पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • Local
  • Punjab
  • Amritsar
  • Amritsar News White Majority Schools In The United States Received 170 Lakh Crores From The Rest Of The Schools See You More Annually

अमेरिका में श्वेत बहुल स्कूलों को बाकी स्कूलों से 1.70 लाख करोड़ रु. सालाना अधिक मिलते हैं

एक वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक

स्कूलों की सुविधाओं में अंतर को अदालत में चुनौती से कुछ नहीं हुआ

अमेरिका में श्वेतों और अश्वेतों के बीच भेदभाव हर स्तर पर है। शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में स्थिति बहुत गंभीर है। अश्वेत बहुल और गरीब इलाकों में सैकड़ों स्कूलों की हालत खराब है। दूसरी तरफ श्वेत बहुल क्षेत्रों के स्कूल साधन संपन्न हैं। स्वयंसेवी संगठन एड बिल्ड के अनुसार देश 75% से अधिक श्वेत छात्रों वाले स्कूलों को उन स्कूलों की तुलना में 1.70 लाख करोड़ रुपए हर साल अधिक मिलते हैं जिनमें श्वेत छात्रों की संख्या 25% या उससे कम है। स्कूलों से तुलना करें तो अमीरों और गरीबों का अंतर साफ समझ में आता है।

कुछ राज्यों की स्थिति अन्य राज्यों से बेहतर हैं। वे उन जिलों में अतिरिक्त पैसा भेजते हैं जिनमें गरीबी अधिक है। फिर भी, गरीब जिलों में रहने वाले छात्र ऐसे स्कूलों में पढ़ते हैं जिन्हें सरकारी और अन्य स्रोतों से कम पैसा मिलता है। स्कूलों में अाधुनिक सुविधाएं नहीं हैं। अच्छे शिक्षकों की कमी है। उधर, अमीर छात्रों के स्कूलों में पर्याप्त साधन हैं। अच्छी शिक्षा प्राप्त छात्रों का करिअर भी शानदार रहता है। उनके बच्चे भी अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं। यह चक्र निरंतर चलता है।

अमेरिकी शिक्षा में चल रहे भेदभाव पर नजर डालने के लिए एक उदाहरण पर गौर कीजिए। मिशिगन झील के किनारों पर बसा 10 हजार की आबादी का बेंटन हार्बर शहर किसी समय फलता-फूलता उद्योग केंद्र था। फिर, उसकी अर्थव्यवस्था धराशायी हो गई। शहर के हाईस्कूल की बिल्डिंग 100 साल पुरानी है। उसके आसपास की सड़कों पर कुछ बड़े घर हैं। कुछ भवन जर्जर हो चुके हैं। कारोबार बंद पड़े हैं। कई दुकानें खाली हैं। सरकारी स्कूलों (पब्लिक स्कूल) में शिक्षा का स्तर निम्न है। उनकी आर्थिक हालत खराब है। पिछले साल मिशिगन के गवर्नर ग्रेचेन ह्विटमेर ने हाईस्कूल बंद करने और छात्रों को नजदीकी जिलों में भेजने का प्रस्ताव रखा था।

कम ब्याज दरों के दौर में निवेश के फार्मूलों पर संदेह

विशेषज्ञ कहते हैं, अलग-अलग जगह पैसा लगाने से फायदा

केविन कैलेहर

कोरोना वायरस के आर्थिक प्रभाव को लेकर उठी आशंकाओं के बीच अमेरिका में ब्याज दरों में बदलाव हो रहा है। फेडरल रिजर्व ने पिछले सप्ताह दरों में और अधिक कटौती कर दी। लिहाजा, विशेषज्ञ लोगों को अपनी बचत योजनाओं पर नए सिरे से गौर करने की सलाह दे रहे हैं। अमेरिका में लाखों निवेशकों को रिटायरमेंट सुरक्षित बनाने के लिए शेयर मार्केट में 60 और सिक्यूरिटी बॉन्ड में 40% पैसा लगाने की सलाह लंबे समय से दी जा रही है। 60/40 नियम के तहत लंबी अवधि के स्टॉक और सुरक्षित बॉन्ड को संतुलन का रास्ता माना जाता है। काम छोड़ने के बाद अपनी बचत से हर साल 4% से अधिक पैसा ना निकालने की सिफारिश भी सामान्य है।

विश्लेषक बताते हैं कि कम ब्याज दरों के बीच भी बॉन्ड ब्याज से एेसी आय सुनिश्चित नहीं कर सकते हैं जिससे शेयर मार्केट में गिरावट की भरपाई की जा सके। वैसे, कुछ समय से स्टॉक और बॉन्ड से आय गिर ही रही है। मोर्गन स्टेनले ने अभी हाल में 60/40 पोर्टफोलियो पर अगले दशक में 4% सालाना रिटर्न की भविष्यवाणी की है। दूसरी ओर बैंक ऑफ अमेरिका की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि यह मिश्रण 2020 में नहीं चल पाएगा।

