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देसी सिनेमा बनाम डॉलर सिनेमा का छलावा

6 महीने पहलेलेखक: जयप्रकाश चौकसे
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अ मेरिका से ‘अनधिकृत’ यात्रा पर आए हमारे मेहमान ने भारतीय फिल्म और क्रिकेट खिलाड़ियों के नाम भी लिए। उनके घोस्ट राइटर को मालूम था कि भारत में क्रिकेट और फिल्मों के लिए समान जुनून है। हिंदुस्तानी फिल्मों के टिकट के दाम औसत अमेरिकन फिल्म के टिकट के दाम से दोगुना होते हैं। अमेरिका में भारतीय फिल्में केवल सप्ताहांत में प्रदर्शित होती हैं। महिलाएं और बच्चे फिल्म देखते हैं, पति और पिता लाउंज के बार में बैठकर बीयर पीते हैं। कुछ महिलाएं तो अपने साथ अपने ड्रेस डिजाइनर को भी फिल्म दिखाने ले जाती हैं, ताकि वह वैसे ही वस्त्र उसके लिए बना दे। अमेरिका में लगभग तीस लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं और उन्हें नागरिकता प्राप्त है। डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा उनके चुनाव प्रचार का एक हिस्सा है। इसके साथ ही वे अपने कुछ आउट डेटेड हथियार भी भारत को बेच देंगे। पाकिस्तान के हव्वे के कारण हथियार खरीदे जाते हैं। चीनी मोगेम्बो इस बात से बहुत खुश होता है। सूरज बड़जात्या की पहली फिल्म एक प्रेम कथा थी और उन्होंने एक समारोह में राज कपूर के प्रभाव को स्वीकार किया था। बाद में परिवार की इच्छानुरूप उन्होंने अपनी ही कंपनी द्वारा पहले बनाई फिल्मों को भव्य पैमाने पर बनाया। मसलन सीधी सादी ‘नदिया के पार’ को ‘हम आपके हैं कौन’ के नाम से बनाया। फिल्म में मंदिरनुमा घर और घरनुमा मंदिर में दर्जनभर से अधिक गीत फिल्माए गए जिनमें समधन के साथ छेड़छाड़ का गीत भी शामिल था। गुलेल चलाने वाले दीवाने देवर का जिक्र भी था। सूरज बड़जात्या की फिल्म ‘साथ-साथ’ भी उनकी संस्था द्वारा बनाई गई पुरानी फिल्म का नया संस्करण थी। ज्ञातव्य है कि राजश्री प्रोडक्शन संस्था के स्थापक ताराचंद बड़जात्या दक्षिण भारत के फिल्म व्यवसाय से जुड़े थे और दक्षिण में बनी हिंदी भाषा की फिल्मों का वितरण करते हुए उन्होंने ‘आरती’ नामक फिल्म से निर्माण संस्था का शुभारंभ किया। उन्होंने हर क्षेत्र में अपने फिल्म वितरण के दफ्तर खोले थे। उन्होंने रमेश सिप्पी की फिल्म ‘शोले’ का भी वितरण किया था। जी.एन. शाह की धर्मवीर का वितरण भी उन्होंने ही किया था। सूरज बड़जात्या और सलमान खान बहुत गहरे मित्र हैं। सलमान की पहली हिट सूरज बड़जात्या ने ही बनाई। उनकी ताजा फिल्म असफल रही तो सूरज ने उसका पूरा दोष स्वयं अपने पर लिया। वर्तमान समय में सूरज आत्मचिंतन में लगे हैं और अपनी फिल्म शैली में परिवर्तन करना चाहते हैं। संभवत: वे प्रेम कथा पर लौटें। वे जानते हैं कि भारत में संयुक्त परिवार नामक संस्था का विघटन हो चुका है और पति-पत्नी के रिश्ते के बीच भी एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गई है। डोनाल्ड ट्रम्प ने क्रिकेट का जिक्र भी किया। अमेरिका में क्रिकेट नहीं खेला जाता। कपिल देव निखंज, सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ निष्णात खिलाड़ी भारतीय क्रिकेट संस्था के संचालन में हाशिये पर बैठा दिए गए हैं, जबकि अगली विश्व कप टीम का संचालन इन महान खिलाड़ियों के हाथ होना चाहिए। सभी क्षेत्रों में दोयम दर्जे के लोग महत्वपूर्ण पद हथिया चुके हैं। हमने चुनाव प्रक्रिया को ही दूषित कर दिया है। मिथ मेकर हुक्मरान हो गए और आधुनिक कालखंड में मायथोलॉजी की वापसी हो रही है। एक दौर में हिंदुस्तानी फिल्में अमेरिका में इतना अधिक धन कूट रही थीं कि भारत में डॉलर सिनेमा का उदय हुआ। कुछ फिल्मकारों ने यहां तक बयान दिए कि वे बिहार, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के दर्शक के लिए फिल्में नहीं बनाते। कुछ ही दिनों में उनका यह भरम दूर हो गया। विदेशों में बसे भारतीय पहचान के संकट से गुजरते हैं। जिस देश ने उन्हें रोटी, कपड़ा और मकान बनाने के अवसर दिए, उस देश के लोगों से उन्होंने सामाजिक सामंजस्य नहीं बनाया। विदेश में मराठी क्लब, गुजराती संस्था इत्यादि का निर्माण शुरू हो गया है। अक्षय कुमार और ऋषि कपूर अभिनीत पटियाला हाउस नामक फिल्म में पिता को ऐतराज है कि उनका बेटा इंग्लैंड के लिए खेल रहा है, जबकि अंग्रेजों ने हमें दो सौ वर्ष गुलाम रखा। बड़ी जद्दोजहद के बाद उन्हें यह समझ आया कि इंग्लैंड अब उनका अपना वतन है और उनकी तीन पीढ़ियों का जन्म इंग्लैंड में हो चुका है। संकीर्णता विभिन्न स्वरूपों में हमेशा मौजूद रहती है। एक दौर में एक सिख गेंदबाज इंग्लैंड के लिए खेलता था। जब इंग्लैंड की टीम भारत दौरे पर आई तब उस सिख गेंदबाज की सफलता के लिए प्रार्थना की गई। किसी अन्य संदर्भ में लिखी पं. जवाहरलाल नेहरू की बात याद आती है कि विदेश में बसे भारतीय उन पंखहीन प्राणियों की तरह हैं जो छद्म आधुनिकता का सैटेलाइट पकड़ने के मोह में अपनी धरती से संपर्क खो देते हैं। वे न जमीन के रहते हैं और न सैटेलाइट उनकी पकड़ में आता है। विदेशों में बसे भारतीय लोग भारत की राजनीति को प्रभावित करते हैं। उनके अपने पूर्वाग्रह वे भारत पर थोपना चाहते हैं। विदेश में उपलब्ध सुविधाओं को वे छोड़ना नहीं चाहते। भारत के इतिहास बोध से वंचित ये लोग भारत का अमेरिकीकरण करने के प्रयास कर रहे हैं। आज आप उड़ते हुए विमान से भारत को देखें तो गगनचुंबी इमारतें आपको यह भरम देती हैं कि आपका जहाज मैनहट्टन एअरपोर्ट पर उतरने जा रहा है। आज मेहमान विदा होगा और हमारे हुक्मरान नए तमाशे के आकल्पन में ‌व्यस्त हो जाएंगे। जाने कब से यह खेल जारी है।

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