परदे के पीछे / फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती और तीसरी कसम

जयप्रकाश चौकसे

जयप्रकाश चौकसे

Mar 16, 2020, 07:41 AM IST

यह महान लेखक फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ का जन्म शताब्दी वर्ष है और हम आशा कर सकते हैं कि उनकी कथा पर बनी शैलेंद्र की फिल्म ‘तीसरी कसम’ को दूरदर्शन और अन्य चैनल पर दिखाया जाएगा। ज्ञातव्य है कि ‘रेणु’ यमुना के किनारे की रेत को ही कहा जाता है। अन्य स्थान पर उसे बालू या रेत ही कहा जाता है। हमारे साहित्य में मुंशी प्रेमचंद्र ग्रामीण जनजीवन के कथाकार माने गए हैं और फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ भी ग्रामीण पृष्ठभूमि पर कथाएं लिखते थे। दोनों में अंतर यह है कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद ग्रामीण समाज में आए हुए परिवर्तन को ‘रेणु’ रेखांकित करते हैं।  

फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ ने अपनी बात कहने के लिए बिहार की लोक कथाओं और लोकगीतों का जमकर उपयोग किया। उन पर लगा आंचलिकता का ठप्पा कोई मायने नहीं रखता। वह रद्द किया जा चुका है। ज्ञातव्य है कि शैलेंद्र ने राज कपूर और वहीदा रहमान अभिनीत फिल्म ‘तीसरी कसम’ का निर्माण किया था। शैलेंद्र का यह भी सपना था कि वह ‘रेणु’ के उपन्यास ‘मैला आंचल’ पर भी फिल्म बनाएंगे।

इसी उपन्यास से प्रेरित एक फिल्म चंद दिनों की शूटिंग के बाद ही रद्द कर दी गई थी। शैलेंद्र की असमय हुई मृत्यु के कारण हमारे सिनेमा को दोहरा नुकसान पहुंचा। हमने सरल भाषा में अवाम के कष्ट को प्रस्तुत करने वाले गीतकार को खो दिया और एक समर्पित फिल्म निर्माता को भी खो दिया। ‘परती परिकथा’ अब कौन सुनाएगा? 


शैलेंद्र की फिल्म के लिए शंकर-जयकिशन ने भी अपनी लीक से हटकर लोक संगीत शैली में धुने रचीं जो अत्यंत लोकप्रिय भी हुईं। लोक जीवन का रंग देखिए ‘चिट्ठियां हो तो हर कोई भी बाचे, भाग न बांचा जाए।’
 शैलेंद्र का जन्म तो पंजाब में हुआ परंतु उनके माता-पिता और अनेक पुश्तें बिहार में जन्मी थीं। इस तरह शैलेंद्र का रेणु की ओर झुकाव एक तरह से उनकी घर वापसी है या कहें कि ‘आ अब लौट चलें, तुझको सारा देश पुकारे...’ कहती है कि सीधी राह पर चलना, देखकर उलझन बचकर निकलना’


 दरअसल दुखद यह है कि बचकर निकलने की प्रवृत्ति हमें युद्ध को टालकर ऐसे शांति समझौते की ओर ले जाती है कि जड़ समाज परिवर्तन को ही नकारता प्रतीत हो रहा है। ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ महान भारतीय आदर्श रहा है परंतु यथार्थ जीवन में हम सुविधाजनक झूठ की पतवार से ही अपनी नाव खेकर भवसागर पार करना चाहते हैं। 


फणीश्वर नाथ रेणु के लेखन में ध्वनियां अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। आइरिश उपन्यासकार जेम्स जॉयस का रुझान भी दुनिया की ओर था। इस बात को ‘ओनोमोटोपोइया’ नहीं समझा जाना चाहिए जिसका अर्थ होता है कि ध्वनि से ही शब्द के अर्थ का भी आभास भी हो जाता है। फणीश्वर नाथ रेणु ध्वनियों के प्रयोग से मनुष्य के अवचेतन को व्यक्त करते हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि रेणु ध्वनियों से पात्र का शरीर हाव-भाव तथा उसका अवचेतन अभिव्यक्त करते हैं, गोयाकि रेणु ध्वनियों से तस्वीरें बनाते हैं। वे ध्वनियों को ब्रश की तरह इस्तेमाल करके पेंटिंग बनाते हैं। रेणु की कथाओं के नाम पर गौर करें ‘ठुमरी’, ‘रसप्रिया’, ‘लाल पान की बेगम’ इत्यादि। 


‘तीसरी कसम’ लगभग 30 वर्ष की कथा है जिससे प्रेरित फिल्म घंटे की है और सारे गीतों के मुखड़े भी कथा में ही दिए गए हैं। नवेंदु घोष ने ‘तीसरी कसम’ की पटकथा लिखी थी। फिल्म विधा पर शिक्षा देने वाली संस्थाओं में इस पटकथा को पाठ्यक्रम में शामिल करने योग्य माना जा सकता है। 


हीराबाई और हीरामन की प्रेम कथा का यह कमाल है कि ये पात्र देवदास की तरह प्रेम में मरे नहीं वरन् अलग-अलग  रहकर प्रेम को ह्रदय में जीवित रखते हैं। यह अनोखी प्रेम कथा में विरह को चुनने वाले पात्र सन् 1938 की फिल्म के गीत की याद दिलाती है। 

 ‘विरहा ने कलेजा यूं छलनी किया, जैसे जंगल में कोई बांसुरी पड़ी हो’।

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