परदे के पीछे / कैलेंडर के लिए बनाई पेंटिंग्स और नैतिकता

जयप्रकाश चौकसे

जयप्रकाश चौकसे

Feb 21, 2020, 01:18 AM IST

एक सफल लोकप्रिय फैशन गुरु ने एक कैलेंडर जारी किया है, जिसमें कुछ मॉडल और फिल्म कलाकारों के साहसी स्थिर चित्र हैं। इस तरह का कैलेंडर वे हर वर्ष जारी करते हैं। इस कैलेंडर को आम आदमी केवल काला बाजार से ही खरीद सकता है। इसकी कीमत इतनी अधिक है कि यह सबके बस की बात नहीं। इसका यह अर्थ नहीं कि तस्वीरों में निर्वस्त्र व्यक्ति नजर आते हैं।

इन तस्वीरों को अश्लील नहीं कहा जा सकता, परंतु इनमें नारी शरीर के दिलकश मोड़ उजागर होते हैं। नैतिकता के स्वयंभू चौकीदार नारी देह का ताप सहन नहीं कर पाते। फिल्म पर सेंसर बोर्ड के नियम लागू होते हैं, परंतु कैलेंडर पर यह नियम लागू नहीं होते। किसी भी फिल्म या उपन्यास के खिलाफ अश्लीलता का मुकदमा टिक ही नहीं पाया। वेबस्टर डिक्शनरी में दी गई अश्लीलता की परिभाषा से प्रेरित इंडियन पेनल कोड के अश्लीलता विषयक कानून बने हैं।


राजा रवि वर्मा द्वारा बनाई गई पेंटिंग्स पर भी अश्लीलता का मुकदमा कायम किया गया था, परंतु निर्णय कलाकार के पक्ष में गया था। केतन मेहता की फिल्म ‘रंगरसिया’ में इसका प्रमाणिक वर्णन प्रस्तुत किया गया है। जलप्रपात के नीचे पानी से अठखेलियां करती हुई महिला के स्थिर चित्र से एक विज्ञापन फिल्म प्रेरित हुई है। राज कपूर की ‘जिस देश में गंगा बहती है’ और ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ में भी इसी तरह के दृश्य हैं।

ज्ञातव्य है कि फिल्म 1 सेकंड में 24 फ्रेम चलती है। मनुष्य का मस्तिष्क और कैमरा एक जैसा काम करते हैं। गुजरे जमाने में मूलगांवकर नामक पेंटर कैलेंडर के लिए पेंटिंग्स बनाता था। उसकी कृतियों में पुरुष, स्त्रियों से अधिक कोमल नजर आते थे। गोरखपुर स्थित एक प्रेस द्वारा जारी पुरातन आख्यानों की किताब में भी इसी तरह के चित्र दिए जाते थे। आज कैलेंडर की उपयोगिता घट गई है, क्योंकि मोबाइल पर सभी कुछ उपलब्ध है। इसके बावजूद कैलेंडर प्रकाशित होते हैं।

एक दौर में शराब का एक खिलंदड़ व्यापारी दर्जनभर स्त्रियों के साथ समुद्र तट पर जाता था। वहां लिए फोटोग्राफ्स का इस्तेमाल कैलेंडर बनाने में किया जाता था। वह बैंक से कर्ज लेकर व्यवसाय खड़े करता था, परंतु कभी कर्ज अदा नहीं करता था। उसके भागने के लिए एयरपोर्ट अलर्ट घोषित करने में विलंब किया गया। हर चोरी में व्यवस्था की भागीदारी रहती है जो पांचवीं फ्रेम की तरह होकर भी दिखती नहीं। भारतीय कथा फिल्म के जनक एक समय दादा साहेब फाल्के ने भी चार रंग के कैलेंडर प्रिंट करने का काम किया था।


तांबे या पीतल की एक गोल तश्तरी में 100 वर्ष का कैलेंडर ही होता है। इसे घुमाने पर मनचाही जानकारी प्राप्त हो सकती है। राजकुमार हिरानी की ‘थ्री ईडियट्स’ में ‘चमत्कार-बलात्कार’ भाषण की घटना में हुए अपमान की तारीख पात्र छत पर पानी की टंकी पर अंकित कर देता है और कहता है कि कुछ वर्ष पश्चात इसी दिन हम मिलेंगे और देखेंगे कि कौन कहां पहुंचा। कैलेंडर में एब्स्ट्रैक्ट पेंटिंग का इस्तेमाल नहीं होता।

देह को स्पष्ट दिखाने वाले चित्रों का ही उपयोग होता है। कुछ पर्यटक ऐतिहासिक स्थानों पर अपनी यात्रा का दिन लिख देते हैं। कुछ प्रेमी अपनी प्रेमिका का नाम लिख देते हैं। फिल्म गीतकार भी तारीख का इस्तेमाल करते हैं। जावेद अख्तर ने फिल्म ‘तेजाब’ के लिए गीत लिखा था- ‘एक..दो..तीन...चार..’। गीता दत्त का गाया जन्मदिन की बधाई का एक गीत वर्षों आशा भोसले द्वारा गाए गीत की तरह बजाया गया और किसी भी पक्ष ने एतराज दर्ज नहीं किया।

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