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नहीं थम रहा काला पीलिया, 2 साल 3100 मरीज आए सामने

जिले में हेपाटाइटिस बड़ी समस्या बनकर सामने आ रहा है। साल 2016 से लेकर जनवरी 2018 तक अकेले सिविल अस्पताल में 3091 मरीज सामने...

Dainik Bhaskar

Feb 01, 2018, 02:05 AM IST
जिले में हेपाटाइटिस बड़ी समस्या बनकर सामने आ रहा है। साल 2016 से लेकर जनवरी 2018 तक अकेले सिविल अस्पताल में 3091 मरीज सामने आ चुके हैं जबकि इतनी ही तादाद प्राइवेट’अस्पतालों में उपचार करवा रहे लोगों की है। इसका मुख्य कारण काला पीलिया के बारे में जागरूकता की कमी है। वक्त पर इलाज हो तो मरीज ठीक हो सकता है। वैक्सीन यानी टीका लगवा लेने से भी न सिर्फ खतरा कम होता है, बल्कि महंगे इलाज से भी बचा जा सकता है। सेहत विभाग की जांच में सामने आया है कि काला पीलिया के कुल मरीजों में 50 फीसदी तादाद महिलाओं की है।

स्वास्थ्य

मरीजों में 50 फीसदी संख्या महिलाओं की, सरकारी अस्पताल में फ्री किया जाता है इलाज

3 महीने की दवाई व वैक्सीन कोर्स से 50 से अधिक मरीज हुए ठीक

काला पीलिया चेकअप करने के बाद दवाई प्राप्त करते मरीज।

सिविल अस्पताल में सिर्फ दो दिन होते हैं टेस्ट

सिविल अस्पताल के ओपीडी की लैब में काला पीलिया का टेस्ट करने के लिए सेंपल हर रोज लिया जाता है लेकिन टेस्ट सोमवार व वीरवार को ही किया जाता है। टेस्ट की रिपोर्ट में लगभग साढ़े तीन घंटे लगते है। मरीज सिवियां निवासी रेशम सिंह, कर्मजीत सिंह व कोटशमीर वासी प्रीतम सिंह का कहना है कि अस्पताल के लैब में सभी टेस्ट रोजसापा होने चाहिए और रिपोर्ट भी जल्द दी जानी चाहिए।

काला पीलिया हेपेटाइटिस-सी के मरीजों का निजी अस्पतालों में करीब एक लाख रुपए से अधिक में होने वाला इलाज सरकारी अस्पताल में फ्री में किया जा रहा है। मरीज को इलाज के लिए सिर्फ एक टेस्ट अपने खर्च पर करवाना होता है। सिविल अस्पताल में दो साल में 50 से अधिक मरीज 3 महीने की दवाई व वैक्सीन कोर्स लेने से ठीक भी हो चुके हैं। एमडी डाक्टर रमनदीप गोयल ने बताया कि कुछेक टेस्ट अस्पताल में नहीं होता उसे बाहर से करवाए जाता हैं। रक्त में वायरस की मात्रा के आधार पर दवा का कोर्स तय किया जाता है।

एक्सपर्ट लैब में टेस्ट करावाएं : डॉ. गोयल

डाॅ. रमनदीप गोयल ने बताया कि हेपेटाइटिस बी या सी का आसानी से पता नहीं लगता। इसके लिए सेहत विभाग या फिर किसी एक्सपर्ट लैब में टेस्ट कराए जाते हैं। इसका मुख्य लक्षण भूख न लगना, वजन कम होना, बार-बार बुखार, लगातार कमजोरी, पेट में पानी भर जाना, कुछ समय बाद खून की उल्टियां होना, रंग काला होने लगना आदि है। अल्कोहल, स्टेरॉयड, प्रदूषित सूई, प्रदूषित खून, सेक्सुअल ट्रांसमिशन के अलावा बच्चे को मां से हो सकता है। उन्होंने कहा कि काला पीलिया के बारे में लोगों जानकारी कम है। बचाव के लिए उन्हें जागरूक होने होगा।

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