कोरोना के खिलाफ जंग में हथियार और दुश्मन

Amritsar News - जंगली जानवर हैं अनजाने वायरस और बैक्टीरिया के भंडार, बर्ड फ्लू जैसे विषाणु उनमें अब भी हैं जंगल नष्ट करके हम...

Mar 27, 2020, 07:15 AM IST
Amritsar News - weapons and enemies in the war against corona
जंगली जानवर हैं अनजाने वायरस और बैक्टीरिया के भंडार, बर्ड फ्लू जैसे विषाणु उनमें अब भी हैं

जंगल नष्ट करके हम घातक बीमारियों को ला रहे हैं करीब

दुनियाभर को पीड़ित करने वाला कोरोना वायरस प्रकृति से ‘जूनोटिक’ है। इसका मतलब यह है कि जानवर से मनुष्यों में फैलता है, लेकिन कोविड-19 जैसे कुछ कोरोना वायरस मनुष्यों से मनुष्यों में भी फैलते हैं। ये वायरस कभी खत्म नहीं होते, क्योंकि जंगली जानवर इनके लिए भंडार (रिजरव्याॅयर) का काम करते हैं। बर्ड फ्लू से भले ही पालतू पक्षियों को छुटकारा मिल गया हो, लेकिन जंगली पक्षियों मंे आज भी यह मौजूद है। कोरोना एक खास तरह का वायरस होता है, जिसकी सतह पर कांटे होते हैं और यह सेल्स पर हमला करता है। इस महामारी से पहले केवल छह तरह के ही कोरोना वायरसों की जानकारी थी। कोविड-19 सातवां काेरोना वायरस है, जिसकी पहचान हुई है।

जंगली जानवर उन बैक्टीरिया और विषाणु के भंडार हैं, जिन्हें हमने कभी पहले नहीं देखा। जैसे-जैसे हम जंगली जानवरांे के रहने के आखिरी स्थानों को नष्ट कर रहे हैं, हम नई-नई बीमारियों के संपर्क में आ रहे हैं। आप जब पशुपालन के लिए अमेजन के वर्षा वन को जलाते हैं और वहां हल जाेतते हैं तो आप उस बीमारी के पास चले जाते हैं, जाे अब तक बिना हलचल के वहां पड़ी थी। जब अफ्रीका के जंगलों की आखिरी झाड़ियों को खेतों में बदला जाता है या चीन के जंगली जानवरों का इस हद तक शिकार होता है कि वे लुप्त होने की स्थिति में आ जाते हैं, तो मनुष्य वन्य जीवन व उनकी बीमारियों के बहुत ही निकट संपर्क में आ जाते हैं। इनसे उनका पहले कभी पाला नहीं पड़ा होता। चमगादड़ों की ऐसी बीमारियों को अपने में रखने की एक खास प्रवृत्ति होती है जो मनुष्यों को प्रभावित करती हैं। लेकिन वे एेसा करने वाले एकमात्र जानवर नहीं हैं। इसलिए इस तरह की आपदाएं आती रहेंगी और ये आपदाएं ऐसे दूरस्थ इलाकों से आएंगी, जो अब कम दूरस्थ रह गए हैं।

क्वारंटाइन और यात्रा प्रतिबंध इस तरह की महामारी को रोकने का महत्वपूर्ण साधन है, लेकिन ये अपने आप काम नहीं करते। अगर इन्हें सफल बनाना है तो इन्हें बहुत तेजी से लागू करना पड़ता है। ऐसा करने के लिए संक्रमित लोगों का सही डेटा होना जरूरी है। हमें हेल्थ केयर के मुख्य कार्यों का समर्थन करना चाहिए। हमें यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि गरीब देशों सहित सभी देश नए प्रभावितों की पहचान और इलाज तेजी से कर सकें। मैं जानती हूं कि कोविड-19 को लेकर चीन के जवाब की भारी आलोचना हुई, लेकिन सोचिए अगह यह बीमारी अफ्रीकी देश चाड से शुरू होती, तो क्या हुआ होता? जहां एक लाख लोगों पर औसत तीन से साढ़े तीन डॉक्टर हैं। चाड अथवा हाल ही में इबोला के प्रकोप से उभरे कांगो में किसी भी नई बीमारी के आने पर क्लिनिक और हेल्थ केयर सेवा देने वालों में शायद ही यह क्षमता होती कि वे इसकी तेजी से पहचान कर पाते और इसकी सूचना राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अधिकारियों को दे पाते। क्या वे अकेले ही बीमारांे का इलाज कर पाते जिससे यह बीमारी आगे न फैलती। कोविड-19 ने हेल्थ केयर तंत्र पर एक भारी दबाव डाल दिया है।