वेल्स फार्गो इन्वेस्टमेंट इंस्टीट्यूट में प्रमुख रणनीतिकार ट्रेसी मेकमिलन कहते हैं, यदि लोग निश्चित आय के इन्वेस्टमेंट को अलग-अलग निवेश करें तो उन्हें काफी लाभ मिल सकता है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मत है कि 60/40 का नियम उन निवेशकों के लिए ठीक नहीं है जिनके रिटायरमेंट के लिए दस साल या उससे अधिक समय बचा है। बचत का 4% से अधिक पैसा ना खर्च करने का नियम युवा निवेशकों को बताता है कि उन्हें कितना पैसा बचाने की जरूरत है।

अमेरिकन फाइनेंशियल सर्विस कॉलेज में प्रोफेसर वेड फाउ कहते हैं, अब निवेशकों को बचत से 3% से अधिक पैसा नहीं निकालना चाहिए। बैंक ऑफ अमेरिका में इन्वेस्टमेंट ग्रुप के प्रबंध संचालक अनिल सूरी कहते हैं, ‘निवेशकों को निजी निवेश योजना बनाना चाहिए। उसे स्थिति के हिसाब से बदला जाए’।

(टाइम और टाइम लोगो रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क हैं।
इनका उपयोग अनुबंध के तहत किया गया है।)

नवजात शिशुओं की माताओं से लोगों की अपेक्षा बहुत ज्यादा रहती है

लोरी फ्रेडकिन

बच्चे का जन्म होने के एक माह बाद ही मैं काम पर लौट आई थी। अपने नए बॉस के सामने स्वयं को साबित करने की चुनौती से जूझ रही थी। मैं ऑफिस जाने से पहले बच्चे को दूध पिलाती थी। मुझे दिन और रात में कई बार ऐसा करना पड़ता था। मैं अपने नवजात बच्चे का ख्याल रखने वाली मां बनने की कोशिश कर रही थी। उसकी बड़ी बहन चाहती थी कि मैं कम से कम एक बार तो उसे भी पर्याप्त समय दूं। उसे गोद में उठाऊं। आखिर वह भी तो छोटी बच्ची है।

अश्वेत वोटरों ने बिडेन को मजबूत दावेदार बनाया

मोसी बॉल

इस साल नवंबर में होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में जो बिडेन के डेमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार बनने की संभावना के पीछे कई कारण काम कर रहे हैं। कई राज्यों में अश्वेत अमेरिकियों और डेमोक्रेटिक पार्टी के पुराने वोटरों ने बिडेन को तमाम दावेदारों से ऊपर खड़ा कर दिया है। प्रायमरी चुनावों में बिडेन ने पार्टी के सबसे प्रबल दावेदार बर्नी सेंडर्स को पीछे छोड़ दिया। उम्मीदवार की घोषणा जुलाई में पार्टी के सम्मेलन में होगी।

पूर्व उपराष्ट्रपति बिडेन को नरमपंथियों, अफ्रीकी अमेरिकियों और डेमोक्रेटिक नेताओं का व्यापक समर्थन मिल रहा है। दूसरी तरफ बर्नी सेंडर्स डेमोक्रेटिक पार्टी की समाजवादी धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। सेना के बीच उनकी गहरी जड़ें हैं। एलिजाबेथ वारेन, माइकल ब्लूमबर्ग, पीट बुटिगिएग सहित बीस से अधिक पार्टी दावेदार मैदान से हट चुके हैं। न्यूयॉर्क के पूर्व मेयर ब्लूमबर्ग ने तो अपने अभियान पर 3600 करोड़ रुपए खर्च कर दिए थे। फरवरी में बिडेन प्रायमरी चुनावों में चौथे, पांचवें स्थान पर थे। वे एक-दो राज्यों में दूसरे स्थान पर भी आए थे। लेकिन, सुपर ट्यूसडे ने सब कुछ बदल डाला है।

वेंचर केपिटलिस्ट और बिडेन के लिए चंदा जुटाने वाले एलन पेट्रीकॉफ कहते हैं, बिडेन के चुनाव पर अब ज्यादा लोग पैसा लगाने के लिए आगे आ रहे हैं। सर्वेक्षणों से संकेत मिले हैं कि उपनगरों के शिक्षित नरमपंथी भी बिडेन के पक्ष में हैं। बर्नी सेंडर्स कहते हैं, ‘हम दोनों के बीच अब भी कड़ा मुकाबला है’। कई सर्वेक्षण बताते हैं कि 40% लोग पार्टी उम्मीदवार का चयन अंतिम दिनों में करते हैं। इसलिए डेमोक्रेट चिंतित हैं कि नवंबर में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को चुनौती कौन देगा।

