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अटल स्मृति / राजनेता और महान कवि अटलजी की दुर्लभ तस्वीरें

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भारत रत्न और तीन बार प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी का मंगलवार को जन्मदिन है। अटलजी आज जिंदा होते तो 94 साल के होते। उनका निधन इसी साल 16 अगस्त को हो गया था। वे काफी वक्त से बीमार चल रहे थे और 2009 से ही व्हील चेयर पर थे।भारत रत्न और तीन बार प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी का मंगलवार को जन्मदिन है। अटलजी आज जिंदा होते तो 94 साल के होते। उनका निधन इसी साल 16 अगस्त को हो गया था। वे काफी वक्त से बीमार चल रहे थे और 2009 से ही व्हील चेयर पर थे।
अटल बिहारी वाजपेयी की जन्म 25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम कृष्ण बिहारी वाजपेयी और मां का नाम कृष्णा देवी था। कहा जाता है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने राजनैतिक करियर की शुरुआत कम्युनिस्ट के तौर पर शुरू की थी, लेकिन बाद में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और हिंदुत्व का झंडा बुलंद किया।अटल बिहारी वाजपेयी की जन्म 25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम कृष्ण बिहारी वाजपेयी और मां का नाम कृष्णा देवी था। कहा जाता है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने राजनैतिक करियर की शुरुआत कम्युनिस्ट के तौर पर शुरू की थी, लेकिन बाद में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और हिंदुत्व का झंडा बुलंद किया।
अटलजी का निधन इसी साल 16 अगस्त को हुआ था। वे 93 साल के थे। अटलजी तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे। उनके सम्मान में कई जगहों के नाम बदले गए हैं। हिमालय की चार चोटियों के नाम भी उनके नाम पर रखे गए। छत्तीसगढ़ के नए रायपुर का नाम अटल नगर रखा गया। इसके अलावा उत्तराखंड सरकार ने देहरादून एयरपोर्ट का नाम बदलकर अटलजी के नाम पर रखा। उधर, उत्तरप्रदेश सरकार ने भी लखनऊ में हजरतगंज चौराहे का नाम बदलकर अटल चौक रखने का फैसला किया।अटलजी का निधन इसी साल 16 अगस्त को हुआ था। वे 93 साल के थे। अटलजी तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे। उनके सम्मान में कई जगहों के नाम बदले गए हैं। हिमालय की चार चोटियों के नाम भी उनके नाम पर रखे गए। छत्तीसगढ़ के नए रायपुर का नाम अटल नगर रखा गया। इसके अलावा उत्तराखंड सरकार ने देहरादून एयरपोर्ट का नाम बदलकर अटलजी के नाम पर रखा। उधर, उत्तरप्रदेश सरकार ने भी लखनऊ में हजरतगंज चौराहे का नाम बदलकर अटल चौक रखने का फैसला किया।
वाजपेयी ने डीएवी कॉलेज से एलएलबी का रिफ्रेशर कोर्स किया। खास बात यह रही कि अटल और उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ने एलएलबी के रिफ्रेशर कोर्स की क्लासेस एक साथ पढ़ी थीं।वाजपेयी ने डीएवी कॉलेज से एलएलबी का रिफ्रेशर कोर्स किया। खास बात यह रही कि अटल और उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ने एलएलबी के रिफ्रेशर कोर्स की क्लासेस एक साथ पढ़ी थीं।
वाजपेयी की हंसी ठिठोली की गवाह ब्रज की गलियां आज भी हैं। कभी साइकिल तो कभी यमुना में नौकाविहार में उनकी मस्ती आज भी उनके दोस्तों को याद है।वाजपेयी की हंसी ठिठोली की गवाह ब्रज की गलियां आज भी हैं। कभी साइकिल तो कभी यमुना में नौकाविहार में उनकी मस्ती आज भी उनके दोस्तों को याद है।
ग्वालियर में जन्मे अटल का जन्मदिन भारत में 'गुड गवर्नेंस डे' के रूप में मनाया जाता है। वे एक बेहतरीन कवि है और देश के प्रति उनका समर्पण आज भी लोग याद करते हैं।ग्वालियर में जन्मे अटल का जन्मदिन भारत में 'गुड गवर्नेंस डे' के रूप में मनाया जाता है। वे एक बेहतरीन कवि है और देश के प्रति उनका समर्पण आज भी लोग याद करते हैं।
