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रसायनमुक्त खेती; वेस्ट को आग नहीं लगाते, 36 हजार पेड़-पौधों के 100 ट्राली ग्रीन वेस्ट को मिट्टी में मिला रहे, बढ़ती है मजबूती और उर्वरक क्षमता

Ferozepur News - जीएनडीयू में प्रकृति संरक्षण की मिसाल गुरु नानकदेव के नाम पर बनी गुरु नानकदेव यूनिवर्सिटी गुरु साहिबान के...

Jan 20, 2020, 07:46 AM IST
KHAI News - chemical free farming do not fire the waste 100 trolleys of 36 thousand trees and plants are adding green waste to the soil increases strength and fertilizer capacity
जीएनडीयू में प्रकृति संरक्षण की मिसाल

गुरु नानकदेव के नाम पर बनी गुरु नानकदेव यूनिवर्सिटी गुरु साहिबान के उपदेश ‘पवन गुरु पानी पिता माता धरत महत...’ पर पहरा बैठाते हुए देश की उन यूनिवर्सिटियों में शुमार हो गई है, जहां पर्यावरण बचाने के चौतरफा प्रयास हो रहे हैं। वर्तमान हालात यह हैं कि इसके कैंपस में गत दो बरस से कूड़ा-कर्कट खास करके ग्रीन वेस्ट को आग नहीं लगाई गई। और तो और यहां खेती-बागवानी भी कीटनाशक और रासायनिक खादों के बगैर होती है। वेस्ट को मिट्‌टी में मिलाया जाता है, जिससे मिट्‌टी की उर्वरक क्षमता और मजबूती बढ़ती है।

ट्रैक्टर से जमीन में मिलाते हैं वेस्ट : डॉ. जेएस बिलगा का कहना है कि डॉ. जसपाल सिंह संधू ने जब वीसीशिप संभाली तो उन्होंने पर्यावरण को बचाने में खास गंभीरता दिखाई। उन्होंने खुद कहा कि जितना हो सके पर्यावरण को संभालो, एक भी कीट-पतंगा, जीव-जंतु नहीं मरना चाहिए। उसी पर अमल करते हुए उन्होंने देश के विभिन्न इलाकों से और पेड़-पौधे मंगवाए। इसके साथ ही इनसे निकलने वाले ग्रीन वेस्ट, जिसमें पत्तियां, टहनियां, घास-फूस आदि को मिट्टी में ही मिलाने का शुरू किया गया। उनका कहना है कि यहां से साल में 100 ट्राली से अधिक ग्रीन वेस्ट निकलता है और उसे वहीं पर मिट्टी में ट्रैक्टर से मिक्स कर दिया जाता है।

पेड़-पौधों के आसपास पत्ताें को मिट्‌टी में मिलाने के विशेष प्रबंध : कैंपस में एक भी तिनके या पत्ते को जलाया नहीं जाता। उसे मिट्टी और पेड़ों की जड़ों के इर्दगिर्द छोड़ दिया जाता है और वह खाद में तब्दील हो जाता है। एेसा करने से जहां खर्च कुछ नहीं होता वहीं मिट्टी की पोषकता बढ़ती है और पेड़-पौधों को खुराक भी मिल जाती है। 90 एकड़ में खेती होती है, लेकिन वहां भी जीरो बजट का ख्याल रखा जाता है।

नए पौधे लगाने से बढ़े पक्षी : डॉ. बिलगा के मुताबिक इन सबके चलते कैंपस का वातावरण बेहतर हुआ है और कीट पतंगे, तितलियां, मधुमक्खियां, भौंरे, मोर, तोते, कोयल आदि फिर से आबाद होने लगे हैं। उनका कहना है कि यूनिवर्सिटी प्रबंधन यही चाहता है कि लोग भी इससे सीख लें।

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