स्मारक / यही है वो चबूतरा, जहां आज ही के दिन सवा 13 साल का बालक बना था बादशाह अकबर, मामा ने ऐलान किया था

गुरदासपुर जिले कस्बा कलानौर के पास स्थित ऐतिहासिक चबूतरा। गुरदासपुर जिले कस्बा कलानौर के पास स्थित ऐतिहासिक चबूतरा।
इस चबूतरे की ऐतिहासिक महत्ता है कि यहां जलाल-उद्दीन मोहम्मद अकबर की ताजपोशी की गई थी। इस चबूतरे की ऐतिहासिक महत्ता है कि यहां जलाल-उद्दीन मोहम्मद अकबर की ताजपोशी की गई थी।
स्मारक पर लगे एक बोर्ड पर पंजाबी में अंकित इसका इतिहास। स्मारक पर लगे एक बोर्ड पर पंजाबी में अंकित इसका इतिहास।
पुरातत्व विभाग की तरफ से लगाया गया संरक्षण का बोर्ड, जिस पर हिंदी भाषा में भी जानकारी है। पुरातत्व विभाग की तरफ से लगाया गया संरक्षण का बोर्ड, जिस पर हिंदी भाषा में भी जानकारी है।
पुरातत्व विभाग की तरफ से अंग्रेजी भाषा में लगाया गया संरक्षण का बोर्ड। पुरातत्व विभाग की तरफ से अंग्रेजी भाषा में लगाया गया संरक्षण का बोर्ड।
चबूतरे के साथ पंजाब के जीदो गौत्र के लोगों की पुरानी मान्यता जुड़ी हुई बताई जाती हैं। चबूतरे के साथ पंजाब के जीदो गौत्र के लोगों की पुरानी मान्यता जुड़ी हुई बताई जाती हैं।
चबूतरे पर चढ़ने के लिए बनाई गई सीढ़ियां। चबूतरे पर चढ़ने के लिए बनाई गई सीढ़ियां।
चबूतरे के पास रहने वाले जसवीर सिंह इसकी बदहाली के बारे मं बात करते हुए। चबूतरे के पास रहने वाले जसवीर सिंह इसकी बदहाली के बारे मं बात करते हुए।
बीते बरसों थोड़े-बहुत प्रयास शुरू हुए थे, पर ये यहीं तक सीमित रह गए। बीते बरसों थोड़े-बहुत प्रयास शुरू हुए थे, पर ये यहीं तक सीमित रह गए।
बदहाल एक ऐतिहासिक इमरारत। बदहाल एक ऐतिहासिक इमरारत।
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गुरदासपुर जिले कस्बा कलानौर के पास स्थित ऐतिहासिक चबूतरा।गुरदासपुर जिले कस्बा कलानौर के पास स्थित ऐतिहासिक चबूतरा।
इस चबूतरे की ऐतिहासिक महत्ता है कि यहां जलाल-उद्दीन मोहम्मद अकबर की ताजपोशी की गई थी।इस चबूतरे की ऐतिहासिक महत्ता है कि यहां जलाल-उद्दीन मोहम्मद अकबर की ताजपोशी की गई थी।
स्मारक पर लगे एक बोर्ड पर पंजाबी में अंकित इसका इतिहास।स्मारक पर लगे एक बोर्ड पर पंजाबी में अंकित इसका इतिहास।
पुरातत्व विभाग की तरफ से लगाया गया संरक्षण का बोर्ड, जिस पर हिंदी भाषा में भी जानकारी है।पुरातत्व विभाग की तरफ से लगाया गया संरक्षण का बोर्ड, जिस पर हिंदी भाषा में भी जानकारी है।
पुरातत्व विभाग की तरफ से अंग्रेजी भाषा में लगाया गया संरक्षण का बोर्ड।पुरातत्व विभाग की तरफ से अंग्रेजी भाषा में लगाया गया संरक्षण का बोर्ड।
चबूतरे के साथ पंजाब के जीदो गौत्र के लोगों की पुरानी मान्यता जुड़ी हुई बताई जाती हैं।चबूतरे के साथ पंजाब के जीदो गौत्र के लोगों की पुरानी मान्यता जुड़ी हुई बताई जाती हैं।
चबूतरे पर चढ़ने के लिए बनाई गई सीढ़ियां।चबूतरे पर चढ़ने के लिए बनाई गई सीढ़ियां।
चबूतरे के पास रहने वाले जसवीर सिंह इसकी बदहाली के बारे मं बात करते हुए।चबूतरे के पास रहने वाले जसवीर सिंह इसकी बदहाली के बारे मं बात करते हुए।
बीते बरसों थोड़े-बहुत प्रयास शुरू हुए थे, पर ये यहीं तक सीमित रह गए।बीते बरसों थोड़े-बहुत प्रयास शुरू हुए थे, पर ये यहीं तक सीमित रह गए।
बदहाल एक ऐतिहासिक इमरारत।बदहाल एक ऐतिहासिक इमरारत।

  • सीमांत जिले गुरदासपुर में स्थित शहर कलानौर से महज एक मील की दूरी पर स्थित है पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित स्थान
  • हुमायूं की मौत के बाद 14 फरवरी 1556 को 13 साल 3 महीने के जलाल-उद्दीन को बहरम खां ने यहीं किया था मुगल सलतनत का बादशाह घोषित

