पंजाब / खिदराने की ढाब की कहानी: गुरू गोविंद सिंह की फौज ने मुगलों काे भागने पर मजबूर कर दिया था, अब मुक्तसर के नाम से जाना जाता

मुक्तसर का गुरुद्वारा टुट्‌टी गंढी साहिब, जिसका इतिहास मुक्तसर के नामकरण से जुड़ी हुआ है। मुक्तसर का गुरुद्वारा टुट्‌टी गंढी साहिब, जिसका इतिहास मुक्तसर के नामकरण से जुड़ी हुआ है।
शहीदी पार्क में बनाई गई मुक्त-ए-मीनार। शहीदी पार्क में बनाई गई मुक्त-ए-मीनार।
मीनार के स्तंभ पर लिखा खिदराने की ढाब की लड़ाई का इतिहास। मीनार के स्तंभ पर लिखा खिदराने की ढाब की लड़ाई का इतिहास।
गुरुद्वारा टिब्बी साहिब। गुरुद्वारा टिब्बी साहिब।
गुरुद्वारा दातनसर साहिब। गुरुद्वारा दातनसर साहिब।
मलोट रोड पर श्रद्धालुओं के मनोरंजन के लिए लगा मेला। मलोट रोड पर श्रद्धालुओं के मनोरंजन के लिए लगा मेला।
मेले के लिए जारी किया गया रूट प्लान। मेले के लिए जारी किया गया रूट प्लान।
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मुक्तसर का गुरुद्वारा टुट्‌टी गंढी साहिब, जिसका इतिहास मुक्तसर के नामकरण से जुड़ी हुआ है।मुक्तसर का गुरुद्वारा टुट्‌टी गंढी साहिब, जिसका इतिहास मुक्तसर के नामकरण से जुड़ी हुआ है।
शहीदी पार्क में बनाई गई मुक्त-ए-मीनार।शहीदी पार्क में बनाई गई मुक्त-ए-मीनार।
मीनार के स्तंभ पर लिखा खिदराने की ढाब की लड़ाई का इतिहास।मीनार के स्तंभ पर लिखा खिदराने की ढाब की लड़ाई का इतिहास।
गुरुद्वारा टिब्बी साहिब।गुरुद्वारा टिब्बी साहिब।
गुरुद्वारा दातनसर साहिब।गुरुद्वारा दातनसर साहिब।
मलोट रोड पर श्रद्धालुओं के मनोरंजन के लिए लगा मेला।मलोट रोड पर श्रद्धालुओं के मनोरंजन के लिए लगा मेला।
मेले के लिए जारी किया गया रूट प्लान।मेले के लिए जारी किया गया रूट प्लान।

  • 21वीं तिथि बैसाख 1762 विक्रमी संवत को लड़ी गई थी ऐतिहासिक लड़ाई, आनंदपुर साहिब में 40 सैनिकों ने गुरूजी का साथ छोड़ दिया था
  • वापस युद्ध के मैदान में लौटकर खिदराने की ढाब पर हुए थे शहीद, भाई महा सिंह की विनती पर गुरूजी ने फाड़ दिया था बेदावा
  • मुक्त कर देने की परंपरा के नाम पर पहले मुक्तिसर, फिर मुक्तसर और श्री मुक्तसर साहिब के नाम से जाना जाता है इस जगह को
  • 7 नवंबर 1995 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हरचरण सिंह बराड़ ने किया था मुक्तसर को जिले बनाने का ऐलान

