‘आधे-अधूरे’ नाटक में 20वीं सदी के मध्यमवर्गीय परिवारों के हालात दिखाए

Bathinda News - मोहन राकेश का लिखा हिंदी नाटक ‘आधे-अधूरे’ स्त्री-पुरुष के बाह्य और अंतरंग संबंधों की केमेस्ट्री है। शनिवार की शाम...

Oct 13, 2019, 07:35 AM IST
मोहन राकेश का लिखा हिंदी नाटक ‘आधे-अधूरे’ स्त्री-पुरुष के बाह्य और अंतरंग संबंधों की केमेस्ट्री है। शनिवार की शाम रोजगार्डन के बलवंत गार्गी ओपन एयर थिएटर में पेश किए गए मॉडर्न इंडिया के पहले हिंदी नाटक के जरिए कलाकारों ने इन दोनों वर्गों के बीच के प्यार और नफरत को बड़ी ही संजीदगी से पेश किया। नाट्यम के 9वें नाट्यम थिएटर फेस्टिवल की दसवीं प्रस्तुति हिंदी नाटक आधे-अधूरे का निर्देशन रवि तनेजा ने किया। मंच संचालन करते कीरती कृपाल ने स्वागत किया जबकि डॉ. कशिश गुप्ता ने आभार जताया। नाटक की कहानी एक मध्यवर्गीय परिवार के इर्दगिर्द घूमती है। इसमें रिश्तों के टूटने की पीड़ा और जुड़ने का सुखद अहसास भी है। नाटक संदेश देता है कि जो कुछ मिला है उसमें संतुष्ट रहिए अन्यथा जो है वह भी हाथ से चला जाएगा। बीसवीं सदी के मध्यमवर्गीय शहरी परिवारों की सत्यता को उजागर करते नाटक दिखाता है कि प|ी-प|ी कमजोर, खोखले, अधूरे हैं और मुकम्मल परिवार की तलाश में भटकते हैं। नाटक में मध्यमवर्गीय परिवार में पति-प|ी के अलावा दो बेटियां व एक बेटा है।

अधेड़ उम्र में युवक निठल्ला है जबकि उसकी कामकाजी प|ी अपने पति को बेकार मानती है और अपनी जिंदगी से खुश नहीं है। औरत एक, दो, तीन, चार, पांच पुरुषों के संपर्क में आती है लेकिन अभी भी उसकी तलाश अधूरी है। इस दौरान उसे आभास होता है कि पुरुष भी हमेशा नई औरत की तलाश में रहते हैं क्योंकि वे भी अपनी प|ियों से संतुष्ट नहीं हैं। नाटक के शुरू में महिला अपने बेटे की नौकरी लगाने की उम्मीद से बॉस को घर बुलाती है लेकिन उसका पति पराए मर्द के साथ संबंध होने के शक में झगड़ा करता है।

ऐसे माहौल में बच्चे भी बिगड़ जाते हैं, बड़ी बेटी भागकर शादी कर लेती है जबकि बेटा भी कहने से बाहर हो जाता है और परिवार टूटने के कगार पर है। परिवार में खटास और मनमुटाव की वजह से पति व प|ी बारी-बारी से घर छोड़ने का प्रयास करते हैं लेकिन हर बार झगड़ा करके अलग होने का फैसला न करके भारतीय परंपरा को बनाए रखते हैं।

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