अगर हम कोविड-19 से निपटने को पूरी तरह तैयार होते तो चीन के पास नई बीमारी की और भी तेजी से पहचान की क्षमता होती, बिना नए क्लिनिक बनाए उसने इलाज उपलब्ध कराया होता और उसने चीन के सोशल मीडिया में चल रही अफवाहाें को रोकने के लिए जनता को सही जानकारी दी होती। दुनिया के स्वास्थ्य अधिकारियों को जल्दी ही पता लग गया और तब राष्ट्रीय हेल्थ केयर तंत्र के साथ सही जानकारी को साझा किया गया। जिन्होंने अलग-अलग देशों को संक्रमण नियंत्रण, दवा व जरूरी सामान को जमा करके व अन्य तरह का प्रशिक्षण देकर महामारी से निपटने के लिए तैयार किया। यह शायद उतनी तेजी से भी नहीं फैलता और हम उतने डरे नहीं होते, जितना अब हैं। लेकिन, हमारे पास अभी भी इसका प्रकोप है।

यह डरावना समय है और हमारी अधिकतर खबरें भी डरावनी ही हैं। बहुत सारी बुरी पर आकर्षक प्रतिक्रियाओं, घबराहट, विदेशियों को पसंद न करना, खुले में न जाना या निरंकुशता में से आप किसी को भी चुन सकते हैं। अतिसरल झूठ जो हमें यह समझाता है कि घृणा और आवेश और अकेलापन हमें सुरक्षित रखेगा। ये ऐसी प्रतिक्रियाएं हैं, जो हमें अगले प्रकोप के लिए कम तैयार करती हैं। कुछ ऊबाऊ लेकिन उपयोगी प्रतिक्रियाएं हैं जो हमें आज भी मदद करती हैं और भविष्य में और भी अधिक संक्रामक बीमारियों का सामना करने के लिए तैयार करती हैं। उनके बारे में बात करना रोचक नहीं है, लेकिन वे काम करती हैं। जिन देशों में हेल्थ केयर और बीमारी निगरानी तंत्र नहीं हैं, उनकी मदद करें। हमें सप्लाई चेन में अधिक निवेश करके वैश्विक स्वास्थ्य तंत्र बनाना चाहिए, हरेक के लिए बेहतर जांच उपकरण व बेहतर इलाज उपलब्ध हो। शिक्षा को समर्थन दें, ताकि हम सब खतरों के विज्ञान और गणित पर अच्छे तरीके से बात कर सकें। हमारे निर्णय समानता से निर्देशित होने चाहिए, क्योंकि अनेक मामलों की तरह इस मामले में भी समानता और निजहित साथ चलेंगे। (यह लेखक के अपने विचार हैं।)

कोरोना में एक निर्णायक और मानवीय नेतृत्व की जरूरत

यह शायद एक कम ज्ञात तथ्य है कि एक प्राकृतिक आपदा ने नरेंद्र मोदी के राजनीतिक कॅरियर को नाटकीय तौर पर बदल दिया था। 2001 में कच्छ के भूकंप के दौरान राहत कार्यों में कथित लापरवाही की वजह से गुजरात की केशूभाई सरकार को भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने हटाकर उनकी जगह मोदी को भेज दिया था। कोरोना कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि सदी में एक बार होने वाली वैश्विक महामारी है। कच्छ में नियंत्रण होने लायक स्थिति थी। लेकिन, कोविड-19 जैसी मेडिकल इमर्जेंसी में ऐसा कोेई मौका नहीं होता। यह ऐसा संकट है, जहां जरा सी भी विश्वसनीयता के साथ यह नहीं कह सकता कि आगे क्या होगा। चीन जैसे निरंकुश देशों से लेकर अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देशों तक हर कोई वायरस को नियंत्रित करने के लिए संघर्षरत है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने काम करने के अस्थिर तरीके की वजह से उतने ही एक्सपोज हुए हैं, जितना कि शुरुआत में वुहान में इस बीमारी से निपटने के गैरपारदर्शी तरीके की वजह से चीन। इसलिए यह महामारी दुनिया के आज के नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती पैदा करती है। इस संदर्भ में मोदी कोई अपवाद नहीं हैं।

