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मरने से पहले देखना चाहती हूं बेटे का शहीदी स्मारक

एक आेर यहां देश की आजादी की 71वीं वर्षगांठ के जश्न को धूमधाम से राष्ट्रीय स्तर पर मनाने की तैयारियां अंतिम चरण में...

Bhaskar News Network | Last Modified - Aug 13, 2018, 02:05 AM IST

मरने से पहले देखना चाहती हूं बेटे का शहीदी स्मारक
एक आेर यहां देश की आजादी की 71वीं वर्षगांठ के जश्न को धूमधाम से राष्ट्रीय स्तर पर मनाने की तैयारियां अंतिम चरण में हैं और आजादी की इस गरिमा को बरकरार रखने के लिए देश की बलिवेदी पर प्राणों की आहुति देने वाले वीर सेनानियों को राष्ट्र एकसुर में श्रद्धांजलि अर्पित करेगा। वहीं इस जश्न-ए-आजादी के पीछे गहन अंधेरे की स्याह चादर में दबी कई शहीदों के परिवारों की करुणामय सिसकियां देशवासियों का ध्यान अपनी तरफ खींच रही हैं। इसके बावजूद शहीदों के इन परिवारों के रिसते जख्मों पर मरहम लगाने वाला कोई नजर नहीं आता। एक तरफ देश की बलिवेदी पर हंसते हंसते अपने प्राण न्यौछावर करने वाले इन शहीदों के परिजनों ने उफ तक नहीं किया। तो दूसरी तरफ सरकार की उपेक्षा का दंश झेल रहे इन परिवारों को जंग-ए-आजादी का यह जश्न बेमानी सा लगने लगा है। गांव मराड़ा के शहीद लांसनायक बिक्रम दत्त के परिजन भी इन्हीं परिवारों में शामिल हैं। जिन्होंने 27 जनवरी 2007 को जम्मू-कश्मीर के लेह सेक्टर में पाक सेना से लोहा लेते हुए अपने 26 वर्षीय बेटे को राष्ट्र की बलिवेदी पर कुर्बान किया।

गुमनामी के अंधेरे में जीवन गुजार रहा मराड़ा गांव के शहीद लांसनायक बिक्रम दत्त का परिवार, मां बोली-

तो कोई मां भविष्य में अपने बेटे को सेना में नहीं भेजेगी : कुंवर विक्की

शहीद परिवार के साथ दुख सांझा करने पहुंचे शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के महासचिव कुंवर रविंदर सिंह विक्की ने कहा कि अगर सरकार इन शहीद परिवारों की इसी तरह उपेक्षा करती रही तो भविष्य में कोई भी मां अपने बच्चे को सेना में भेजने से पहले कई बार सोचेगी। सरकार को चाहिए कि शहीद की चिता ठंडी होने के साथ ही अपनी घोषणाओं को अमलीजामा पहनाकर शहीद परिवारों को मनोबल बढ़ाए।

शहीद लांसनायक बिक्रम दत्त की माता सोमा देवी ने नम आंखों से बताया कि जिस दिन उनके बेटे की शहादत हुई उसके एक सप्ताह बाद उसकी शादी थी।

11 साल बाद भी सरकार ने पूरे नहीं किए वादे शहीद की माता सोमा देवी व भाई सुरिंदर कुमार ने कहा कि उनके बेटे के अंतिम संस्कार के मौके पर पहुंचे कई नेताओं व प्रशासनिक अधिकारियों ने एक यादगारी गेट व लाइब्रेरी बनाने, स्कूल का नाम शहीद के नाम पर रखने व उनके छोटे बेटे को नौकरी देने की घोषणा की थी। मगर बेटे की शहादत के 11 साल बाद भी सरकार ने अपने वादों को पूरा नहीं किया। शहीद की मां ने बताया कि उनकी आखिरी इच्छा है कि वह मरने से पहले अपने शहीद बेटे की याद में बना कोई स्मारक देख ले। सालों में शासन-प्रशासन का कोई अधिकारी उनकी सुध लेने नहीं आया। सिर्फ शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के सदस्य ही उनका दुख बांटकर उनका मनोबल बढ़ाते हंै।

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