(टाइम और टाइम लोगो रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क हैं।
इनका उपयोग अनुबंध के तहत किया गया है।)

शिक्षा में भेदभाव: अमीर जिलों के स्कूलों में अपार साधन, अश्वेत और गरीब क्षेत्रों के स्कूल कमजोर

बेंटन हार्बर स्कूल को बंद करने के प्रस्ताव का विरोध।

 श्वेत बहुल अमीर इलाकों में स्कूलों का बजट कई अधिक गुना होता है। उनमें अन्य सुविधाएं भी बेहतर हैं।

 श्वेत बहुल इलाकों से ज्यादा टैक्स मिलता है। इसलिए राज्य और स्थानीय संस्थाएं वहां सरकारी स्कूलों के लिए ज्यादा बजट रखते हैं।

 अश्वेत बहुल गरीब इलाकों के स्कूल भवनों की हालत जर्जर। शिक्षक कम हैं। पैसा भी पर्याप्त नहीं मिलता। शिक्षा का स्तर निम्न है।

 अश्वेत इलाकों के स्कूलों से लोग अपने बच्चों को निकालकर सुविधा संपन्न स्कूलों में भर्ती कराते हैं।

1921 में खुले बेंटन हार्बर हाईस्कूल में 1200 सीट का आधुनिक ऑडिटोरियम था। उस समय सुपीरियर स्टील, मिशिगन एलॉयज, अप्टॉन मशीन कंपनी (अब व्हर्लपूल) जैसी कंपनियां थीं। फिर यह इलाका उजड़ गया। कई कंपनियां बंद हो गईं। व्हर्लपूल जैसी कंपनियों ने विदेशों में मैन्युफैक्चरिंग शुरू कर दी। अस्पताल नदी पार चला गया। अखबार का दफ्तर, क्लब, व्यापारिक प्रतिष्ठान सेंट जोसफ जाने लगे। 1960 में बेंटन हार्बर के श्वेत पैरेंट ने श्वेत बहुल इलाकों में नया स्कूल खोल लिया। इस तरह जिले का श्वेत-अश्वेत, अमीर-गरीब को बीच विभाजन हो गया।

1967 में श्वेत अभिभावकों ने स्कूल जिले के विभाजन को अदालत में चुनौती दी। वंचित और अश्वेत छात्रों के लिए बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने वाले संगठन एनएएसीपी ने याचिका का समर्थन किया। 1977 में एक अदालत ने जिले में शिक्षा की अलग-अलग सुविधाओं को भेदभाव पूर्ण और असंवैधानिक करार दिया। लेकिन, 1981 में अपील अदालत ने स्कूल जिले के अंदर दूसरी तरह के पब्लिक स्कूलों (मैग्नेट स्कूल) को एक तरह से मान लिया। इससे शहर का विभाजन हो गया। बेंटन हार्बर में वोटरों ने शिक्षा बजट के लिए पैसा देना बंद कर दिया। बंद कारखानों से टैक्स मिलना बंद हो गया। उधर सेंट जोसफ में स्कूली सुविधाओं और शिक्षकों के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं।

(टाइम और टाइम लोगो रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क हैं।
इनका उपयोग अनुबंध के तहत किया गया है।)

शहर के दूसरे हिस्से में स्थिति एकदम विपरीत है। सड़क के दूसरे छोर पर चमचमाता काॅर्पोरेट कांप्लेक्स है। 100 मीटर आगे एक पुल पर याट खड़ी हैं। बाईं ओर गोल्फ कोर्स है। नदी के उस पार सेंट जोसफ में रेस्रांओं की कतार लगी है, आभूषण की दुकानें और बुटीक हैं। दोनों इलाके एक-दूसरे से बमुश्किल एक किलोमीटर दूर हैं। दोनों का संसार अलग है। सेंट जोसफ में हर कोई गोरा है। बेंटन हार्बर में लगभग आधे अश्वेत हैं। वे गरीब हैं। अमेरिका में बेंटन हार्बर जैसे सैकड़ों स्कूली जिले हैं। सेंट जोसफ जैसे स्कूली जिलों की भी संख्या सैकड़ों में है।


_photocaption_श्वेत-अश्वेत और अमीर-गरीब में सुविधाओं का अंतर
*photocaption*

मिशिगन झील के किनारों पर बसा 10 हजार की आबादी का बेंटन हार्बर शहर किसी समय फलता-फूलता उद्योग केंद्र था। फिर, उसकी अर्थव्यवस्था धराशायी हो गई। शहर के हाईस्कूल की बिल्डिंग 100 साल पुरानी है। उसके आसपास की सड़कों पर कुछ बड़े घर हैं। कुछ भवन जर्जर हो चुके हैं। कारोबार बंद पड़े हैं। कई दुकानें खाली हैं। सरकारी स्कूलों (पब्लिक स्कूल) में शिक्षा का स्तर निम्न है। उनकी आर्थिक हालत खराब है। पिछले साल मिशिगन के गवर्नर ग्रेचेन ह्विटमेर ने हाईस्कूल बंद करने और छात्रों को नजदीकी जिलों में भेजने का प्रस्ताव रखा था।