मोदी के नेतृत्व का तरीका एक राजनीतिक दबंग की उनकी छवि के चारों ओर बुना हुआ है, जो जोखिम लेते हैं। एक हिंदुत्व हीरो से एक शासन गुरु के तौर पर उनका उभरना हर वक्त उनकी छवि गढ़ने के लिए काम करने वाले तंत्र की वजह से है। इसे 2019 के चुनाव में उनकी एक लाइन ‘मोदी है तो मुमकिन है’ से समझा जा सकता है। इसने मोदी छवि को इतना बड़ा कर दिया कि हकीकत और भ्रम में अंतर करने वाली लाइन ही धुंधली हो गई। लेकिन, कोराेना को नियंत्रित करने में किसी भी तरह के भ्रम को पैदा करने की कोई गुंजाइश नहीं है। इसे अच्छे शब्दों या चमकदार इवेंट करके नियंत्रित नहीं किया जा सकता, इसके लिए सख्त रुख और इसके फैलाव पर ध्यान की जरूरत है। एक आतंकी शिविर को धमाके से उड़ा सकते हैं, वायरस को नहीं। बीमारी पर विजय मेडिकल और वैज्ञानिक खोज से ही हो सकती है।

प्रधानमंत्री के 21 दिन के राष्ट्रीय कर्फ्यू (देशबंदी) की घोषणा की 2016 के नोटबंदी के फैसले से तुलना करें। नोटबंदी एक अकेले व्यक्ति की सोच पर आधारित फैसला था। इसके विपरीत कोरोना लॉकडाउन दुनियाभर में स्वीकार्य तरीका है, क्योंकि संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए दर्जनों देश सोशल डिस्टेंसिंग को ही कारगर मान रहे हैं। नोटबंदी की आलोचना इसलिए की जा सकती है कि यह भ्रष्टाचार की बीमारी के खिलाफ हथौड़े के प्रहार जैसा था, जबकि इससे निपटने के लिए कम गड़बड़ी वाले तरीके भी थे। कोरोना वायरस के प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए तीन हफ्ते की देशबंदी के इरादे या जरूरत पर कोई विवाद नहीं हो सकता। दिक्कत वहां पैदा होती है, जब एक प्रतिरोधक कदम उन लोगों को मुअावजा देने की घोषणा के बगैर लागू होता है, जो इससे सर्वाधिक प्रभावित होने वाले हैं। लोगों के इधर-उधर घूमने पर सख्ती की बात समझ में आती है, लेकिन, बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के एेसे प्रतिबंधों को लागू करना एक और बड़ी आपदा की शुरुआत हो सकती है। गरीबाें, विशेषकर शहरी गरीबों के लिए एक बड़ा और सही दिशा वाला वित्तीय पैकेज कुछ हद तक देशबंदी से उन पर पड़ने वाले सामाजिक और आर्थिक भार को कम कर सकता है।

यही वजह है कि कोरोना में न केवल एक मजबूत व निर्णायक, बल्कि एक मानवीय संवेदनाओं वाले नेतृत्व की जरूरत है। लॉकडाउन में सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी रूप में जरूरी चीजों की आपूर्ति बाधित न हो। वर्ना दुकानों के बाहर लाइनें लग सकती हैं, जो सोशल डिस्टेंसिंग के लिए ठीक नहीं होगा। पीएम की घोषणा के बाद ही सामान खरीदने की होड़ लग गई थी। इससे पता चलता है कि लोगों को सरकार के वादों पर भरोसा नहीं है, इसलिए यह सरकार की परीक्षा भी है। लॉकडाउन के लिए केंद्र व राज्यों के बीच बेहतर समन्वय की भी जरूरत है। निश्चित तौर पर यह जितनी लोगों को प्रभावित करने की मोदी की क्षमता की परीक्षा है, उतना ही जनता से जुड़ने की मुख्यमंत्रियों की क्षमता का इम्तिहान भी है। अनेक मुख्यमंत्री नियमित तौर पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सकारात्मक संकेत दे रहे हैं। इतनी बड़ी जनसंख्या में आक्रामक संचार अभियान से ही जागरूकता आ सकती है। यह मौका न तो किसी एक के राजनीतिक रूप से हावी होने का है और न ही विपक्ष के इस तर्क का कि सरकार अगर इसे बाद में लागू करती तो बेहतर तैयारी हो सकती थी। हां, हमें एक निर्णायक लेकिन, अधिक गरिमापूर्ण और सहानुभूति रखने वाले नेतृत्व की जरूरत है।

