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ऐतिहासिक तस्वीरें / जब गांधीजी पहली बार माउंटबेटन से मिलने पहुंचे

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31 मार्च 1947 भारत के अंतिम वॉयसराय माउंटबेटन के प्रेस अटैची एलन कैम्पबेल की किताब- ‘भारत विभाजन की कहानी’ में भारत के विभाजन और आजादी से जुड़े कई अनसुने किस्सों का जिक्र है। उन्होंने लिखा है- 31 मार्च 1947 को गांधीजी पहली बार लॉर्ड माउंटबेटन से मिलने पहुंचे। कई फोटोग्राफर्स पहले से वहां तैयार थे। फोटो खींचने के बाद वे चले गए, लेकिन एसोसिएट प्रेस के फोटोग्राफर मैक्स डेस्फर इंतज़ार करते रहे। फोटो-सेशन के बाद सब अंदर जाने लगे, तो गांधीजी ने लेडी माउंडबेटन के कंधे पर ठीक वैसे ही हाथ रख दिया जैसे वे अपनी पोतियों के कंधे पर रखते थे। मैक्स ने यह फोटो तभी क्लिक किया था।31 मार्च 1947 भारत के अंतिम वॉयसराय माउंटबेटन के प्रेस अटैची एलन कैम्पबेल की किताब- ‘भारत विभाजन की कहानी’ में भारत के विभाजन और आजादी से जुड़े कई अनसुने किस्सों का जिक्र है। उन्होंने लिखा है- 31 मार्च 1947 को गांधीजी पहली बार लॉर्ड माउंटबेटन से मिलने पहुंचे। कई फोटोग्राफर्स पहले से वहां तैयार थे। फोटो खींचने के बाद वे चले गए, लेकिन एसोसिएट प्रेस के फोटोग्राफर मैक्स डेस्फर इंतज़ार करते रहे। फोटो-सेशन के बाद सब अंदर जाने लगे, तो गांधीजी ने लेडी माउंडबेटन के कंधे पर ठीक वैसे ही हाथ रख दिया जैसे वे अपनी पोतियों के कंधे पर रखते थे। मैक्स ने यह फोटो तभी क्लिक किया था।
2 जून 1947 को दिल्ली के राष्ट्रपति भवन (तब वॉयसराय हाउस) में हुई इसी बैठक में बंटवारा तय हुआ था। बैठक में (बांये से दाये)-अब्दुल रब निश्तर, सरदार बलदेव सिंह, आचार्य कृपलानी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, पंडित जवाहर लाल नेहरू, लॉर्ड माउंटबेटन, मोहम्मद अली जिन्ना और लियाकत अली खान मौजूद थे।2 जून 1947 को दिल्ली के राष्ट्रपति भवन (तब वॉयसराय हाउस) में हुई इसी बैठक में बंटवारा तय हुआ था। बैठक में (बांये से दाये)-अब्दुल रब निश्तर, सरदार बलदेव सिंह, आचार्य कृपलानी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, पंडित जवाहर लाल नेहरू, लॉर्ड माउंटबेटन, मोहम्मद अली जिन्ना और लियाकत अली खान मौजूद थे।
नेहरू कैबिनेट: बाएं से दाएं- बीआर अंबेडकर, रफी अहमद किदवई, सरदार बलदेव सिंह, मौलाना अबुल कलाम आजाद, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद (राष्ट्रपति), सरदार पटेल, डॉ डॉन मथाई, जगजीवन राम, राजकुमारी अमृत कौर और एसपी मुखर्जी। जो खड़े हैं उनमें (लेफ्ट से राइट)-खुर्शीद लाल, आरआर दिवाकर, मोहनलाल सक्सेना, एन गोपालास्वामी अयंगर, एनवी गाडगिल, केसी नियोगी, जयरामदास दौलतराम, के संथनम, सत्यनारायण सिन्हा और डॉ बीवी केसकर।नेहरू कैबिनेट: बाएं से दाएं- बीआर अंबेडकर, रफी अहमद किदवई, सरदार बलदेव सिंह, मौलाना अबुल कलाम आजाद, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद (राष्ट्रपति), सरदार पटेल, डॉ डॉन मथाई, जगजीवन राम, राजकुमारी अमृत कौर और एसपी मुखर्जी। जो खड़े हैं उनमें (लेफ्ट से राइट)-खुर्शीद लाल, आरआर दिवाकर, मोहनलाल सक्सेना, एन गोपालास्वामी अयंगर, एनवी गाडगिल, केसी नियोगी, जयरामदास दौलतराम, के संथनम, सत्यनारायण सिन्हा और डॉ बीवी केसकर।