समाज का भी दबाव रहता है। नौकरी या काम पर लौटते ही आपसे सबकुछ ठीक-ठीक करने की अपेक्षा होती है। निश्चित समय पर काम पूरा न करने पर नहीं माना जाता कि बच्चे की देखभाल ने आपके काम पर प्रभाव डाला होगा। लेकिन, इस स्थिति में आपको अपने हिसाब से चलना पड़ता है। एक नए जीवन की देखभाल करते हुए अपने काम निपटाना पड़ते हैं। इस स्थिति में आपको सब ठीक है जैसै शब्द ही बहुत सहारा देते हैं।

(टाइम और टाइम लोगो रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क हैं।
इनका उपयोग अनुबंध के तहत किया गया है।)

यह भी कि क्या डिलीवरी के बाद उसका शरीर पहले जैसा है? ऐसा सवाल बेहद सतही है। इन बातों पर कम चर्चा होती है कि नव प्रसूता ने क्या ठीक से काम संभाल लिया है। उसका काम कैसा है? शिशु जन्म के बाद महिला के शरीर के हार्मोन्स बदलते हैं। उसकी नींद अस्त-व्यस्त हो जाती है। शिशु के कारण उसे रात में बार-बार जागना पड़ता है। मां की पहली जिम्मेदारी बच्चे की देखभाल करने की होती है। ऐसे समय में भी महिलाओं से अपेक्षा रहती है कि वे जैसी प्रसव से पहले थीं, वैसी ही अब भी रहें।


बच्चे का जन्म होने के एक माह बाद ही मैं काम पर लौट आई थी। अपने नए बॉस के सामने स्वयं को साबित करने की चुनौती से जूझ रही थी। मैं ऑफिस जाने से पहले बच्चे को दूध पिलाती थी। मुझे दिन और रात में कई बार ऐसा करना पड़ता था। मैं अपने नवजात बच्चे का ख्याल रखने वाली मां बनने की कोशिश कर रही थी। उसकी बड़ी बहन चाहती थी कि मैं कम से कम एक बार तो उसे भी पर्याप्त समय दूं। उसे गोद में उठाऊं। आखिर वह भी तो छोटी बच्ची है।

ऐसी स्थिति में कई बार मित्रों और परिजनों के दो शब्द चिंतामुक्त कर देते हैं। मैं एक बार रेस्रां में दोस्तों के साथ बैठी थी। बिल चुकाए बिना बाहर निकल आई। फिर याद आया तो लौटी और क्षमा मांगी। उस समय एक सहेली ने कहा, ‘कोई बात नहीं। दरअसल, उसका चार माह का बच्चा है। वह भूल गई होगी’। इससे मुझे बहुत राहत मिली। एेसे शब्दों को हर मौके पर सुनने का मन करता है।

दरअसल, शिशु को जन्म देने के बाद नौकरी और अन्य जगह लोग दूसरे तरीके से सोचते हैं। यह भी कि क्या डिलीवरी के बाद उसका शरीर पहले जैसा है? ऐसा सवाल बेहद सतही है। इन बातों पर कम चर्चा होती है कि नव प्रसूता ने क्या ठीक से काम संभाल लिया है। उसका काम कैसा है? शिशु जन्म के बाद महिला के शरीर के हार्मोन्स बदलते हैं। उसकी नींद अस्त-व्यस्त हो जाती है। शिशु के कारण उसे रात में बार-बार जागना पड़ता है। मां की पहली जिम्मेदारी बच्चे की देखभाल करने की होती है। ऐसे समय में भी महिलाओं से अपेक्षा रहती है कि वे जैसी प्रसव से पहले थीं, वैसी ही अब भी रहें।

पैरेंटिंग : उनसे घर और ऑफिस में कोई यह तो कहे कि सब ठीक है, चिंता करने की जरूरत नहीं है

(© 2019 Time Inc.) सर्वाधिकार सुरक्षित। टाइम मैग्जीन से अनुवादित और Time Inc. की अनुमति से प्रकाशित। पूर्व अनुमति के बिना किसी भी भाषा में पूरा या आंशिक रूप में प्रकाशित करना प्रतिबंधित। टाइम मैग्जीन और टाइम मैग्जीन लोगो Time Inc. के रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क हैं। इनका उपयोग अनुमति लेकर किया गया है।

4

, अमृतसर, रविवार, 15 मार्च 2020
खबरें और भी हैं...