पुनश्च: जब संसद सत्र मार्च के तीसरे हफ्ते मंे प्रवेश कर गया तो मैंने सरकार के एक मंत्री से पूछा कि कोरोना की वजह से संसद को स्थगित क्यों नहीं किया गया। उसने चिड़चिड़ाते हुए मेरी तरफ देखते हुए कहा, ‘क्या आप पत्रकार यह सोचते हो कि आप हमसे ज्यादा जानते हो।’ कोरोना के दौर में राजनीतिक अहंकार की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

(यह लेखक के अपने विचार हैं।)

अपनों के लिए कुछ दिन अपने में सिमट जाएं


इस वक्त कोरोना महामारी की भरी दोपहरी चल रही है। हम भारतवासियों ने यदि ऐसे ही समझदारी से काम लिया, सतर्कता रखी तो इसे ढलती शाम तक ले जाएंगे और बिदा भी कर देंगे। लेकिन याद रखिए, अभी सबकुछ दिख रहा है, पर हमारा भीड़ से जुड़ना, संबंध निभाने के लिए बावले हो जाना, अपने आपको समूह का हिस्सा बनाना यह आदत यदि नहीं छोड़ी तो एक अहंकार पैदा करेगी और वह अहंकार कि मैं सब कर सकता हूं, मैं जो कर रहा हूं वह सब सही है.., एक अंधकार लेकर आएगा। अपने परिवार के लोगों की दुनिया में आप उजाले का सपना देख रहे हैं, पर जरा सी नादानी उसे अंधकार में बदल देगी। इसलिए अपने लिए और अपनों के लिए कुछ दिन अपने में सिमट जाएं। इस बार के नवरात्रि के शक्ति पर्व में हम सबको शक्तिमान होना है। दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है मनुष्य होना। रावण जैसा दुर्जय राक्षस भी मनुष्य के हाथ मारा गया। तो आज नवरात्रि के तीसरे दिन नाभि जिसे कि योग की भाषा में मणिपुर चक्र कहते हैं, इस पर ध्यान लगाइए। यहां जीवन बसता है। हम पहली बार इस संसार में अपनी मां से कटकर यहीं से आए हैं। दिनभर सांस के माध्यम से अपने मणिपुर चक्र पर काम कीजिए। एक संतोष उतरेगा जो कि इस चक्र का स्वभाव है। वरना जैसे-जैसे समय बीतेगा, हमारे भीतर असंतोष जागेगा और हम ऐसे निर्णय ले लेंगे जो फिर इस महामारी को मुंह फैलाने का अवसर देे देंगे..।


कोरोना से लड़ाई में गरीबों का हौसला बढ़ाने वाला पैकेज

देशव्यापी लॉकडाउन के 36 घंटे के बाद वित्त मंत्री ने 1.70 लाख करोड़ रुपए के एक बहुआयामी राहत पैकेज की घोषणा की। शायद कोरोना महामारी से पैदा संकट की घड़ी में गरीब समाज का हौसला बढ़ाने में इससे बड़ा अन्य कोई प्रयास नहीं हो सकता था। जिंदगी की जद्दोजहद में लगे गरीब के लिए सबसे बड़ा संकट अगले दिन की रोटी था और वह सुनिश्चित की गई अगले तीन महीने तक पांच किलो मुफ्त अतिरिक्त राशन देकर। हौसला अफजाई का दूसरा कदम था इस महामारी में रोगियों की सेवा-उपचार व सफाई में लगे स्वास्थ्यकर्मी, डॉक्टर, नर्स और अन्य कर्मचारियों के लिए अगले तीन माह तक 50 लाख का स्वास्थ्य बीमा। गरीबों को नकदी की दिक्कत न हो, इसके लिए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के तहत किसान, गरीब, वृद्ध, विकलांग और कई श्रेणियों की महिलाओं को नकदी दी जाएगी। यह राशि देखने में भले ही कम हो, लेकिन इन वर्गों की तत्काल जरूरत में काफी अहम् भूमिका निभाएगी। संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को भी तत्काल प्रोविडेंट फंड से पैसे निकालने के नियम में छूट दी गई और उधर, 100 कर्मचारियों से कम के प्रतिष्ठानों/उद्योगों को प्रोत्साहन के रूप में अगले तीन महीने का प्रोविडेंट फंड सरकार जमा करेगी। ऐसी राहत देकर सरकार अब इन प्रतिष्ठानों पर दबाव डाल सकती है कि तीन सप्ताह के लॉकडाउन के दौरान कर्मचारियों का वेतन न काटें। किसानों को लॉकडाउन में उत्पाद बेचने में दिक्कत आ रही है, लिहाज़ा उनके हाथ में पैसा आना जरूरी था। सरकार ने अलग से कोई खास प्रावधान तो नहीं किया, लेकिन पहले से चल रही किसान सम्मान निधि में दी जाने वाली 2000 रुपए की तीन किस्तों में एक क़िस्त तत्काल देने की घोषणा की। देखने में मदद की कुल राशि भी काफी ज्यादा है और राहत के लिए चिह्नित तबके का चुनाव भी सही है। सरकार ने बेहद होशियारी से अनाज के बढ़ते भंडारण खर्च और बर्बाद हो रहे अन्न की समस्या का हल भी इस तरीके से निकाल लिया है। अभी कुछ माह पहले ही विदेश मंत्रालय से खाद्य मंत्रालय ने प्रार्थना की थी कि ऐसे गरीब देश तलाशें, जिन्हें मुफ्त अनाज दिया जा सके। दरअसल, अगर यह अनाज कुछ महीने और गोदामों में रुक जाता तो इसके भंडारण की कीमत अनाज की कीमत से ज्यादा हो जाती।

