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रेसलर नवजाेत और उनकी बहन करती थी पहलवानी, गांववालों ने जब रोका तो उनसे उलझ पड़ी थी मां

एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप में गोल्ड जीतने वाली तरनतारन की नवजोत ने घर पहुंच बताई मां के संघर्ष की कहानी।

Danik Bhaskar | Mar 08, 2018, 07:07 AM IST
नवजोत के पैर की हड्डी बढ़ी हुई थ नवजोत के पैर की हड्डी बढ़ी हुई थ

अमृतसर. सर्दियों में सारा दिन घर का काम। देर रात सभी को सुलाने के बाद सबसे पहले रात दो बजे उठ जाना। मेरी और बड़ी बहन की आंखें खुलने से पहले हमारे लिए दूध लेकर खड़ी हो जाना। ये उस मां के संघर्ष की कहानी है, जिसकी बदौलत आज मैं इस मुकाम पर हूं। मां का सपोर्ट न होता तो शायद मेरा यह गोल्ड भी न होता। ये कहना हैं किर्गिस्तान में हुई एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप में अंडर 65 किलोग्राम वर्ग में शनिवार को भारत के लिए पहला गोल्ड जीतने वाली नवजोत कौर का।

सुबह 4 बजे स्कूल के लिए निकलती थी और शाम 7 बजे लौटती

तरनतारन के गांव बागड़िया पहुंचीं नवजोत कौर से सफलता का राज पूछा गया तो उनकी आंखों में मां ज्ञान कौर के प्रति प्यार साफ झलक आया। नवजोत ने बताया कि मुझे और नवजीत कौर को प्रैक्टिस पर जाने के लिए रात ढाई बजे उठना पड़ता था। लड़कियां होने के कारण हमारी अखाड़े की प्रैक्टिस तो हो नहीं सकती थी। इसलिए हमें सुबह 5 बजे स्कूल पहुंचना होता था, जहां कोच हमारा इंतजार कर रहे होते थे। इसके लिए हमें सुबह 4 बजे के आसपास 8 किलोमीटर दूर स्थित स्कूल के लिए घर से निकलना पड़ता था। स्कूल और प्रैक्टिस के कारण वापसी रात सात बजे तक होती थी। चूंकि पहलवान होने के कारण हम बाहर का कुछ भी नहीं खा सकते थे इसलिए वह 4 बजे तक हमें ब्रेकफास्ट और लंच भी बनाकर देती थीं।

ऑपरेशन और रीढ़ की हड्डी पर चोट से उबरना था मुश्किल

नवजोत के पैर की हड्डी बढ़ी हुई थी। 2010 में प्रैक्टिस के दौरान वह टूट गई तो ऑपरेट कर उसे निकालना पड़ा। उसके बाद 2015 में उसकी रीढ़ की हड्डी पर चोट लग गई। ज्ञान कौर ने कहा कि इन दोनों घटनाओं के समय वह सहम गई थीं। मां का दिल होने के नाते उन्हें यह डर भी सता रहा था कि कहीं ये कुश्ती बेटी की जिंदगी खराब न कर दे, लेकिन आज गर्व होता है कि ऐसी छोटी-छोटी मुश्किलों में भी उन्होंने फैसला नहीं बदला और आज उनकी बेटी सफलता की सीढ़ियां चढ़ रही हैं।

एक बार टोका था, फिर किसी ने बोलने की हिम्मत नहीं की
नवजोत की मां ज्ञान कौर ने बताया कि शुरू-शुरू में नवजोत और बहन नवजीत को पहलवानी करते देखकर गांव वाले बातें करने लगे। कुछ लोगों ने घर आकर ऐसा करवाने से रोका भी, लेकिन मैं खुद बेटियों के पक्ष में गांववालों से उलझ पड़ी। मैंने उनसे दोटूक कह दिया कि मुझे अपनी बेटियों पर विश्वास है। आज वहीं गांववाले जब घर आकर नवजोत को जीत की बधाई देते हैं तो एक मां के तौर पर मैं खुद को सफल मानती हूं।