जिन्ना कैबिनेट: बाएं से दाएं- फजलुर रहमान, गुलाम मोहम्मद, लियाकत अली खान, मोहम्मद अली जिन्ना, आईआई चुंद्रीगर, अब्दुल रब निश्तर और अब्दुल सत्तार पीरजादा।जिन्ना कैबिनेट: बाएं से दाएं- फजलुर रहमान, गुलाम मोहम्मद, लियाकत अली खान, मोहम्मद अली जिन्ना, आईआई चुंद्रीगर, अब्दुल रब निश्तर और अब्दुल सत्तार पीरजादा।
यह तस्वीर 14 अगस्त 1947 में कराची के विधानसभा भवन की है। लॉर्ड माउंटबेटन की मौजूदगी में मोहम्मद अली जिन्ना ने भाषण दिया था। कैम्पबेल ने लिखा है- ‘दोपहर बाद माउंटबेटन और उनकी पत्नी दिल्ली रवाना हो गए क्योंकि उन्हें भारत के स्वतंत्रता दिवस समारोह में हिस्सा लेना था, जो कराची से कहीं ज्यादा बड़ा और महत्वपूर्ण था।’यह तस्वीर 14 अगस्त 1947 में कराची के विधानसभा भवन की है। लॉर्ड माउंटबेटन की मौजूदगी में मोहम्मद अली जिन्ना ने भाषण दिया था। कैम्पबेल ने लिखा है- ‘दोपहर बाद माउंटबेटन और उनकी पत्नी दिल्ली रवाना हो गए क्योंकि उन्हें भारत के स्वतंत्रता दिवस समारोह में हिस्सा लेना था, जो कराची से कहीं ज्यादा बड़ा और महत्वपूर्ण था।’
कलकत्ता में जश्न के लिए जुटे लोग एक ही वाहन में सवार होकर निकले थे।कलकत्ता में जश्न के लिए जुटे लोग एक ही वाहन में सवार होकर निकले थे।
सरदार पटेल के साथ हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली।सरदार पटेल के साथ हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली।
दिसंबर 1928 में कलकत्ता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने पहली बार आजाद हिंद फौज की वर्दी पहनी थी।  इसे ब्रिटिश टेलरिंग फर्म हार्मन्स ने तैयार किया था। बोस शुरू से खुद की सेना बनाना चाहते थे। वे खुद को उस सेना के कमांडिंग ऑफिसर की तरह देखना पसंद करते थे। इसलिए उन्होंने आजाद हिंद फौज बनाने का सपना साकार किया। उस दिन बोस ने कांग्रेस अधिवेशन के लिए खास तौर पर मिलेट्री स्टाइल में गार्ड ऑफ ऑनर परेड का आयोजन किया था। परेड की सलामी मोतीलाल नेहरू ने ली थी। 2000 वॉलेंटियर्स मिलेट्री ड्रेस में थे। इनमें से आधे मिलेट्री ऑफिसर की तरह ड्रेस पर मेडल भी लगाए हुए थे।दिसंबर 1928 में कलकत्ता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने पहली बार आजाद हिंद फौज की वर्दी पहनी थी। इसे ब्रिटिश टेलरिंग फर्म हार्मन्स ने तैयार किया था। बोस शुरू से खुद की सेना बनाना चाहते थे। वे खुद को उस सेना के कमांडिंग ऑफिसर की तरह देखना पसंद करते थे। इसलिए उन्होंने आजाद हिंद फौज बनाने का सपना साकार किया। उस दिन बोस ने कांग्रेस अधिवेशन के लिए खास तौर पर मिलेट्री स्टाइल में गार्ड ऑफ ऑनर परेड का आयोजन किया था। परेड की सलामी मोतीलाल नेहरू ने ली थी। 2000 वॉलेंटियर्स मिलेट्री ड्रेस में थे। इनमें से आधे मिलेट्री ऑफिसर की तरह ड्रेस पर मेडल भी लगाए हुए थे।