..युवा लोगों की नींदों में बुजुर्गों के रतजगे

कोरोना तांडव के समय एक हृदयहीन व्यक्ति ने यह विचार अभिव्यक्त किया कि उम्रदराज लोगों को बेइलाज मरने दिया जाए और बच्चों तथा युवाओं को बचाया जाए। क्या उम्रदराज लोगों को जीने का अधिकार नहीं है? अगर बात कुछ ऐसी हो कि दो में से किसी एक को ही बचाया जा सकता है, तब उम्रदराज की शहादत दी जा सकती है। सदियों पुराना लतीफा है कि एक नाव में तीन व्यक्ति यात्रा कर रहे थे। नदी में बाढ़ आ गई, एक व्यक्ति को नदी में फेंक देने से दो की जान बच सकती थी। ऐसे में व्यक्ति अपनी प|ी को नदी में फेंक देता है और कहता है कि प|ी तो दूसरी मिल सकती है, परंतु मां नहीं। यह स्त्री के अपमान की बात है। मां और प|ी दोनों ही स्त्रियां हैं।

फिल्म ‘शरारत’ में एक अनुशासनहीन घमंडी युवा से एक अपराध हो जाता है और उसे जेल नहीं भेजते हुए एक वृद्धाश्रम भेजा जाता है, जहां उसे उम्रदराज लोगों की सेवा करना है। इसी तरह राजेश खन्ना और मीना कुमारी अभिनीत दुलाल गुहा की फिल्म ‘दुश्मन’ में ट्रक ड्राइवर की चूक से एक व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। जज उसे दंड देते हैं कि वह मरने वाले के परिवार की सेवा करे। दंड विधान में सुधार की गुंजाइश रखी जानी चाहिए। वी. शांताराम की क्लासिक फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ इसी आदर्श से प्रेरित है। क्या उपयोगिता जीवन का एकमात्र मानदंड है? हॉलीवुड की फिल्म ‘दे शूट होर्सेस, डोंट दे’ में रेस के घायल घोड़े को गोली मार दी जाती है। यह निहायत ही अमानवीय विचार है। कोएन बंधुओं की फिल्म ‘नो कंट्री फॉर ओल्ड मैन’ का नाम ही बहुत कुछ कहता है। सृजन शक्ति का उम्र से कोई लेना-देना नहीं है। ज्ञातव्य है कि अंग्रेजी के महान कवि कॉलरिज अफीम का सेवन करते थे। उसी तंद्रा में उन्होंने एक कविता लिखी, परंतु उसमें अंतिम पंक्तियां वे नहीं लिख पाए, क्योंकि उनकी तंद्रा टूट गई थी। उनके कवि मित्र भी उस कविता को पूरा नहीं कर पाए। उन्हें सलाह दी गई कि वे लंदन से पचास मील दूर रहने वाले एक वृद्ध कवि से मिलें, जिसे कभी सफलता नहीं मिली, परंतु वह असाधारण प्रतिभा का धनी है। उसने अनगिनत किताबें बांची हैं। बहरहाल, उस उम्रदराज विद्वान ने तुरंत अधूरी कविता को पूरा कर दिया। कॉलरिज संतुष्ट हो गए। वे जान गए कि ये ही वे पंक्तियां हैं जो उनके अवचेतन के जंगल में गुम हो गई थीं। उम्रदराज विद्वान ने पांच पाउंड का मेहनताना मांगा तो कवि कॉलरिज ने कहा कि कविता के प्रकाशन से उन्हें बमुश्किल कुछ पेन्स मिलेंगे। कॉलरिज ने उम्रदराज विद्वान से कहा कि उसने मात्र चंद क्षण ही काम किया है, जिसके लिए पांच पाउंड राशि बहुत अधिक है। उम्रदराज व्यक्ति ने कहा कि वह चंद क्षणों में अधूूरी कविता को इसलिए पूरा कर सका, क्योंकि उसने दशकों तक अध्ययन किया है। तेल की जगह खुद को जलाकर रात-रातभर अध्ययन किया है। अगर उन रतजगों के हिसाब से मेहनताना मांगा जाए तो वह पांच पाउंड के कहीं अधिक होगा। सारांश यह है कि उम्र के हर दौर का अपना महत्व है और जीवन पर छोटे-बड़े सभी अनुभवों का प्रभाव बना रहता है। ज्ञातव्य है कि अभिनेता क्लिंट ईस्टवुड ने फिल्म निर्देशन अपने उम्रदराज होने पर प्रारंभ किया और महान फिल्मों की रचना की। इसी तरह जॉन वेन लंबे समय तक अपनी सितारा हैसियत कायम रख पाए। हमारे अपने अशोक कुमार ने बहुत लंबी पारी खेली है। अमिताभ बच्चन सक्रिय हैं। वी. शांताराम लंबे समय तक फिल्में बनाते रहे।

