--Advertisement--

फौजी ट्रक चढ़ने से फटी थीं बारूदी सुरंगें, लगा भारत-पाक युद्ध छिड़ गया

5 जनवरी 2002 को अटारी बॉर्डर से 12 किमी. दूर महावा-राजाताल रोड पर बनी यादगार पर हर साल लगता है मेला।

Danik Bhaskar | Jan 06, 2018, 03:59 AM IST
गांव महावा में शहीदों को सलामी देते हुए अधिकारी। गांव महावा में शहीदों को सलामी देते हुए अधिकारी।

अमृतसर. कांगड़ा निवासी किसान मदनलाल पहली बार अपने बेटे सुदर्शन और उनके साथ शहीद हुए 14 जवानों को श्रद्धांजलि देने आए थे, जो ठीक 16 साल पहले आज ही के दिन बारूदी सुरंग विस्फोट में मारे गए थे। शहीद स्थल पर एक कोने में खड़े वे अपनी सफेद पगड़ी के लड़ से बार-बार आंखें पोंछ रहे थे। 20 साल की छोटी सी उम्र में संसार से विदा हुए बेटे की मौत का दर्द उनके चेहरे पर झलक रहा था। इसके बावजूद जहां मदनलाल को देश के लिए कुर्बानी देने वाले बेटे पर गर्व था, वहीं मलाल था कि वह अपने जिगर के टुकड़े को आखिरी बार देख नहीं सके थे।


बारूद सुंरगों ने सभी जवानों के चीथड़े उड़ा कर रख दिए थे। शहीदी का जाम पीने वाले जवान 16 डोगरा और 113 इंजीनियर रेजिमेंट से संबंधित थे। रिटायर्ड हवलदार सुखदेव सिंह शायद एकमात्र ऐसे भाग्यशाली इंसान हैं, जो घटनास्थल के वक्त बिल्कुल नजदीक मौजूद थे, लेकिन गंभीर जख्मी होने के बावजूद बच गए। उन्होंने बताया, बॉर्डर के निकट एंटी टैंक शक्तिशाली बारूदी सुरंगें उतारी जा रही थीं। वहां लांगरी ने चाय बनाई तो मुझे मीठा चेक करने के लिए कहा। मैंने एक घूंट ही भरा था कि जबरदस्त धमाका हुआ। मेरे सारे कपड़े उड़ गए। शरीर छलनी-छलनी हो गया। जब होश आया तो मैं मिलिटरी अस्पताल में था।

गांव महावा, जिसके निकट घटना घटी, के किसान महल सिंह बताते हैं कि ठंड बहुत थी, शाम को धुंध छा रही थी। तभी फौजी ट्रक को पीछे करते हुए टायर बारूदी सुरंगों पर चढ़ गया और विस्फोट की आवाज 40 मील दूर तक सुनी गई। लोगों को ऐसा लगा जैसे पाकिस्तान के साथ लड़ाई छिड़ गई हो। उन्होंने बताया कि 15 जवानों के साथ 3 मजदूर युवक भी मारे गए थे, जो वहां बन रही सड़क निर्माण कार्य से जुड़े थे।

सेना ने बहुत मदद की

हवलदार जगजीवन सिंह की पत्नी शरणजीत कौर अपनी बेटियों राजवंत और बेअंत तथा बेटे जगमीत के साथ पति को अकीदत के फूल भेंट करने आई थी। उन्होंने बताया कि जब जगजीवन की शहादत की खबर पहुंची, आंखों के आगे अंधेरा छा गया। बच्चे छोटे थे, ऐसा लगा सब खत्म हो गया। मगर सेना ने इतनी मदद की कि हमें परिवार के मुखिया की कमी महसूस नहीं होने दी।

गुरुद्वार भी बनवाया

13 दिसंबर 2001 को भारतीय संसद पर हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच कटुता से दोनों ओर जंगी तैयारियां शुरू हो गई थी। 5 जनवरी 2002 को अटारी बॉर्डर से लगभग 12 किलोमीटर दूरी पर महावा-राजाताल सड़क मार्ग पर सड़क किनारे यह भयानक घटना घटी थी। घटनास्थल पर जहां सेना ने शहीद फौजियों की याद में स्मारक बनाया, वहीं ग्रामीणों ने साथ ही गुरुद्वारा साहिब का निर्माण कर दिया। अब हर साल इस दिन सेना और ग्रामीण मिलकर इस स्थल पर शहीदी मेले का आयोजन करते हैं। सेना की हथियारबंद टुकड़ी शहीदों को सैल्यूट देती है। गांव वाले लंगर लगाते हैं और फौजियों के साथ मिलकर संगत में बांटते हैं। इस अवसर पर बहुत से रिटायर्ड फौजी भी अपने साथी रह चुके जवानों को सैल्यूट करने पहुंचे हुए थे।

बेटे की शादी के सपने देखे थे
शहीद सिपाही कपूर चंद भी कांगड़ा के रहने वाले थे, उनके पिता जंगी राम और उनकी मां नर्मदा देवी शहीदी स्थल पर मौजूद थे, जंगी राम ने बताया कि कपूर जो महीने पहले ही फौज में भर्ती हुआ था। मैं उसकी शादी के सपने देख रहा था कि उसके इस जहान से जाने की खबर मिल गई।

बेटे का नाम करगिल रखा
मुकंदपुर, नवांशहर से नौजवान करगिल सिंह अपने स्वर्गीय पिता हवलदार हरभजन सिंह को प्रणाम करने पहुंचे थे। उनके पिता जब करगिल में तैनात थे, तभी बेटे का जन्म हुआ और उन्होंने उसका नाम करगिल पर ही रख दिया। करगिल ने बताया कि पिता के जाने के बाद फौज ने उन्हें पूरा मान सम्मान दिया।

रोते हुए मदन लाल। रोते हुए मदन लाल।