मथुरा के पेड़े उनकी खास पसंद में शुमार हैं। प्रधानमंत्री रहने के वक्त यहां से जाने वाले लोग उनके लिए पेड़े जरूर ले जाते थे। पेड़े के दीवाने अटल ठंडाई के भी शौकीन रहे हैं। उनके नजदीक रहे लोग बताते हैं कि यमुना तट पर ठंडाई छानकर वह अक्सर नौकाविहार पर किया करते थे।मथुरा के पेड़े उनकी खास पसंद में शुमार हैं। प्रधानमंत्री रहने के वक्त यहां से जाने वाले लोग उनके लिए पेड़े जरूर ले जाते थे। पेड़े के दीवाने अटल ठंडाई के भी शौकीन रहे हैं। उनके नजदीक रहे लोग बताते हैं कि यमुना तट पर ठंडाई छानकर वह अक्सर नौकाविहार पर किया करते थे।
वाजपेयी के बेहद नजदीक रहे वरिष्ठ भाजपा नेता बांकेबिहारी माहेश्वरी ने एक बार बताया था कि आपातकाल में जब उनको पैरोल मिली तो वे सीधे मथुरा चले गए थे। गांधी पार्क पहुंचे और प्रेम हलवाई के यहां खूब मंगौड़े खाए थे।वाजपेयी के बेहद नजदीक रहे वरिष्ठ भाजपा नेता बांकेबिहारी माहेश्वरी ने एक बार बताया था कि आपातकाल में जब उनको पैरोल मिली तो वे सीधे मथुरा चले गए थे। गांधी पार्क पहुंचे और प्रेम हलवाई के यहां खूब मंगौड़े खाए थे।
जब वे छोटे थे तो ग्वालियर के करहल गांव में बाबा जी ने यज्ञ किया। वे भी पूरे परिवार के साथ वहां पहुंचे। लौटने में देर हो गई तो रात गांव में ही रुकना पड़ा। रात में उन्हें अचानक भूख लगी। दुकानों पर खाने-पीने का सामान खत्म हो चुका था। एक दुकानदार ने उनसे कहा रसगुल्ले तो खत्म हो गए चाश्नी बची है। भूख मिटाने के लिए उन्होंने दोना भरकर चाश्नी ही पी ली थी।जब वे छोटे थे तो ग्वालियर के करहल गांव में बाबा जी ने यज्ञ किया। वे भी पूरे परिवार के साथ वहां पहुंचे। लौटने में देर हो गई तो रात गांव में ही रुकना पड़ा। रात में उन्हें अचानक भूख लगी। दुकानों पर खाने-पीने का सामान खत्म हो चुका था। एक दुकानदार ने उनसे कहा रसगुल्ले तो खत्म हो गए चाश्नी बची है। भूख मिटाने के लिए उन्होंने दोना भरकर चाश्नी ही पी ली थी।
अटल जी ने शादी नहीं की, लेकिन उन्होंने एक बेटी गोद ली है, जिसका नाम नमिता है। पिता और बेटी के शौक एक जैसे ही है। दोनों को ही डांस और म्यूजिक का शौक है। दोनों ही कविता लिखते हैं।अटल जी ने शादी नहीं की, लेकिन उन्होंने एक बेटी गोद ली है, जिसका नाम नमिता है। पिता और बेटी के शौक एक जैसे ही है। दोनों को ही डांस और म्यूजिक का शौक है। दोनों ही कविता लिखते हैं।
कम ही लोग जानते हैं कि अटलजी को खाना बनाने का भी शौक रहा है। जब भी उन्हें समय मिलता था वे कुकिंग करते थे। नेचर वॉक भी उन्हें बेहद पसंद रही है। मनाली उनकी पसंदीदा जगह है।कम ही लोग जानते हैं कि अटलजी को खाना बनाने का भी शौक रहा है। जब भी उन्हें समय मिलता था वे कुकिंग करते थे। नेचर वॉक भी उन्हें बेहद पसंद रही है। मनाली उनकी पसंदीदा जगह है।
जब वायपेजी ने आरएसएस में रुचि दिखाना शुरू की थी, तब उनके पिता सरकारी कॉलेज में पढ़ाते थे। रोज सुबह उनकी बहन भाई के खाकी शॉट्स इधर-उधर छुपा देती थी, ताकि वे उसे पहनकर बाहर न जा सके। घरवालों को डर था कि कहीं अटलजी के आरएसएस से जुड़ने की बात किसी को पता चली तो पिता नौकरी से हाथ धो बैठेंगे।जब वायपेजी ने आरएसएस में रुचि दिखाना शुरू की थी, तब उनके पिता सरकारी कॉलेज में पढ़ाते थे। रोज सुबह उनकी बहन भाई के खाकी शॉट्स इधर-उधर छुपा देती थी, ताकि वे उसे पहनकर बाहर न जा सके। घरवालों को डर था कि कहीं अटलजी के आरएसएस से जुड़ने की बात किसी को पता चली तो पिता नौकरी से हाथ धो बैठेंगे।
अटल जी का अपने टीचर डॉ. मदन मोहन पांडेय से गहरा लगाव था। जिस दिन टीचर क्लास लेने नहीं जाते थे, उस दिन अटल जी गुरु जी के घर पहुंच जाते थे। और यदि गुरु जी नहीं मिलते थे तो उनकी पत्नी से इजाजत लेकर घर के बाहर ही चबूतरे पर बैठकर पढ़ाई करने लगते थे।अटल जी का अपने टीचर डॉ. मदन मोहन पांडेय से गहरा लगाव था। जिस दिन टीचर क्लास लेने नहीं जाते थे, उस दिन अटल जी गुरु जी के घर पहुंच जाते थे। और यदि गुरु जी नहीं मिलते थे तो उनकी पत्नी से इजाजत लेकर घर के बाहर ही चबूतरे पर बैठकर पढ़ाई करने लगते थे।
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