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परदे के पीछे / जीना यहां, मरना यहां, जाना कहां?



Live here, die here, go where?
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Live here, die here, go where?

  • मेरे लिए प्रतिदिन लिखना मेरी प्रार्थना और पीड़ा की तरह भी रहा है और सिलसिला जारी है

Dainik Bhaskar

Nov 10, 2018, 12:18 AM IST

आज यह कॉलम अपने अनवरत प्रकाशन के चौबीसवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इसके लिए मैं प्रकाशक और पाठकों को धन्यवाद देना चाहता हूं। इस सिलसिले को बनाए रखने के लिए कुछ लेख मुंबई के नानावटी अस्पताल और कुछ लेख इंदौर के शेल्बी अस्पताल से भी भेजे गए हैं, जहां मैं इलाज के लिए भर्ती रहा हूं। डॉक्टरों का भी शुक्रगुजार हूं जिन्होंने सघन चिकित्सा कक्ष में भी लिखने की इजाजत दी। यह कॉलम सतत संवाद का माध्यम बना, कभी-कभी कवि सम्मेलन व मुशायरे के मंच की तरह भी रहा है। इसे लिखते रहने से मैं निरंतर मंजता रहा हूं। इसमें अभिव्यक्त विचारों से असहमत रहने वालों पाठकों ने भी इसे पढ़ना जारी रखा और अपनी असहमति भी अभिव्यक्त करते रहे। इस तरह यह कॉलम सविनय असहयोग आंदोलन की तरह भी रहा। 
इस कॉलम में कविताएं और शायरी भी उद्‌धृत की गई हैं और सहृदय पाठकों ने मात्रा तथा रकीब, काफिया में हुई भूल के लिए भी क्षमा कर दिया है। अरसे पहले अखबारों ने प्रूफ रीडिंग विभाग बंद कर दिए हैं और लिखते समय मैंने संदर्भ ग्रन्थ काे पुन: देखने का कष्ट नहीं किया, प्राय: स्मृति पर निर्भर रहा हूं और स्मृति का हिरन प्राय: छलांग लगाता हुआ, देखते हुए अनदेखा और अनदेखा होते हुए भी झलक दिखाता रहा है। त्रुटियों के साथ स्वीकारा जाना इसे प्रेम के स्तर पर ले जाता है, क्योंकि प्रेम एकमात्र संवाद है जो कठिनतम परिस्थितियों में जीवित बने रहने की क्षमता प्रदान करता है। इस तरह कॉलम प्रेम-पत्र बन जाता है। 
कॉलम लिखते समय मेरे सामने पाठक मौजूद होता है परंतु वह ‘मिस्टर इंडिया’ की तरह दिखाई नहीं देता। वह अपनी मौजूदगी तरह-तरह से जताता रहता है। लिखते समय कंपकंपी होना, रोंगटे खड़े हो जाना या सिहरन महसूस होना और यदा-कदा उन तालियों को सुन लेना जो बजाई ही नहीं गई है परंतु बजाने की इच्छा दबाई जाने के बाद भी उबर जाने के लिए कसमसाती रही हो, ये अनुभव रहे हैं। मेरे मित्र श्रीराम ताम्रकर ‘नई दुनिया’ में फिल्म परिशिष्ट के संपादक थे और उनके आग्रह पर गाए-बगाए लिखता था। दैनिक भास्कर के इंदौर प्रकाशन के आरंभ से ही साप्ताहिक कॉलम लिखता रहा। अखबार प्रबंधन द्वारा फिल्म के साप्ताहिक ‘नवरंग’ परिशिष्ट का प्रथम संपादक तीन वर्ष तक रहा। रंगीन छपाई के लिए उसे इंदौर से हटाया गया तो कुछ माह तक मुझे बिना काम के ही परिश्रमिक दिया गया। 
