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इस डंप पर 60 साल का कूड़ा ; भूजल, मिट्टी और हवा प्रदूषित, गैस से हो सकता है विस्फोट

जिंदगी-मौत का सवाल बना भगतांवाला डंप जमीनी पानी और मिट्टी को प्रदूषित कर चुका है।

Dainik Bhaskar

Dec 03, 2017, 04:20 AM IST
60 Years of Dump on Dump

अमृतसर. आसपास के लोगों के लिए जिंदगी-मौत का सवाल बना भगतांवाला डंप जमीनी पानी और मिट्टी को प्रदूषित कर चुका है। इसके कारण यहां की हवा भी बुरी तरह से प्रभावित हो रही है। करीब छह दशकों से यहां पर फेंका जा रहा कूड़ा अब तो और भी खतरनाक रुख अख्तियार करता जा रहा है। डंप पर हमेशा होने वाली आगजनी इसका सबूत है कि यह आग किसी भी वक्त भयावह रूप ले सकती है। इस तरह के खतरे का संकेत दिया है जर्मनी के सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट माहिर डॉ. हरबंस लाल चांदना ने। लायंस क्लब अमृतसर के बुलावे पर “अमृतसर क्लीन एंड ग्रीन पब्लिक पार्टिसिपेशन’ प्रोजेक्ट के तहत लोगों तथा नगर निगम को साफ-सफाई तथा कूड़ा प्रबंधन पर जानकारी देने के लिए पहुंचे हुए हैं।


लोगों को सोच बदलनी होगा
प्रोजेक्ट के डायरेक्टर केआर जैन, क्लब के प्रधान एएन चाबा, लायंस क्लब इंटरनेशनल के पास्ट डिस्ट्रिक गवर्नर केके वर्मा, प्रोजेक्ट कोआर्डिनेटर सुधीर मेहरा के साथ डॉ. चांदना ने शहर के पॉश तथा स्लम इलाकों का बारीकी से अध्ययन किया और पाया कि ज्यादातर इलाकों की स्थिति बदतर है। वह कहते हैं कि जर्मनी तो दूर की बात दिल्ली जैसे महानगर जैसी भी यहां के लोगों की सोच नहीं है। संबंधित विभागों का तो बुरा हाल है ही बल्कि खुद लोग भी गैरजिम्मेदाराना तरीके से कूड़ा इधर-उधर बिखेर देते हैं। अमूमन देश में औसतन एक आदमी रोजाना 200 से 250 ग्राम कूड़ा पैदा करता है, जबकि अमृतसर का यह औसत 500 ग्राम से ऊपर चला जाता है।


25 एकड़ में फैले डंप पर 1957 से फेंका जा रहा कूड़ा
डॉ. चांदना ने अपने सर्वे और शोध का हवाला देते हुए बताया कि 25 एकड़ में फैले भगतांवाला डंप पर 1957 से कूड़ा फेंका जा रहा है। कूड़ा फेंकने से पहले जमीन को न तो सीमेंटेड किया गया और ना ही जमीन में गंदा पानी आदि जाने से रोकने के लिए पॉलिथीन की शीटें बिछाई गई। उनका कहना है कि यहां पर रोजाना औसतन 600 टन से अधिक कूड़ा आता है।


इसमें से 70 फीसदी तक गीला होता है। कूड़े में कागज, गत्ता, प्लास्टिक, लोहा, शीशा, मेडिकल वेस्ट, मरे जानवर, रसोई का वेस्ट, घरों, दुकानों आदि का मलबा, फैक्टरियों का वेस्ट यहां तक की ई-वेस्ट (इलेक्ट्रानिक कूड़ा) भी शामिल होते हैं।

