परदे के पीछे / शिक्षा व्यवस्था व ऋतिक से रोशन ‘सुपर तीस’



जयप्रकाश चौकसे

जयप्रकाश चौकसे

Jul 23, 2019, 02:23 PM IST

श्रीलाल शुक्ल ने ‘राग दरबारी’ उपन्यास 1970 में लिखा। भारत को समझने के लिए वेदव्यास रचित ‘महाभारत’, नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ और ‘राग दरबारी’ हमारी सहायता करते हैं। उपन्यास को प्रकाशित हुए करीब आधी सदी हो गई है परंतु हालात जस के तस हैं।

 

श्रीलाल शुक्ल लिखते हैं कि भारत में शिक्षा प्रणाली सड़क पर पड़ी उस बीमार कुतिया की तरह है, जिसे सब लतियाते हैं परंतु सुधारने का प्रयास कोई नहीं करता। शिक्षा प्रणाली पर बिहार के शिक्षक आनंद कुमार पर बना बायोपिक है ‘सुपर थर्टी’। इस फिल्म को संसद में भी दिखाया जा सकता है। हमारे बजट का अधिकांश भाग हथियार खरीदने पर खर्च होता है परंतु देश की सुरक्षा शिक्षा पर निर्भर करती है। शिक्षा की समस्या पर आमिर खान और राजकुमार हिरानी की फिल्म ‘थ्री इडियट्स’  दस्तावेज की तरह मानी जाती है। हमारी शिक्षा केवल परीक्षा पास करने के गुर बताती है और ज्ञान का पक्ष उपेक्षित ही रह जाता है।


आनंद अत्यंत मेधावी छात्र था और उसे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पढ़ाई जारी रखने का आमंत्रण प्राप्त हुआ परंतु बिहार से लंदन यात्रा का व्यय उसके बस की बात नहीं थी। जब उसे प्रथम आने पर मंत्रीजी ने गोल्ड मेडल दिया था तब उन्होंने आगे की पढ़ाई में सहायता का वचन भी दिया था। आनंद और उसके पिता मंत्री के दरबार में जाते हैं परंतु आदतन अपनी बात से मुकर जाने वाले मंत्री महोदय सहायता करने की जगह उसका मखौल उड़ाते हैं।

 

हमारे मंत्री कितने अज्ञानी और हंसोड़ हैं कि चुटकुले सुनाकर समस्या का निदान करना चाहते हैं। फिल्म में प्रायवेट कोचिंग केंद्र चलाने वाला एक पात्र है, जो आनंद को खूब धन देकर अपने यहां पढ़ाने के काम पर नियुक्त करता है। संस्था में सभी छात्र अमीर घरों से आए हैं और वे येन केन प्रकारेण डिग्री प्राप्त करना चाहते हैं।

 

आनंद के कारण वह व्यवसाय खूब चल पड़ता है परंतु एक दिन आनंद एक साधनहीन बच्चे को स्ट्रीट लैम्प के नीचे पढ़ता देखता है। वह एक कठोर निर्णय लेता है और लगी लगाई नौकरी छोड़कर गरीब बच्चों को मुफ्त में शिक्षा देने वाली संस्था का निर्माण करता है। उसके प्रयास में टांग अड़ाता है एक धनवान व्यक्ति। उसके केंद्र की बिजली काट दी जाती है परंतु आनंद के बच्चे गरीबी और भूख से लड़ते हुए अध्ययन जारी रखते हैं।


नकारात्मक शक्तियां अपने प्रयास बढ़ा देते हैं। फिल्म के ताने बाने में एक प्रेमकथा गूंथी गई और आनंद स्वयं अपनी प्रेमिका को किसी और से शादी करके सुविधापूर्ण जीवन जीने की सलाह भी देता है। नकारात्मक ताकतें आनंद को चुनौती देती हैं कि उसके छात्र और अमीरों की संस्था के छात्रों के बीच प्रतियोगिता करा लें। इस घटनाक्रम में उसकी भूतपूर्व प्रेमिका, जो अब साधन संपन्न व्यक्ति की पत्नी है, उसकी सहायता करती है।

 

वह अपने पति से कहती है कि पुरुष के चुनाव में उससे कभी गलती नहीं होती। फिल्म में हास्य के दृश्य इसी संकेतात्मकता के साथ प्रस्तुत हुए हैं। मंत्री महोदय धंधेबाज ट्यूशन चलाने वाले से कहते हैं कि आनंद की हत्या करा दी जाए। सारी साजिशें असफल होती हैं। फिल्म के पार्श्व संगीत में संस्कृत के वे श्लोक शामिल किए गए हैं, जो मां सरस्वती की आराधना के लिए लिखे गए हैं।

 

फिल्म में एक जगह संस्कृत श्लोक सुनाए गए हैं, इसलिए हम द्रोणाचार्य के शिक्षा देने के तरीके से अपनी बात खत्म करते हैं। आचार्य द्रोणाचार्य कुरुवंश के एक सौ पांच छात्रों के साथ वन में आते हैं। दुर्योधन पूछता है कि निर्जन स्थान पर तो कोई गुरुकुल नहीं है। गुरु द्रोणाचार्य उन सबसे मेहनत कराकर गुरुकुल की स्थापना कराते हैं और कहते हैं कि गुरुकुल के निर्माण की प्रक्रिया में ही आधी शिक्षा हो चुकी है।


बहरहाल, कुछ वर्ष पश्चात शिक्षा प्रक्रिया पूर्ण होने पर गुरु द्रोणाचार्य कहते हैं कि अब गुरुकुल को तोड़ दिया जाए। दुर्योधन को आपत्ति है कि इतने परिश्रम से बनाया भवन क्यों तोड़ें। पांडव गुरु की आज्ञा से गुरुकल तोड़ देते हैं। गुरु द्रोणाचार्य कहते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य चरित्र-निर्माण है और संपत्ति के मोह को त्यागना ही सच्ची शिक्षा है। बहरहाल ‘सुपर तीस’ में ऋतिक रोशन के अब तक की अभिनय यात्रा में यह सर्वश्रेष्ठ प्रयास है। यह भी फिल्म देखने का एक कारण हो सकता है।

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