एक दिन श्री सुधीर अग्रवाल ने मुझसे प्रतिदिन प्रकाशित होने वाला कॉलम प्रारंभ करने को कहा सो मुझे लगा कि यह काम महीने भर से अधिक चल नहीं पाएगा। तत्कालीन संपादक श्रवण गर्ग ने कहा कि पाठक को नई जानकारियां देते हुए उनका मनोरंजन करें, साथ ही उन्हें अपने विचार प्रक्रिया को जगाए रखने का संदेश भी दें गोयाकि एंटरटेन, इन्फॉर्म एंड एनलाइटन करें। 
पाठकों में इसकी लोकप्रियता ही इसे ऊर्जा देती रही है। इस कॉलम के धोबीघाट पर विविध वस्त्र धोए जाते रहे हैं और वस्त्रों की गंदगी भी घाट के जल को प्रदूषित नहीं कर पाई है वरन ज्यों-ज्यों गंदगी धाेई गई त्यों-त्यों जल निर्मल होता गया है। इसके पाठक मुझे किस तरह मांजते रहे इसकी बानगी इस तरह है कि एक दिन विदिशा में रहने वाले एक पाठक मिलने आए। उन्होंने कहा कि वे महज आठवीं कक्षा तक ही पढ़े हैं और इस कॉलम में लिखी कई बातें उन्हें समझ में नहीं आतीं परंतु उन्हें महसूस होता है कि इसमें कुछ सार है। इस तरह यह शैलेंद्र द्वारा विमल रॉय की ‘मधुमति’ के गीत की तरह बन जाता है- ‘मैं नदिया फिर भी मैं प्यासी, भेद ये गहरा बात जरा सी’।
खाकसार के लिए विष्णु खरे और हेमचंद्र पहारे सरहदी इलाकों में रहने वाले उन पड़ोसी मित्रों की तरह रहे, जो अवसर देखते ही आक्रमण करने से नहीं चूकते। प्रवीण प्रकाशन नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित एक संकलन की भूमिका में विष्णु खरे लिखते हैं- ‘जयप्रकाश तिहरी कठिन प्रतिबद्धता के साथ लिखता है। फिल्म जगत के प्रति, भारतीय समाज के प्रति और हिंदी पाठक के प्रति। अपने अखबार के प्रति उसका पेशेवर उत्तरदायित्व है, सो अलग। अपने कॉलम में वह लगातार विश्व साहित्य से, समाजशास्त्र और राजनीति से लेता चलता है। वह हिंदी सिने-विश्व की ‘ह्यूमन कॉमेडी’ का यथार्थवादी ‘एम्यूज्ड’ दर्शक है, उसका गुलाम नहीं। उसका पाठक यह महसूस करता है कि मानो उसी के साथ स्टूडियो की सैर कर रहा है, वह फिल्म जगत की दावतों में उसके साथ शरीक है। जयप्रकाश इनसाइडरों का इनसाइडर है और वह अपने पाठकों को अंत: पुरों के अंत तक साथ ले जाता है।’ प्रवीण प्रकाशन द्वारा जारी ‘सिनेमा का सच’ की भूमिका निदा फाज़ली ने लिखी है वे लिखते हैं, ‘परदे के पीछे कई पात्रों और घटनाओं से जुड़े संदर्भ और इन संदर्भों में शामिल चलते-फिरते समय को इस तरह दर्शाया गया कि पुस्तक सिनेमा संबंधी कॉलमों का संकलन न होकर एक नए ढंग का उपन्यास रचती महसूस होती है।’
विष्णु खरें और निदा फ़ाज़ली मेरे मित्र रहे हैं। अतः उनके द्वारा की गई प्रशंसा को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। मेरे लिए प्रतिदिन लिखना मेरी प्रार्थना और पीड़ा की तरह भी रहा है और सिलसिला जारी है। मनोरंजन जगत का मंत्र है कि ‘शो मस्ट गो ऑन’ इसलिए दिन-प्रतिदिन लिखता हूं। 
 

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