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भक्त की चिंता से चिंतित हो जाते हैं भगवान : दिव्यानंद

श्री मोहन जगदीश्वर आश्रम प्रवचन में उपस्थित महिला श्रद्धालु। मुक्तसर|श्री मोहन जगदीश्वर आश्रम कनखल हरिद्वार...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 05, 2018, 02:05 AM IST

श्री मोहन जगदीश्वर आश्रम प्रवचन में उपस्थित महिला श्रद्धालु।

मुक्तसर|श्री मोहन जगदीश्वर आश्रम कनखल हरिद्वार के अनंत श्री विभूषित 1008 महामंडलेश्वर स्वामी दिव्यानंद गिरि महाराज ने कहा कि जब नन्हा बालक अपनी मां को गोद में होता है तो उसको कोई चिंता नहीं होती, सारी चिंता उसकी मां की होती है। अगर बच्चा गिर भी जाए तो कोई बच्चे को कुछ नहीं कहता, मां को ही सुनना पड़ता है। इसी प्रकार जब भक्त भगवान की शरण में उनके पास चला जाता है तो भक्त को खुद की चिंता नहीं करनी चाहिए। फिर भगवान खुद भक्त की चिंता करते हैं। अगर भगवान की शरण में जाकर भी भक्त दुखी, अशांत और व्यथित रहता है तो भगवान खुद चिंतित हो जाते हैं। शास्त्रों में ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाएंगे जब भगवान ने अपने भक्तों की चिंताएं दूर करने को धरती पर अवतार लिया। दिव्यानंद महाराज ने यह बात अबोहर रोड स्थित श्री मोहन जगदीश्वर दिव्य आश्रम में आयोजित प्रवचन कार्यक्रम के दूसरे दिन कही। स्वामी विवेकानंद ने प्रवचनों की अमृतवर्षा के दौरान महाभारत युद्ध की चर्चा करते हुए कहा कि महाभारत का युद्ध न धर्म की लड़ाई था, न जाति की वह तो केवल स्वार्थ की लड़ाई था। आज भी लोग सिर्फ स्वार्थ वश लड़ाई लड़ रहे हैं। स्वार्थ ही व्यक्ति को लड़ाता है। इसलिए व्यक्ति को स्वार्थ रहित होकर कर्म करने चाहिए। विवेकानंद ने कहा कि मन रूपी पुष्प को प्रभु के चरणों में समर्पित करके माता-पिता व गुरुजनों का आशीर्वाद लेते रहना चाहिए। गायों व गरीबों की सेवा करते रहना चाहिए। ऐसा करने से बड़े से बड़े संकट से बचा जा सकता है। दुआएं ही हैं जो मरने के बाद साथ जाती हैं। (अमित अरोड़ा)

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