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श्रद्धा वह चमत्कारिक शक्ति है जो भक्त को पाषाण में भी प्रभु के दिव्य रूप का दर्शन कराती है : स्वामी दिव्यानंद

Ferozepur News - श्री मोहन जगदीश्वर आश्रम कनखल हरिद्वार के अनंत श्री विभूषित 1008 महामंडलेश्वर स्वामी दिव्यानंद गिरि जी महाराज ने...

Jan 19, 2020, 07:50 AM IST
KHAI News - shraddha is the miraculous power that makes the devotee see the divine form of god even in the stone swami divyananda
श्री मोहन जगदीश्वर आश्रम कनखल हरिद्वार के अनंत श्री विभूषित 1008 महामंडलेश्वर स्वामी दिव्यानंद गिरि जी महाराज ने कहा कि श्रद्धा वह चमत्कारिक शक्ति है जो भक्त को पाषाण में भी प्रभु के दिव्य रुप का दर्शन कराती है। अगर दिल में सच्ची श्रद्धा है तो कठिन से कठिन कार्य भी सहज व सरलता से ही हो जाते हैं। महामंडलेश्वर स्वामी दिव्यानंद गिरि जी महाराज ने ये विचार शनिवार को श्री रघुनाथ मंदिर में माघ महात्म्य भक्ति ज्ञान यज्ञ कथा के आठवें दिन प्रवचनों की अमृतवर्षा करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मन में ही स्वर्ग होता है और मन में ही नरक। व्यक्ति खुद ही घर-परिवार को स्वर्ग बनाता है और खुद ही नरक। व्यक्ति के स्वभाव को बदलना बड़ा कठिन है। मनुष्य की भावना पर सब कुछ निर्भर रहता है। जिस प्रकार कुरूक्षेत्र की धरती पर कौरवों और पांडवों के दरमियान युद्ध हुआ था। उसी प्रकार मनुष्य के मन में हर समय इच्छाओं तथा तृष्णाओं का युद्ध चलता रहता है। दिव्यानंद जी ने कहा कि जो व्यक्ति अच्छे कर्म नहीं करता उसे आखिर में मृत्यु के मुख में जाना पड़ता है। इस जगत में कोई भी सगा-संबंधी जीव को उसके किए गए कर्मों के फल से बचा नहीं सकते। मनुष्य अंत समय में खाली हाथ ही चला जाता है।

जीवन में प्रेम के बीज बोने पर प्रेम के फल होंगे अंकुरित : स्वामी दिव्यानंद जी महाराज ने कहा कि मनुष्य जैसे कर्म करेगा उसका ा वैसा ही फल मिलेगा। अर्थात जैसे बीज बोओगे वैसा फल पाओगे। मनुष्य क ी हर सोच उसके जीवन के खेत में बोया गया एक बीज ही है। यदि मनुष्य अच्छी सोच के बीज बोएगा तो अच्छा फल मिलेगा। अगर बुरी सोच के बीच बोएगा तो बबूल ही मिलेगा। भविष्य को स्वर्णमयी बनाने के लिए उन बीजों का ध्यान देना होगा जो आज बो रहे हैं। प्रेम के बीज बोएंगे तो प्रेम के ही फल अंकुरित होकर आएंगे। क्रोध और गाली-गलौच के बीच बोएंगे तो खुद के लिए विषैले तथा व्यंग भरे वातावरण का निर्माण होगा। मनुष्य की सोच जैसी होगी उसके विचार भी वैसे बन जाएंगे।

सारा जगत है शिव

महामंडलेश्वर स्वामी दिव्यानंद जी महाराज ने शिव महिमा सुनाते हुए कहा कि शिव ही सत्य है, शिव ही सुंदर है। सब कुछ शिव ही है। सारा जगत शिव है। यह जगत शिव से उत्पन्न हुआ है और शिव में ही विलीन हो जाता है। जगत की उत्पत्ति शिव भगवान ही करते हैं। आखिर में सब कुछ खत्म हो जाता है मगर वहीं शेष रह जाते हैं। जिस प्रकार अंधकार में रस्सी सर्प के समान लगती है। उसी प्रकार यह जगत परमात्मा शिव का शुद्ध स्वरूप होने के बावजूद माया के प्रभाव के कारण स्वप्न दिखाई देता है। माया की भ्रांति के कारण ही भगवान के दर्शन नहीं होते। सत्संग और संतों की शरण में जाने के बाद ही परमात्मा का बोध होता है।

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