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साइकल पर बिहार से चलकर अमृतसर पहुंचे, तय किया 19,000 किलोमीटर का सफर

Dainik Bhaskar

Nov 18, 2017, 04:39 AM IST

बुराइयां आईं और आज के युग में भी हम नारी समाज के प्रति संकुचित सोच से ऊपर नहीं उबर पाए हैं।

On the bicycle walk through Bihar to Amritsar

अमृतसर. ‘नारी, तुम केवल श्रद्धा हो/विश्वास रजत नग-पग तल में/पीयूष स्रोत सी बहा करो/जीवन के सुंदर समतल में।’ कवि की यह रचना बताने के लिए काफी है कि भारतीय जनमानस में नारी का सम्मान अनादिकाल से रहा है लेकिन समय-समय पर इसमें बुराइयां आईं और आज के युग में भी हम नारी समाज के प्रति संकुचित सोच से ऊपर नहीं उबर पाए हैं।

बेटी-बेटे में फर्क, नारी हिंसा और भी तमाम विसंगतियां आधी दुनिया अर्थात नारी शक्ति के रास्ते में रुकावट हैं। इसी रुकावट को खत्म करने और नारी का सम्मान बहाली को ‘राइड फार जेंडर फ्रीडम’ के जरिए साइकल यात्रा करते हुए बिहार से चलकर राकेश कुमार सिंह अमृतसर पहुंचे हैं।

ताकि मिले बराबरी का दर्जा
44 वर्षीय राकेश की यात्रा का मकसद समाज में जेंडर (लिंग) पर आधारित स्त्री-पुरुष के बीच भेद को मिटाना है। उनका कहना है कि आज हम भले ही नारी सशक्तिकरण की बात करते हुए महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने का दंभ भरते हैं लेकिन हकीकत यह है कि हम अभी भी स्त्री समाज को हर जगह पीछे ही रखते हैं। इसके नतीजतन बेटी-बेटे के परवरिस, शिक्षा, नौकरी समेत धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक आदि में फर्क है। इसी के चलते पैदा होते हैं नारी हिंसा और उत्पीड़न। उनका कहना है कि वह जन-जन तक महिला समाज को समानता और सम्मान का संदेश दे रहे हैं।

14 राज्यों का सफर तय
राकेश कुमार साइकल के जरिए जरूरी सामान का 35 किलो का वजन लेकर रोजाना 60 से 70 किमी का सफर तय करते हैं। उन्होंने अपनी यह यात्रा 15 मार्च 2014 में चेन्नई से शुरू की थी और वहां से लगातार चलते हुए अमृतसर तक 19,200 किमी का सफर तय किया है। इस दौरान बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, चंडीगढ़ और पंजाब जैसे 14 राज्यों से होकर गुजरे हैं। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च, फुटपाथ या फिर किसी का घर उनका रात का ठिकाना होते हैं।

राकेश ने बताया कि लोग जो मदद करते हैं उससे ही रोटी का खर्च चलता है। उनका कहना है कि अगर उनकी साइकल यात्रा से चाहे थोड़े से ही लोग जागरूक हो जाएं तो वह समझेंगे कि उनकी यात्रा सफल हो गई। कार्पोरेट कंपनी में 90 हजार रुपए की तनख्वाह पाने वाले राकेश कुमार पत्रकारिता और लेखन से भी जुड़े रहे। ग्रामीण परिवेश से जुड़े राकेश बिहार के जिला शिवहर के गांव तरियानी छपरा के रहने वाले हैं। वह बताते हैं कि लेखन के दौरान एक फिल्म मेकर के जरिए तेजाब पीड़ित लड़कियों की पीड़ा जानने का मौका मिला फिर वहीं से नारी सम्मान और समानता की लड़ाई इस तरीके से शुरू की। वह बताते हैं कि जहां भी जाते हैं लोगों की भीड़ या ग्रुप में नारी के प्रति हो रहे अन्याय के खिलाफ लोगों का जागरूक करते हैं और हरेक को यह संदेश देते हैं कि इसे अपने घर से रोकना शुरू करें। शनिवार को अटारी बार्डर पर रिट्रीट देखने के बाद वह राजस्थान और गुजरात होते हुए बाकी के बचे राज्यों को प्रस्थान करेंगे। यात्रा का समापन अपने गांव में दिसंबर 2018 में करेंगे।

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