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विषाद ग्रस्त व्यक्ति का मन रहता है जीवन भर अशांत : दिव्यानंद

श्री मोहन जगदीश्वर आश्रम कनखल हरिद्वार के अनंत श्री विभूषित 1008 महामंडलेश्वर स्वामी दिव्यानंद महाराज ने कहा कि...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 13, 2018, 02:10 AM IST

विषाद ग्रस्त व्यक्ति का मन रहता है जीवन भर अशांत : दिव्यानंद
श्री मोहन जगदीश्वर आश्रम कनखल हरिद्वार के अनंत श्री विभूषित 1008 महामंडलेश्वर स्वामी दिव्यानंद महाराज ने कहा कि पारिवारिक मोह से विषाद पैदा होता है। यही विषाद ही दु:ख का मूल कारण बनता है। विषाद ग्रस्त व्यक्ति जीवन भर अशांत रहता है। किसी व्यक्ति का किसी से मोह नहीं होता, मोह होता है तो उस व्यक्ति से मिलने वाले सुख से। पति की मृत्यु को पंद्रह वर्ष बीत जाते हैं, परंतु प|ी उसे याद कर हर पल रोती रहती है। मरने को तो इन पंद्रह वर्षों में हजारों लोग मरे होंगे, परंतु प|ी अपने पति के लिए ही रोती है। इसका कारण अपने पति के प्रति उसका व्यक्तिगत जुड़ाव होता है। मोह सिर्फ स्वार्थ के चलते ही होता है। स्वामी दिव्यानंद गिरि महाराज ने यह विचार शनिवार को अबोहर रोड स्थित श्री मोहन जगदीश्वर दिव्य आश्रम में आयोजित सत्संग कार्यक्रम के दौरान रखे। स्वामी जी ने कहा कि जब तक सामने वाले से सुख मिलता रहेगा तो प्यार बना रहेगा। जब सुख मिलना बंद तो प्यार खत्म होते देर नहीं लगती। दुनिया के सभी नजदीकी संबंध स्वार्थ के होते हैं। अगर संबंध बनाना ही है तो गुरु व परमात्मा से बनाओ, जो नि:स्वार्थ कृपा बरसाते हैं। दिव्यानंद जी ने कहा कि अंधकार को न तो तलवार से काटा जा सकता है, न पानी से धोया जा सकता है और न ही हवा से उड़ाया जा सकता है। अंधकार को मिटाने के लिए प्रकाश करना पड़ता है। प्रकाश होते ही अंधकार खुद मिट जाता है। उसी प्रकार मोहांधकार को दूर करने का केवल एक ही उपाय है कि गुरु ज्ञान की ज्योति जलाई जाए। हृदय रुपि मंदिर को प्रकाशमान करें। (अमित अरोड़ा)

त्याग से ही हो सकती है ईश्वर की प्राप्ति : स्वामी महेशानंद

स्वामी महेशानंद महाराज ने कहा कि संसार में भौतिकवादी और आध्यात्मिकवादी दो प्रकार के लोग होते हैं। कैकई और भरत इसकी उदाहरण हैं। कैकई की धारणा होती है कि संपत्ति मिल जाए तो वह उसके दम पर दुनिया को अपने आगे झुका लेगी। भरत की धारणा है कि जितना त्याग हो सके करो, त्याग से ही ईश्वर की प्राप्ति होगी। उन्होंने कहा कि कैकई दुनिया को संपत्ति के बल पर अपने पक्ष में करना चाहती थी। जबकि भरत आस्था के दम पर प्रभु के चरणों की सेवा करना चाहते थे। आज भी जब लोग कैकई को याद करते हैं तो हृदय में नफरत पैदा हो जाती है और भरत को याद करते हैं तो विनम्रता से मस्तक झुक जाता है। कैकई संपत्ति पाकर भी पछताती रहती है। संसार से नफरत बटोरी। पुत्र का प्यार भी छिन गया। मगर भरत प्रसन्न रहते हैं। प्रभु की कृपा छत्र व सारी दुनिया का प्यार आज भी भरत को अमर बनाए हुए है।

प्रवचन करते स्वामी दिव्यानंद व स्वामी महेशानंद।

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