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सिख इतिहास में पहली बार मनाया बाबा बंदा सिंह बहादुर का जन्म दिन

4 वर्ष पहले
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गढ़ी गुरदास नंगल। गुरुगोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों की शहादत का बदला लेने वाले सिख जरनैल बाबा बंदा सिंह बहादुर का 16 अक्टूबर को सिख इतिहास में पहली बार जन्म दिन मनाया गया। इसके लिए सबसे बड़ी पहल तख्त श्री दमदमा साहिब के जत्थेदार और अकाल तख्त साहिब के हैडग्रंथी ज्ञानी गुरमुख सिंह ने की और जन्म दिन के लिए गढ़ी गुरदास नंगल के ऐतिहासिक गुरुद्वारे को चुना गया जहां पर बाबा बंदा सिंह बहादुर को गिरफ्तार किया गया था।
इससे पहले आज तक बाबा बंदा सिंह बहादुर का जन्म दिन नहीं मनाया गया था क्योंकि पूरे सिख पंथ में बाबा बंदा सिंह बहादुर को लेकर अलग-अलग धारणा बनी हुई थी। सरहिंद फतेह करने के बाद सिख दो-तीन गुटों में बंट गए। बाबा बंदा सिंह बहादुर के पैरोकार बंदेई खालसा और तत खालसा के बीच कड़े मतभेद पैदा हो गए थे और बंदेई खालसा पर यह आरोप लगता रहा कि वह बंदा सिंह बहादुर को गुरु का दर्जा देने लगे हैं और कई ऐसे आरोप भी लगे कि बंदा सिंह बहादुर ने सिख मर्यादाओं के उल्ट काम किए जिस पर माता साहिब कौर और माता सुंदरी ने खालसा पंथ के नाम हुकमनामा भी जारी किया था कि बंदा सिंह बहादुर से कोई राबता रखे। तब से ही खालसा पंथ इन्हीं धारणाओं को लेकर बाबा बंदा सिंह बहादुर के बारे बंटा रहा और सिख विद्वान भी कई मुद्दों को लेकर बंदा सिंह बहादुर का विरोध करते रहे।

गुरदासनंगल की गढ़ी से गिरफ्तार हुए थे बंदा सिंह बहादुर : जबबाबा बंदा सिंह बहादुर राजा उदय सिंह की बेटी राजकुमारी सुशील से शादी करने और बेटे अजय सिंह के जन्म के बाद पहाड़ी राजाओं से टक्कर लेते हुए आगे बढ़ रहे थे तो उनकी दूसरी शादी भाई शिव राम (कपूर) की बेटी साहिब कौर के साथ हो गई। बाबा बंदा सिंह बहादुर के सिढौरे पर कब्जे के बाद साहिब कौर गर्भवती हो गई।
बंदा सिंह बहादुर आगे बढ़ते हुए 1715 को गुरदास नंगल की कच्ची गढ़ी में पहुंचे तो शाही फौज के बादशाह फरुखसीयर ने लाहौर के सूबेदार अबदुसमद खान और कुमरदीन खान को भेजा जिन्होंने 28 हजार फौज लेकर गढ़ी को घेर लिया। 8-9 महीने के मुकाबले और किलाबंदी के बाद 300 सिंहों को वहां शहीद कर दिया गया। बाबा बंदा सिंह बहादुर और 200 के करीब सिंहों को पहले लाहौर, फिर दिल्ली ले जाया गया, जहां पर उनके बेटे अजय सिंह और पत्नी सुशील कौर सहित शहीद कर दिया गया। यहां तक कि साढ़े तीन साल के बेटे अजय सिंह का तड़पता दिल निकालकर बंदा सिंह बहादुर के मुंह में डाल दिया गया।

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