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आ गया मांजा सूतने और पतंगबाजी का मौसम

7 महीने पहलेलेखक: जयप्रकाश चौकसे
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प्रतीकात्मक फोटो।

पतंग उड़ाने का उत्सव आ गया। आकाश में रंग-बिरंगी विभिन्न आकार की पतंगे हवा से अठखेलियां करती नजर आएंगी। एक दौर में पतंगबाज अपना मांजा खुद सूतते थे। अब सुता-सुताया मांजा इंस्टैंट नूडल्स की तरह उपलब्ध है। पतंग के पैतरे अजीब हैं। खिलाड़ी जानता है कि कितनी ढील देनी है और कब डोर खींच लेनी है। पतंगबाज के साथ उसका चरखी पकड़ने वाला साथी होता है। डोर चरखी में बंधी होती है। पहला भाग मांजे से सुता होता है, दूसरे भाग में सामान्य डोर होती है। चतुर पतंगबाज कच्ची डोर वाले हिस्से पर ही अपनी मांजे से सुती डोर से पेंच लड़ाता है। कुछ लोग कटी हुई पतंग को लूटने में आनंद उठाते हैं। कटी पतंग के पीछे भागते लोग आपस में उलझ जाते हैं और जिस कटी हुई पतंग के लिए सारी जद्दोजहद की थी, वह आपसी विवाद में फट जाती है। उड़ाने के पहले पतंग में धागे से त्रिकोण बनाया जाता है। संतुलन होना जरूरी है। अगर पतंग एक और झुकी हो तो उसे दुरुस्त किया जाता है। पतंग की बनावट में बीच में बांस की मोटी छड़ होती है। कमान अपेक्षाकृत पतली रखी जाती है। संजय लीला भंसाली की सलमान खान और ऐश्वर्या राय द्वारा अभिनीत फिल्म ‘हम दिल दे चुके सनम’ में पतंग उड़ाने का दृश्य है और समवेत स्वर में गाया गीत है- ‘ढील दे दे..दे रे भैया’। गुलशन नंदा के उपन्यास से प्रेरित आशा पारेख अभिनीत ‘कटी पतंग’ में आशाजी को श्रेष्ठ अभिनय के लिए पुरस्कार प्राप्त हुआ था। बेसहारा स्त्री को कटी पतंग माना जाता है और लंपट लोग उसे लूटना चाहते हैं। गुलशन नंदा के उपन्यासों में सतही भावनाओं का ऐसा संप्रत्य घोल होता था कि प्रेम की तितली के पंख उलझ जाते थे। वे लोकप्रियता अर्जित करना जानते थे। दिलीप कुमार को पतंग उड़ाने का शौक था। अपने अभिनय की तरह इस खेल में भी वे पारंगत थे। उनकी छत पर बने एक कमरे में विभिन्न शहरों से प्राप्त मांजा रखा होता था। अलमारी के तीन खंड में विविध साइज की पतंगे ऐसे रखी होती थीं जैसे वाचनालय में किताबें रखी होती हैं। उन्होंने अहमदाबाद, जयपुर इत्यादि शहरों से मांजा और पतंग मंगवाई थीं। सलमान खान को भी पतंग उड़ाने का शौक है। जब फिल्म सिटी या आउटडोर जाते हैं, तब अपने साथ पतंगबाजी का सामान, कंचे और गिल्ली डंडा भी ले जाते हैं। फिल्म ‘सुल्तान’ में सलमान अभिनीत चरित्र पतंग लूटने में माहिर माना जाता है और शर्त लगा करके पतंग लूटता है। प्रेम में उनकी पतंग कई बार कट चुकी है। बहरहाल पतंगबाजी, कंचे खेलना इत्यादि अपने बचपन को सहेजे रखने के जतन हैं। दिलीप कुमार भी अपने पड़ोसी के साथ पतंगबाजी एक बोतल बीयर का दांव लगाकार करते थे। दोनों पड़ोसियों के पास हार जीत का हिसाब डायरी में लिखा होता था और सीजन समाप्त होने पर जीती-हारी बोतलों की बीयर वे साथ बैठकर पीते थे। पतंगबाज के हाथों पर मांजे से कट जाने कि निशान बन जाते थे। क्या इन निशानों से भाग्य रेखा भी प्रभावित होती है? ज्ञातव्य है कि एक दौर में सलमान खान, नरेंद्र मोदी के साथ पतंग उड़ाते तस्वीरों में कैद हुए थे। अब दोनों ही उस पतंगबाजी को भूल गए होंगे। अंतरराष्ट्रीय आकाश में डोनाल्ड ट्रंप और मोदी जी की कटी हुई पतंगे विपरीत दिशा में चलने वाली हवाओं से थपेड़े खा रही हैं। नीचे लूटने वालों का हुजूम नारेबाजी कर रहा है। भारतीय बाजार में जाने कैसे चीन में बनी पतंगें आ जाती हैं। जब तक बाजार चीनी माल से पटा रहेगा, तब तक चीन हम पर फौजी आक्रमण नहीं करेगा। अब बाजार ही कुरुक्षेत्र है। पतंग उड़ाने के मौसम में पक्षी विचलित हो जाते हैं। उन्हें उड़ती हुई पतंग आतंकवादियों की तरह लगती हैं। उनके क्षेत्र का अतिक्रमण हो जाता है। पक्षी इस नए बाज से डर जाते हैं। शाहीन एक पक्षी होता है। दिल्ली के शाहीन बाग में जो छात्र आंदोलन कर रहे हैं, उन्हें शेर का जिगर हासिल है। दिन में पुरुष धरना देते हैं, रात की पाली में महिलाएं धरने पर बैठती हैं। अल्लामा इकबाल लिखते हैं- ‘नहीं तेरा नशेमन (घर) कसरे गुंबद सुल्तानी में, तू शाहीन है बसेरा कर पहाड़ों की चट्टानों पर...’। इकबाल साहब शाहीन पक्षी को स्वतंत्रता का प्रतीक मानते हैं।

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