यहां का पानी पीने से कैंसर, पेट, आंख, कान, गले और चमड़ी की बीमारियां हो सकती हैं
डॉ. चांदना के मुताबिक डंप से रिसने वाला गंदे पानी में कोबाल्ट, लेड, आर्सेनिक, जिंक, रिथोनियम और मर्करी जैसे हैवी मैटल होते हैं, जमीन में पहुंच कर भूजल को प्रदूषित कर रहे हैं। इस पानी के पीने से कैंसर, पेट, आंख, कान, गले और चमड़ी आदि की बीमारियों होती हैं। डंप पर मीथेन गैस के जलने से अक्सर धुआं निकलता रहता है। यह रगड़ या फिर जरा सी चिंगारी से जल उठती है। मीथेन समेत अन्य हानिकारक गैसें हवा में जा रही हैं और इंसानी जिंदगी के साथ दूसरे भव्य निर्माणों पर भी असर डालती हैं। वह गाजियाबाद में हुए ऐसे ही डंप की घटना का हवाला देते हुए कहते हैं कि अगर इसका समय से प्रबंधन न किया गया तो कोई बड़ा हादसा हो सकता है। इसमें विस्फोट भी संभव है।


प्लास्टिक आदि को रिसाइकल किया जाए और रसोई वाले कूड़े से खाद बनाई जाए
डंप को शहरी आबादी से कम से कम 20 किमी की दूरी पर ले जाया जाए और यहां पर तत्काल कूड़ा फेंकने पर रोक लगाई जाए। जर्मनी के कूड़ा प्रबंधन तकनीक का हवाला देते हुए डॉ. चांदना का कहना है कि एक किलो में 900 ग्राम कूड़ा काम का होता है। इस तरह से रोजाना इस डंप पर काम में आने वाली 540 मीट्रिक टन वस्तुओं को कूड़े में फेंका जा रहा है। घर से ही कूड़ा अलग-अलग करके लाया जाए। इसके लिए जरूरी है कि घरेलू, औद्योगिक, इलेक्ट्रानिक और मेडिकल कूड़े को अलग-अलग कर लिया जाए। इसके बाद प्लास्टिक, कागज, गत्ता, लोहा, प्लास्टिक, धातु और किचन के कूड़े को छांटा जाए। प्लास्टिक आदि को रिसाइकल किया जाए और रसोई वाले कूड़े से खाद बनाई जाए।

सियासत के लिए इस्तेमाल होता रहा डंप

इस डंप के कारण परेशान आसपास की सात (अब दर्जन भर) वार्डों के लोगों की नुमाइंदगी करते हुए सांझी संघर्ष कमेटी के बैनर तले साल 2013 से विरोध शुरू हुआ था। इसके बाद सरकार ने यहां पर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट लगाने का प्लान बना दिया और फिर विरोध शुरू हो गया। कमेटी के प्रवक्ता संदीप कुर्ल संजय का कहना है कि दूसरी बार नवंबर 2014 में लोगों ने कोट मंगल सिंह चौक पर लगातार 42 दिन तक धरना दिया। इनका कहना था कि इसके बाद विधान सभा हलका दक्षिणी के तत्कालीन अकाली विधायक इंदरबीर सिंह बुलारिया ने डंप हटाने का भरोसा देकर धरना खत्म करवाया, लेकिन कोई हल नहीं किया गया। कुर्ल ने बताया कि कि इसके बाद फिर लोगों ने 13 अगस्त 2015 से धरना शुरू किया। तत्कालीन सरकार से इस मुद्दे को लेकर बुलारिया का टकराव भी हुआ और उन्होंने पार्टी भी छोड़ दी और कांग्रेस में शामिल हो गए। इधर फरवरी 2017 में हुए विधान सभा चुनावों से पूर्व बुलारिया ने फिर लोगों को भरोसा दिया कि कांग्रेस आने पर इसे हटा दिया जाएगा। शर्मा ने बताया कि कैप्टन अमरिंदर सिंह तथा मनप्रीत बादल ने भी इसे हटाने का भरोसा दिया था, लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ।

जमीन को लेकर फंसा है पेंच
लोगों का विरोध देखते हुए सूबा सरकार ने ब्यास के सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्रोजेक्ट लगाने की योजना बनाई, ताकि कूड़े को वहीं पर ले जाकर ठिकाने लगाया जाए, लेकिन जमीन नहीं मिल सकी। अभी हाल ही में सराय अमानत खां के पास 60 एकड़ जमीन की तजवीज की गई है। वैसे तो निगम के अधिकारी कहते हैं कि प्रोजेक्ट यहीं पर लगाया जाएगा लेकिन उक्त जगह के पास सैकड़ों एकड़ में जंगल है और ग्रीन ट्रिब्यूनल इसकी मंजूरी देगा ऐसा नहीं लगता

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