परदे के पीछे / शाहीन बाग आंदोलन प्रेरित फिल्म बनने की संभावना

जयप्रकाश चौकसे

जयप्रकाश चौकसे

Jan 24, 2020, 01:07 AM IST

व्यवस्था के तेवर, कार्यप्रणाली और विरोधियों से बदला लेने की धमकी के कारण शाहीन बाग पर चल रहे ऐतिहासिक विरोध से प्रेरित फिल्म नहीं बनाई जा सकती है। सभी जानते हैं कि फिल्म सेंसर बोर्ड इस तरह की फिल्म को प्रमाण-पत्र नहीं देगा। महेश भट्ट ने अपनी पुत्री का नाम शाहीन रखा था। अब उम्रदराज महेश भट्ट ‘सारांश’ या ‘अर्थ’ नहीं बना सकते। ‘बेगमजान’ से उन्होंने सबक सीख लिया है।

उनकी निर्माण संस्था अब ‘विशेष’ नहीं रही। यह संभव है कि मीरा नायर या दीपा मेहता की तरह विदेश में बसी कोई भारतीय मूल की महिला शाहीन बाग आंदोलन से प्रेरित फिल्म बनाए। हॉलीवुड स्टूडियो में शाहीन बाग का सेट लगाया जा सकता है। हॉलीवुड स्टूडियो में रोम, बर्लिन व रूस के सेट्स लगाए गए हैं। ‘जर्नी टू मून’ या ‘जर्नी टू सेंटर ऑफ अर्थ’ जैसी फिल्मों के लिए अनोखे सेट लगाए गए हैं। स्टीवन स्पीलबर्ग ने अंतरिक्ष यात्रा पर फिल्में बनाई हैं और वे आकाशगंगा को भी स्टूडियो में प्रवाहित कर चुके हैं। 


अनेक दशक पूर्व शहनाई वादन सीखने के लिए अमेरिका के एक विश्वविद्यालय ने उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को आमंत्रित करना चाहा। खान साहब का कहना था कि गंगा के घाट पर बैठकर ही शहनाई वादन करते हैं। आयोजकों ने कहा कि वे घाट का सेट लगा देंगे। उस्ताद ने कहा गंगा को तो अमेरिका में नहीं ला सकते? खान साहब को लाखों डॉलर मिल सकते थे, परंतु उन्हें मोह नहीं था। आज खान साहब होते तो उन्हें अपनी नागरिकता का प्रमाण देना पड़ता। वे अमेरिका का प्रस्ताव स्वीकार कर लेते। 


मुंशी प्रेमचंद्र की कथा से प्रेरित ‘शतरंज के खिलाड़ी’ के लिए सत्यजीत राय ने अवध के दरबार का सेट लगाया था। ज्ञातव्य है कि अवध के नवाब कथक नृत्य में प्रवीण थे। कृष्ण उत्सव मनाते हुए नवाब साहब राधा की भूमिका अभिनीत करते थे। आमिर खान ने भी आशुतोष गोवारीकर निर्देशित ‘लगान’ में गीत रखा था ‘राधा कैसे न जले’। इस नृत्य गीत में विदेशी बाला स्वयं को राधा के रूप में कल्पित करती है।

धर्मवीर भारती की ‘कनुप्रिया’ में कृष्ण से राधा पूछती हैं- ‘तुमने मुझे अपनी बाहों में बांधा, परंतु अपने इतिहास से मुझे क्यों वंचित किया।’ पुरातन ग्रंथ में राधा का जिक्र नहीं है। दूसरी सदी में वैष्णव संप्रदाय के उदय के साथ राधा का जिक्र पहली बार हुआ है।

संजय लीला भंसाली की ‘पद्मावत’ में राजा के दरबार में पानी की नहर बनाई गई थी। ‘फैंटम ओपेरा’ नामक फिल्म में भी ऐसा ही सेट था। यह महज इत्तफाक हो सकता है। संजय लीला भंसाली की ‘सांवरिया’ के सेट पर वेनिस की तरह नाव चलाई जाती है। ऊपर वाले भाग में ‘आरके’ लिखा हुआ नजर आता है। 


शाहीन बाग आंदोलन से प्रेरित फिल्म अमेरिका, चीन या यूरोप में बनाई जा सकती है। चीन इस तरह की फिल्म में पूंजी निवेश कर सकता है। अनुराग कश्यप के मुंह में लार आ सकती है, परंतु उन्हें पहले धर्मनिरपेक्षता को हृदय से स्वीकार करना होगा। उनकी फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में काल्पनिक शहर के सारे निवासी इस्लाम अनुयायी हैं और सारे ही अपराधी हैं।

फिल्म माध्यम सामूहिक अवचेतन को प्रभावित कर सकता है। फिल्म से मोह रखने वाले भारत में फिल्म द्वारा विचार प्रक्रिया प्रभावित की जाने की क्षमता है। शाहीन बाग आंदोलन पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष आंदोलन है। इस स्वत: स्फूर्त आंदोलन के पीछे आईएसआई (पाकिस्तान), केजीबी (रूस) या एफबीआई (अमेरिका) का कोई हाथ नहीं है। 

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