढ़ेगा और यह आक्रोश हमारी क्रांति की सफलता के लिए आवश्यक है। क्रांति की लाल सड़क पर इस तरह की कुर्बानी दी जाती है। कभी-कभी शहादत का लेखा-जोखा उजागर ही नहीं होता। यह बताना कठिन है कि ‘इंडिया सॉन्ग’ का कोई प्रिंट उपलब्ध है या नहीं है। मनुष्य की तरह फिल्में भी लापता हो जाती हैं।

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