यूरोप की पुरानी फिल्म ‘ए बुक ऑफ विशेस’ का कथासार है कि एक अनाथालय में आग लग जाती है। सभी बच्चे बचा लिए जाते हैं, भवन नष्ट हो जाता है। बच्चों को वृद्धाश्रम शिफ्ट किया जाता है। सभी बूढ़े खामोश रहते थे, इसलिए वे बच्चों से परेशान हो गए। समय बीतने पर बूढो़ं-बच्चों में प्रेम हो गया। एक रात एक वृद्ध की मृत्यु हो गई। उसके साथी नहीं चाहते थे कि बच्चों को यह पता चले। अत: आधी रात को मृत देह लेकर वे कब्रिस्तान गए। उन्हें आश्चर्य हुआ कि बच्चे वहां पहले ही पहुंच चुके थे। हर बच्चा तो असीम संभावना है ही, परंतु कोई उम्रदराज व्यक्ति भी अनावश्यक नहीं है। मंगलेश डबराल की पंक्तियां इसी बात को रेखांकित करती हैं- मत भूलो कि तुम्हारी नींदों में, तुम्हारे पूर्वजों के अनगिनत रतजगे शामिल हैं।

जीने की राह कॉलम पं. विजयशंकर मेहता जी की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए 9190000072 पर मिस्ड कॉल करें

_photocaption_फोटो लेबनान की है। यहां 21 मार्च को मदर्स डे सेलिब्रेट किया गया। इसी दौरान एक मां को अपने बेटे से ड्रोन के जरिए फूल मिले। लेबनान में भी अभी तक 350 से ज्यादा संक्रमित मिल चुके हैं।*photocaption*



डब्ल्यूएचओ ने बताया है, कब पहनें, कैसे पहनें?

मास्क बीमार व्यक्ति से बाकी लोगों में संक्रमण फैलने से रोकने में मदद कर रहे हैं। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक संक्रमित व्यक्ति, खांसी या छींक से पीड़ित या संक्रमण की आशंका वाले व्यक्ति और कोरोना के मरीज का इलाज कर या साथ रह रहे व्यक्ति को मास्क जरूर पहनना चाहिए। डब्ल्यूएचओ यह भी कहता है कि स्वस्थ व्यक्ति को मास्क पहनने की जरूरत नहीं है। डब्ल्यूएचओ का यह भी कहना है कि केवल मास्क पहनने से बचाव नहीं होगा। इसके साथ बार-बार हाथ धोना या सैनेटाइजर इस्तेमाल करना भी जरूरी है।

मास्क कैसे पहनें और उतारें: डब्ल्यूएचओ के मुताबिक मास्क पहनने से पहले साबुन या सैनेटाइजर से हाथ साफ करें। मास्क से मुंह और नाक को अच्छे से ढंके और सुनिश्चित करें कि कहीं कोई गैप न रह जाए। जह मास्क पहने हों, तो इसे छूने से बचें। सिंगल-यूज मास्क को दोबारा इस्तेमाल न करें। मास्क हटाने के लिए इसे पीछे से खोलें। कभी भी आगे का हिस्सा न छुएं। इसे कचरे के बंद डिब्बे में फेंकने के बाद हाथ जरूर धोएं।



