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जनजातीय संग्रहालय में पुतुल समारोह / भोपाल में 'मोहन से महात्मा'

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राष्ट्रीय पुतुल समारोह के दूसरे दिन गुरुवार को वाराणसी के क्रिएटिव पपेट थिएटर ट्रस्ट के साथियों ने मिथिलेश दुबे के निर्देशन में छड़ और दस्ताना कठपुतली शैली में बापू की जीवनगाथा 'मोहन से महात्मा' का बेमिसाल मंचन जनजातीय संग्रहालय में किया।राष्ट्रीय पुतुल समारोह के दूसरे दिन गुरुवार को वाराणसी के क्रिएटिव पपेट थिएटर ट्रस्ट के साथियों ने मिथिलेश दुबे के निर्देशन में छड़ और दस्ताना कठपुतली शैली में बापू की जीवनगाथा 'मोहन से महात्मा' का बेमिसाल मंचन जनजातीय संग्रहालय में किया।
शुरुआत हुई एक गीत से 'एक सच्चे आदमी कि ये सच्ची है कथा, सत्य के शहंशाह कि ये सत्य है कथा'।शुरुआत हुई एक गीत से 'एक सच्चे आदमी कि ये सच्ची है कथा, सत्य के शहंशाह कि ये सत्य है कथा'।
गांधी के जीवन पर फिल्में, डॉक्यूमेंट्रीज़, किताबें उनके आंदोलन, सत्याग्रह और संघर्ष के प्रसंगों पर तो बहुत फोकस करती हैं लेकिन एक सामान्य बच्चे की तरह उनके बचपन की घटनाओं पर ज्यादा विस्तार से बात नहीं होती।गांधी के जीवन पर फिल्में, डॉक्यूमेंट्रीज़, किताबें उनके आंदोलन, सत्याग्रह और संघर्ष के प्रसंगों पर तो बहुत फोकस करती हैं लेकिन एक सामान्य बच्चे की तरह उनके बचपन की घटनाओं पर ज्यादा विस्तार से बात नहीं होती।
बच्चों को गांधी से जोड़ने के लिए बहुत जरूरी है कि उनके बचपन की चर्चा हो। 'मोहन से महात्मा' में बालक मोहनिया से लेकर महात्मा के रूप में शहीद होने तक की कहानी को जीवंत तरीके से दिखाया गया।बच्चों को गांधी से जोड़ने के लिए बहुत जरूरी है कि उनके बचपन की चर्चा हो। 'मोहन से महात्मा' में बालक मोहनिया से लेकर महात्मा के रूप में शहीद होने तक की कहानी को जीवंत तरीके से दिखाया गया।
प्रस्तुति की शुरुआत में ही डेढ़ मिनट की गांधी जी की ओरिजिनल आवाज़ का इस्तेमाल किया गया, जिसमें वे एक प्रार्थना सभा के दौरान कह रहे हैं- 'मेरी आवाज़ इतनी कमजोर हो गई है कि अगर ये माइक ठीक से काम भी करे तब भी पीछे बैठे हुए मेरे भाई-बहनों को शायद ही मेरे शब्द सुनाई दें।'प्रस्तुति की शुरुआत में ही डेढ़ मिनट की गांधी जी की ओरिजिनल आवाज़ का इस्तेमाल किया गया, जिसमें वे एक प्रार्थना सभा के दौरान कह रहे हैं- 'मेरी आवाज़ इतनी कमजोर हो गई है कि अगर ये माइक ठीक से काम भी करे तब भी पीछे बैठे हुए मेरे भाई-बहनों को शायद ही मेरे शब्द सुनाई दें।'
मंच पर पोरबंदर का घर, स्कूल, साउथ अफ्रीका में ट्रेन से नीचे फंेका जाना, अश्वेतों के साथ भेदभाव के खिलाफ आंदोलन, हिंदुस्तान लौटकर अपने राजनीतिक गुरु गोखले के निर्देश पर देश का भ्रमण करना।मंच पर पोरबंदर का घर, स्कूल, साउथ अफ्रीका में ट्रेन से नीचे फंेका जाना, अश्वेतों के साथ भेदभाव के खिलाफ आंदोलन, हिंदुस्तान लौटकर अपने राजनीतिक गुरु गोखले के निर्देश पर देश का भ्रमण करना।
विदेशी वस्त्रों की होली से लेकर अंतिम प्रार्थना सभा में नाथूराम गोडसे की बंदूक से निकली तीन गोलियों का सामना करने वाले दृश्य बहुत ही सूझ बूझ, रचनात्मकता और कला कौशल के साथ पेश किए गए।विदेशी वस्त्रों की होली से लेकर अंतिम प्रार्थना सभा में नाथूराम गोडसे की बंदूक से निकली तीन गोलियों का सामना करने वाले दृश्य बहुत ही सूझ बूझ, रचनात्मकता और कला कौशल के साथ पेश किए गए।
अंतिम यात्रा का दृश्य मार्मिक रहा, नेहरू ने कहा- हमें दिशा देने वाला, देश को रोशनी दिखाने वाला आज हमारे बीच नहीं रहा।अंतिम यात्रा का दृश्य मार्मिक रहा, नेहरू ने कहा- हमें दिशा देने वाला, देश को रोशनी दिखाने वाला आज हमारे बीच नहीं रहा।
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