Dainik Bhaskar

Feb 14, 2020, 09:33 PM IST

गुरदासपुर. सीमांत जिले गुरदासपुर में स्थित शहर कलानौर से महज एक मील की दूरी पर यही वह चबूतरा है, जहां आज ही के दिन यानि 14 फरवरी को मुगल बादशाह जलाल-उद्दीन मोहम्मद अकबर की ताजपोशी हुई थी। संयोग की बात यह है कि उस दिन भी शुक्रवार था और आज भी शुक्रवार ही है। शुक्रवार यानि जुम्मा को इस्लाम में काफी अहमियत हासिल है। यह अलग बात है कि यह ऐतिहासिक विरासत बरसों से बदहाल है, पर इस पर किसी भी सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। विकास के लिए सिर्फ दावे होते रहे हैं। दूसरी ओर इस चबूतरे से आज भी यहां लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। हर साल जेठेरों के मेले में यहां जीदो गौत्र के लोग पूजा करते हैं, दीया जलाते हैं।

कलानौर मध्यकालीन इतिहास के वक्त से ही एक प्रसिद्ध नगर रहा है। काफी लंबे समय तक इस नगर ने उतार-चढ़ाव देखे। 1556 से 1605 ईसवी तक मुगल बादशाह रहे जलाल-उद्दीन अकबर के साथ इसका गहरा ताल्लुक रहा है। 15 अक्तूबर 1542 को अमरकोट (आजकल पाकिस्तान में स्थित) में जन्मे जलाल-उद्दीन कलानौर के पास गांव बहरामपुर में अपने मामा बहरम खां (मुगल सलतनत के सेनापति) के पास रह रहे थे। 26 जनवरी 1556 को बहरम खां सिकंदर सूर को खत्म करने की मुहिम के चलते पूरा समय जलाल-उद्दीन को साथ घने जंगलों में घिरे कलानौर में शिकार पर थे। दिल्ली की दीन पनाह नामक लाइब्रेरी की सीढ़ियों में गिरने के कारण हुमायूं की मौत हो गई और जब उन्हें सूचना मिली तो 14 फरवरी 1556 को 13 साल 3 महीने के जलाल-उद्दीन को बहरम खां ने इसी जगह मुगल सलतनत का बादशाह घोषित कर दिया। इसके लिए उन्होंने एक चबूतरा बनाया और इस राजशाही रस्मों को निभाया।

जमील बेग के मकबरे समेत कई इमारतें थी यहां

ताजपोशी वाली जगह के इर्द-गिर्द शाही बगीचों और इमारतों का निर्माण भी किया गया। इतिहासकारों के मुताबिक इनमें से एक हमाम लुक-छुप में जलाल-उद्दीन अपने दरबारियों के साथ खेला करते थे। ऐतिहासिक महत्व रखने वाली कुछ अन्य इमारतों में जमील बेग का मकबरा, बेगम सुल्ताना का महल और पीर बुड्ढनशाह की मस्जिद भी शामिल है। इस जगह से लगती सड़क को कलानौर तक बनाया गया। नगर की महत्ता बढ़ाने के लिए यहां अनारकली बाजार भी विकसित किया गया, जो उस वक्त इस इलाके में काफी चर्चित रहने के कारण, दिल्ली में बने अनारकली बाजार की वजह बना।

अब सिर्फ चबूतरा ही है बदहाल इतिहास का गवाह

मौजूदा हालात की बात करें तो अब कलानौर में सबकुछ उजड़ चुका है। सिर्फ यह चबूतरा ही बचा है। इसका कारण है सरकार की बेरुखी और हर साल रावी दरिया में आने वाली बाढ़। वैसे इतिहास की बर्बादी की बात नई नहीं है, बताया जाता है कि 1884 में अमृतसर और पठानकोट के बीच बिछाई गई रेल लाइन के नीचे इन इमारतों का मलबा इस्तेमाल किया गया था।

सत्ता में बैठे लोगों ने नहीं दिया ध्यान

इलाके के लोगों हरभजन सिंह, गुरमीत सिंह, मनजीत सिंह और अन्य का कहना है कि इस इलाके से कई विधायकों को मंत्री बनने तक का मौका मिला, लेकिन किसी ने भी इस ऐतिहासिक धरोहर को संवारने का प्रयास नहीं किया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की तरफ से भी इसे संरक्षित घोषित कर यहां नुकसान पहुंचाने जैसी कार्यवाहियों के एवज में सजात्मक कार्रवाई बोर्ड तो लगा दिया गया, लेकिन बोर्ड के अलावा यहां विभाग की तरफ से कोई सकारात्मक पहलू नजर नहीं आता।

अकाली-भाजपा सरकार में ठंडल ने तो कांग्रेस में सिद्धू ने किया था ऐलान

तख़्त-ए-अकबरी के पास रहने वाले जसविंदर सिंह का कहना है कि हमें अपने पशुओं और खेती से ही फुरसत नहीं है। अकाली-भाजपा सरकार में मंत्री सोहन सिंह ठंडल ने इसे जीर्णाेद्धार की बात की थी। वह ठंडे बस्ते में पड़ गई। इसी तरह 2017 में सत्ता बदली। कांग्रेस सरकार में प्रदेश के पर्यटन मंत्री रहे नवजोत सिंह सिद्धू ने कुछ अरसा पहले घोषणा की थी कि हमें गर्व है कि बादशाह अकबर की ताजपोशी इस स्थान पर हुई थी। इसे विकसित करने के लिए पंजाब सरकार 15 करोड़ रुपया खर्च करेगी और आसपास के किसानों की कुछ ज़मीन भी लेगी, लेकिन ज़मीन पर इस सिलसिले में कुछ नहीं हुआ।

पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से मांगी गई है अनुमति

उधर पंजाब पर्यटन विभाग के डिप्टी डायरेक्टर रविंदर सिंह अरोड़ा की मानें तो तख़्त-ए-अकबरी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट है। विभाग के हमारे पास तख्त ए अकबरी के रखरखाव को लेकर दो करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट तैयार है, लेकिन इस बारे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को हमें आज्ञा देनी होगी, जिसके बारे में हमने उन्हें लिखकर दे रखा है।

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