सैनेटाइजर में कम से कम 60% एल्कोहल होना जरूरी

एक अध्ययन के मुताबिक हैंड सैनेटाइजर बीमारियों को 26% तक कम कर सकता है। सैनेटाइजर सभी तरह के कीटाणु नहीं मार सकता, लेकिन कोरोना में यह कारगर है। सीडीसी के मुताबिक यह तभी प्रभावी है, जब इसमें कम से कम 60% एल्कोहल हो। डबल्यूएचओ ने भी एल्कोहल-बेस्ड हैंड सैनेटाइजर के इस्तेमाल की सलाह दी है।

कैसे काम करता है: साबुन की ही तरह, सैनेटाइजर कोरोना की अंदरूनी सतह पर असर करते हैं। लेकिन अगर हाथ में पहले ही चिकनाई या अन्य गंदगी हो तो पहले पानी से हाथ धोएं।

घर में नहीं बनता सैनेटाइजर: कई लोग सोशल मीडिया पर घर में ही हैंड सैनेटाइजर बनाने के तरीके बता रहे हैं। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडीसिन की प्रोफेसर सैली ब्लूमफील्ड कहती हैं कि घर पर सैनटाइजर बनाया ही नहीं जा सकता। इसमें अन्य केमिकल्स के साथ 60 -70 फीसदी शुद्ध एल्कोहल की जरूरत होती है, जो घर पर उपलब्ध नहीं हो सकती।



साबुन में 50 नैनोमीटर तक छोटे वायरस मारने की क्षमता

कोरोना वायरस से बचाव में जिस उपाय का सबसे ज्यादा जिक्र हो रहा है, वह है साबुन से बार-बार हाथ धोना। डब्ल्यूएचओ से लेकर डॉक्टर और विभिन्न देशों के स्वास्थ्य मंत्रालयों तक, सभी की यही सलाह है कि साबुन से दिन में 7-8 बार तक हाथ धोएं। जो वायरस एल्कोहल और क्लोरीन छिड़कने से भी निष्क्रीय नहीं होता, वह साबुन से खत्म हो जाता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक साबुन 50 से 200 नैनोमीटर तक छोटे आकार के वायरस मार सकता है। ज्यादातर लोग दिन में 2 से 5 मिनट तक अपने चेहरे को हाथ लगाते हैं। अगर वायरस हाथ पर रह जाता है और आप चेहरे पर हाथ लगाते हैं तो कोरोना वायरस के आपके श्वसन तंत्र में जाने की आशंका रहती है।

साबुन कैसे काम करता है: वायरस को हटाने के लिए सिर्फ पानी से हाथ धोना काफी नहीं है क्योंकि वायरस की संरचना ऐसी होती है कि वह हाथ से चिपक जाता है। यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग मेडिकल सेंटर के डॉक्टर जॉन विलियम्स बताते हैं कि अगर कोरोना वायरस को माइक्रोस्कोप में देखेंगे तो पाएंगे कि इसकी सतह पर क्राउन (मुकुट) होते हैं। कोरोना का अर्थ भी क्राउन ही होता है, इसलिए इसे यह नाम मिला। इन क्राउन के नीचे वायरस के लिपिड्स (फैट) होते हैं। कल्पना कीजिए कि आप घी वाला एक बर्तन धो रहे हैं। बिना साबुन के इसे धोने पर घी तो हट जाता है लेकिन चिकनाई महसूस होती है। इसी तरह पानी से कोरोना की अंदरूनी परत नहीं धुल पाती। लेकिन साबुन के माल्यूक्यूल्स पानी के साथ मिलकर वायरस के फैट वाले हिस्से को भी हटा देते हैं।

20 सेकंड ही क्यों: इसके बारे में कोई वैज्ञानिक शोध नहीं है, लेकिन डब्ल्यूएचओ के मुताबिक हाथ के सर्फेस एरिया को देखते हुए हाथों को अच्छे से धोने की पूरी प्रक्रिया में 20 से 30 सेकंड का समय लगता है। लेकिन हाथ धोते समय हमेशा घड़ी पर नजर तो नहीं रखी जा सकती। इसके लिए अमेरिका का सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) संस्थान सलाह देता है कि मन में दो बार ‘हैप्पी बर्थडे’ गाना शुरू से अंत तक गुनगुनाएं। हाथ धोने में इतना ही समय लगता है।