Dainik Bhaskar

Jan 12, 2020, 08:01 PM IST

जालंधर/मुक्तसर (बलराज सिंह). मुक्तसर में पवित्र माघी मेले की तैयारियां हो चुकी हैं। मालवा क्षेत्र का वही मुक्तसर, जिसका गुरुओं-पीरों की धरती पंजाब के ऐतिहासिक स्थलों में नाम बड़े अदब से लिया जाता है। बड़ी रोचक कहानी है मुक्तसर की। राजस्थान के रेगिस्तानी भाग से सटे इस इलाके में कभी पानी की कमी थी। अगर मिलता भी तो वह खारा होता था। फिर यहां जलसंरक्षण के मकसद से खिदराणा नामक एक महापुरुष ने एक ढाब (स्वच्छ जल का तालाब) खुदवाई। इस वजह से यह इलाका खिदराने की ढाब के नाम से मशहूर था। दूसरी बड़ी महत्ता इसकी यह है कि यहां गुरु गोबिंद सिंह ने मुगल हुकूमत के खिलाफ अपनी सांसारिक भूमिका का आखिरी युद्ध लड़ा था। जिस वजह से पंजाब में माघी स्नान का सबसे बड़ा महत्व मुक्तसर का माना जाता है। आइए,  इसके बारे में विस्तार से जानते हैं...

बैसाख 1705 विक्रमी संवत में जब गुरू गोबिंद सिंह ने धर्मयुद्ध करते हुए आनंदपुर साहिब का किला छोड़कर मालवा का रुख किया तो कोट कपूरा पहुंचकर चौधरी कपूरे से किले की मांग की, लेकिन उसने मुगल हुकूमत से डरते हुए मदद करने से इनकार कर दिया। इसके बाद गुरूजी खिदराने की ढाब पहुंचे। साथ ही दुश्मन की फौज भी यहां पहुंच गई। कहा जाता है कि 21वीं तिथि को भयंकर युद्ध के बीच गुरू की फौज के वो 40 महान योद्धा, जो आनंदपुर साहिब की लड़ाई के वक्त को बेदावा (लिखा न आप हमारे गुरु, न हम आपके सिंह) लिखकर साथ छोड़ गए थे, दुश्मन से लोहा लेते हुए शहीद हो गए। हालांकि इस लड़ाई के चलते मुगलों की फौज मैदान छोड़कर भागने को मजबूर हो गई थी। जहां तक गुरू से विमुख हुए 40 वीरों के फिर से साथ आने की बात है, उसके बारे में इतिहासकारों के मुताबिक उन्हें आत्मग्लानि हुई और फिर माता भाग कौर के नेतृत्व में वो आकर लड़े। अंत में जब इन्हीं 40 वीरों में से भाई महा सिंह नामक योद्धा युद्ध को गुरूजी के दर्शन हुए तो वह जख्मी हालत में थे। यहां भाई महा सिंह को गुरूजी ने कहा कि उनकी वीरता से प्रसन्न हैं तो भाई महा सिंह ने गुरूजी से अपनी भूल सुधारने का आग्रह किया। इस पर गुरूजी ने उन सभी वीर शहीदों को माफ कर सम्मान बख्शा। यही है वह कहानी, जिसके बाद खिदराने की ढाब का नाम मुक्तिसर पड़ा।

मुक्तिसर से मुक्तसर और श्री मुक्तसर साहिब तक

इसके बाद स्थानीय बोलचाल के हिसाब से मुक्तिसर से यह मुक्तसर में तब्दील हो गया। 7 नवंबर 1995 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हरचरण सिंह बराड़ ने इस इलाके को जिले का गौरव प्रदान किया था। बीते वर्षाें में पंजाब सरकार इसे मुक्तसर की बजाय श्री मुक्तसर साहिब के नाम से घोषित कर चुकी है। यहां एक नहीं, बल्कि कई पवित्र गुरूघर हैं, जहां माघी के मौके पर अपार आस्था देखने को मिलती है।