यह नेताजी सुभाषचंद्र बोस की कार है। नंबर है- BLA 7169। इसे जर्मन वान्डरर सिडान 1941 नाम से पहचाना जाता था। ब्रिटिश सेना बोस को गिरफ्तार करना चाहती थी, तब नेताजी इसी कार से 16-17 जनवरी 1941 की रात जर्मनी भागे थे। उस दिन कार बोस के भतीजे डॉ. शिशिर बोस ने कार चलाई थी। 2017 में इसे अॉडी कंपनी की मदद से बोस के परिवार ने री-स्टोर कराया। यह अब भी चलती है और कोलकाता के नेताजी भवन में शान से खड़ी है।यह नेताजी सुभाषचंद्र बोस की कार है। नंबर है- BLA 7169। इसे जर्मन वान्डरर सिडान 1941 नाम से पहचाना जाता था। ब्रिटिश सेना बोस को गिरफ्तार करना चाहती थी, तब नेताजी इसी कार से 16-17 जनवरी 1941 की रात जर्मनी भागे थे। उस दिन कार बोस के भतीजे डॉ. शिशिर बोस ने कार चलाई थी। 2017 में इसे अॉडी कंपनी की मदद से बोस के परिवार ने री-स्टोर कराया। यह अब भी चलती है और कोलकाता के नेताजी भवन में शान से खड़ी है।
फरवरी 1946 में रॉयल इंडियन नेवी ने अंग्रेज सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया था, इस दौरान बंबई में बड़ा हिंसक आंदोलन हुआ था।फरवरी 1946 में रॉयल इंडियन नेवी ने अंग्रेज सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया था, इस दौरान बंबई में बड़ा हिंसक आंदोलन हुआ था।
3 मार्च 1939 को गांधीजी राजकोट में अनशन पर बैठ गए। इसके बाद पूरे देश में हड़ताल शुरू हो गई। अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा।3 मार्च 1939 को गांधीजी राजकोट में अनशन पर बैठ गए। इसके बाद पूरे देश में हड़ताल शुरू हो गई। अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा।
नमक का उत्पादन और इससे जुड़े आंदोलन अंग्रेजों द्वारा बेवजह लगाए करों के विरोध में थे। 1930 में कर मुक्त नमक के लिए दांडी मार्च किया गया था। साबरमती से दांडी तक पैदल यात्रा कर गांधीजी ने खुद के लिए नमक बनाने से रोकने वाला अंग्रेजी कानून तोड़ा था। इसके बाद देश में  कानून का विरोध हुआ। 1882 के नमक कानून के तहत नमक के उत्पादन और उसके संग्रहण का अधिकार सिर्फ सरकार (अंग्रेज) को था।नमक का उत्पादन और इससे जुड़े आंदोलन अंग्रेजों द्वारा बेवजह लगाए करों के विरोध में थे। 1930 में कर मुक्त नमक के लिए दांडी मार्च किया गया था। साबरमती से दांडी तक पैदल यात्रा कर गांधीजी ने खुद के लिए नमक बनाने से रोकने वाला अंग्रेजी कानून तोड़ा था। इसके बाद देश में कानून का विरोध हुआ। 1882 के नमक कानून के तहत नमक के उत्पादन और उसके संग्रहण का अधिकार सिर्फ सरकार (अंग्रेज) को था।
फिजी में मजदूरों को गन्ने की खेती और निर्माण कार्यों के लिए ले जाया गया।फिजी में मजदूरों को गन्ने की खेती और निर्माण कार्यों के लिए ले जाया गया।
मॉरीशस में भारतीयों को पहुंचाने का दौर1728 में ही शुरू हो गया था।मॉरीशस में भारतीयों को पहुंचाने का दौर1728 में ही शुरू हो गया था।
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