खुशी की तस्वीर- बालकनी में लेबनान का मदर्स डे**

सोशल मीडिया और वाट्सएप पर तेजी से अफवाहों वाले मैसेज फैल रहे हैं। यूट्यूब पर भी ऐसे वीडियोज की भरमार है जो कोरोना का इलाज बताने का दावा कर रहे हैं। येे वीडियो बनाने वाले चैनल्स के लाखों सब्सक्राइबर हैं। ऐसे कुछ चैनल्स का सोशलब्लेड पर किया गया अध्ययन बताता है कि इनके पिछले एक महीने में 5 लाख से 10 लाख तक सब्सक्राइबर बढ़ गए हैं।


एक संक्रमित व्यक्ति की लापरवाही हजारों को बीमार कर सकता है। लापरवाही कितनी भारी पड़ सकती है, इसकी एक बानगी -


दक्षिण कोरिया में शुरुआती चार हफ्तों में कुल 30 मामले सामने आए थे। इन्हीं 30 संक्रमितों की वजह से फरवरी के अंत कोरोना वायरस से पीड़ित लोगों को आंकड़ा 1000 तक पहुंचा था। फिर आई ‘पेशेंट 31’। इस 61 वर्षीय महिला के संक्रमित होने की जानकारी मिलने से पहले वह देगू शहर और राजधानी सिओल के कई इलाकों में घूमती रही। उसका 6 फरवरी को एक छोटा-सा एक्सीडेंट हुआ, तो वह अस्पताल गई। इस दौरान वह दो बार शिनचियोंजी चर्च के समारोहों में गई। डॉक्टरों ने 15 फरवरी को उससे कहा भी कि उसे तेज बुखार है और कोरोना का टेस्ट करवा लेना चाहिए। लेकिन वह एक होटल में बुफे लंच के लिए चली गई। उसके लक्षण बढ़े तो आखिरकार 17 फरवरी को टेस्ट हुआ। अगले दिन स्वास्थ्य अधिकारियों ने घोषणा की कि वह दक्षिण कोरिया की 31वीं कंफर्म्ड मरीज है।

इसके बाद कुछ ही दिनों में देश में मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ गई, जिसमें शिनचियोंजी चर्च और उसके आस-पास के इलाकों के सैकड़ों लोग कोरोना टेस्ट में पॉजिटिव आने लगे। कोरिया सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (केसीडीसी) ने ऐसे 9300 लोगों की लिस्ट निकाली जो शिनचियोंजी चर्च के उन दो समारोहों में गए थे। हजारों टेस्ट पॉजिटिव आए। उधर एक नजदीकी अस्पताल में कोरोना मरीजों का एक और समूह सामने आने लगा। आधिकारियों ने जांच की तो इन मामलों में और चर्च से आए मामलों में संबंध नजर आया। दोनों जगहों के मरीजों का संबंध पेशेंट 31 से रहा था। केसीडीसी के मुताबिक महिला 1,160 लोगों के संपर्क में आई, जिन्होंने और लोगों को संक्रमित किया। अब दक्षिण कोरिया में कुल मरीजों में 60% मरीज शिनचियोंजी चर्च समूह से हैं। इनकी संख्या 5,016 है। जबकि कुल मरीज 8900 से ज्यादा हैं।



कोरोना का इलाज बताने वाले यूट्यूब चैनल्स के सब्सक्राइबर में 10 लाख बढ़े



दक्षिण कोरिया में कोरोना के 60% से ज्यादा मामले एक ही महिला की वजह से

कोरोना के विलेन**

कोरोना के हीरो
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21 दिन के महायुद्ध में दवाएं या तकनीक नहीं, छोटी-छोटी चीजें कर रहीं बचाव

 वायरस से लड़ने में किससे मिल रही मदद और किससे खतरा

40 करोड़ से भी ज्यादा वाट्सएप यूजर्स हैंं

47 करोड़ से ज्यादा लोगों के पास स्मार्टफोन हैं

26 करोड़ से ज्यादा एक्टिव यूजर्स है यूट्यूब पर

अफवाहें यहां ज्यादा फैल सकती हैं क्योंकि देश में...**

आलाना शेख
वर्ल्ड हेल्थ एक्सपर्ट



सामाजिक, आर्थिक तौर पर सर्वाधिक प्रभावित होने वाले लोगों पर ध्यान देना हो सरकार की प्राथमिकता



राजदीप सरदेसाई

वरिष्ठ पत्रकार

[email protected]

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पं. िवजयशंकर मेहता

[email protected]



04

, अमृतसर, शुक्रवार, 27 मार्च 2020

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जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

 

Amritsar News - weapons and enemies in the war against corona
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