श्री मुक्तसर साहिब के ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल

  • गुरुद्वारा टुट्टी गंढी साहिब: यही वो जगह है, जहां भाई महा सिंह का अपनी गोद में लेकर बेदावा फाड़ दिया और सभी वीरों को बागी न मारकर फिर से अपने साथ जोड़ लिया था। पंजाबी में टुट्‌टी गंढी, लेकिन हिंदी भाषा में टूटी हुई गांठ देना के नाम से इस गुरुद्वारे को जाना जाता है।
  • गुरुद्वारा तंबू साहिब: मुगलों के साथ खिदराने के युद्ध के समय जिस स्थान पर सिखों द्वारा तंबू लगाए गए थे, वहां गुरुद्वारा तंबू साहिब सुशोभित है। माता भाग कौर की याद में भी इसके पास गुरुद्वारा भाग कौर बना है।
  • गुरुद्वारा शहीद गंज साहिब: इस स्थान पर गुरू गोबिंद सिंह जी ने क्षेत्र के सिखों की सहायता से मुगलों के साथ युद्ध करते समय शहीद हुए चालीस मुक्तों का अंतिम संस्कार किया था। जिस कारण यहां पर गुरुद्वारा शहीद गंज साहिब सुशोभित है।
  • गुरुद्वारा रकाबसर साहिब: यह वह स्थान है, जहां दशमेश पिता के घोड़े की रकाब टूट गई थी। जब गुरू साहिब टिब्बी साहिब से उतर कर खिदराने की रणभूमि की ओर चले तो घोड़े की रकाब पर पांव रखते ही वह टूट गई थी। अब तक वह टूटी हुई रकाब उसी प्रकार सुरक्षित रखी हुई है तथा वहां गुरुद्वारा रकाबसर बना हुआ है।
  • गुरुद्वारा तरनतारन दुख निवारण साहिब: गुरुद्वारा तरनतारन दुख निवारण बठिंडा रोड पर स्थित है जहां प्रत्येक रविवार श्रद्धालु सरोवर में स्नान करते हैं। चालीस मुक्तों की इस पवित्र धरती पर माघी के शुभ अवसर पर दूर-दूर से लाखों की संख्या में आए श्रद्धालु यहां बने पवित्र सरोवर में स्नान कर अपने जीवन को सफल बनाते हैं।
  • शहीदी पार्क: थोड़ी दूर ही शहीदी पार्क भी है, जहां एक मीनार स्थापित है। इस मीनार का निर्माण धातु के चालीस छल्लों से किया गया है, जो उन चालीस वीर शहीदों की शहदात का प्रतीक हैं। मीनार पर खिदराने की ढाब का तमाम इतिहास अंकित है।


इस तरह से हैं मेले की तैयारियां

  • यहां माघी मेले की रस्मी तौर पर शुरुआत शुक्रवार काे हो चुकी है, पर कई दिन तक चलने वाले इस खास मेले की असल रौनक मकर संक्रांति वाले दिन देखने को मिलती है। धार्मिक मेले में दरबार साहिब में माथा टेकने आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के लिए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने पूरा प्रबंध किया है। वहीं प्रशासन की तरफ से भी पुख्ता प्रबंध किए गए हैं। श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए करीब 5 हजार पुलिस कर्मी भी तैनात होंगे।
  • लोगों व बच्चों के मनोरंजन के लिए मेला मलोट रोड पर ही लगाया गया है, जिसमें सर्कस, झूले, किस्ती, गधा सर्कस के अलावा के अलावा अन्य मनोरंजन के साधन आए हुए हैं।
  • मंडल रेलवे मैनेजर उत्तरी रेलवे फिरोजपुर ने माघी मेले पर 14, 15 और 16 जनवरी को श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए स्पेशल ट्रेन चलाने का आदेश जारी किया है। यह गाड़ी बठिंडा से सुबह 8:20 बजे चलकर 9:35 बजे कोटकपूरा, 10:48 बजे मुक्तसर, 11:15 बजे लक्खेवाली, 12:15 बजे फाजिल्का पहुंचेगी।
  • वापसी में फाजिल्का से शाम को 5:00 बजे चलकर 6:03 बजे मुक्तसर, 7:00 बजे कोटकपूरा और रात 8:40 बजे बठिंडा पहुंचेगी।
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