रामायण कल्प वृक्ष की छाया, जाे भी इसके निकट अाता है उसके दुख दूर हाे जाते हैं : कमलानंद गिरि

Ferozepur News - श्री कल्याण कमल आश्रम हरिद्वार के अनंत श्री विभूषित 1008 महामंडलेश्वर स्वामी कमलानंद गिरि जी महाराज ने श्रीराम कथा...

Bhaskar News Network

Oct 12, 2019, 08:35 AM IST
Malot News - the shadow of the ramayana kalpa tree wherever it comes near its sorrows are overcome kamalanand giri
श्री कल्याण कमल आश्रम हरिद्वार के अनंत श्री विभूषित 1008 महामंडलेश्वर स्वामी कमलानंद गिरि जी महाराज ने श्रीराम कथा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि गोस्वामी तुलसी दास जी रामायण का प्रचार नहीं करते तो कलयुग के कुटिल जीवों का कौन निस्तार करता। रामायण की कथा परमात्मा के दिव्य चरित्र के साथ-साथ प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की दिव्य कथा है। हम प्रमाण सहित कह सकते हैं कि जीवन की ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसका उत्तर हमें रामायण से न मिल सके। रामायण में मनुष्य के सभी प्रश्नों के उत्तर छिपे हैं। बस उसे बुद्धि वाले श्रोता ही ढूंढ सकते हैं और उनका ज्ञान कर सकते हैं। अगर सच्ची निष्ठा, प्रेम हो तो श्री राम कथा मनुष्य के हर प्रश्न का उत्तर देती है और हर संकट दूर करती है। महामंडलेश्वर स्वामी कमलानंद गिरि जी महाराज ने ये विचार श्री कल्याण कमल सत्संग मंडल मलोट की ओर से श्री कृष्णा मंदिर, मंडी हरजी राम मलोट में आयोजित श्री रामायण उत्तर कांड प्रवचन कार्यक्रम के तीसरे दिन श्रद्धालुओं के विशाल जनसमूह के समक्ष प्रवचनों की अमृतवर्षा करते हुए व्यक्त किए। स्वामी कमलानंद जी ने कहा कि रामायण कल्प वृक्ष की छाया है। जो भी इसके निकट आया है उसके सभी दु:ख दूर हो गए हैं। सात कांड जो इस कल्प वृक्ष के सात स्तंभ हैं और दोहे सुंदर-सुंदर छोटी शाखाएं हैं। सोरठे डाली हैं तो चौपाइयां कल्प वृक्ष के पत्ते हैं। छन्दों की शोभा अधिक है। मानो छवि से भरे अंकुर हैं। इसके अक्षर ही मानो गहे-गहे घने इस कल्प वृक्ष के फूल हैं। कविता अद्भुत सुगंध है। अनेक प्रकार के अर्थ ही इसके फल हैं। श्रेष्ठ बुद्धि वाले श्रोता ही इसके स्वाद को जान सकते हैं। भक्ति, ज्ञान, वैराग्य इसका सुंदर रस है। निर्गुण व सगुण इसके दो बीज हैं।

श्री उत्तर कांड प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए स्वामी कमलानंद जी महाराज ने कहा कि श्री हनुमान जी से भरत जी ने जैसे ही सुना कि प्रभु श्री राम आ रहे हैं तो भरत जी सब दु:ख भूल गए। जैसे प्यासे को अमृत पिलाने से दु:ख नहीं रहता। उसी तरह भरत जी सभी दु:ख भूल गए और उनकी आंखों से अश्रु धारा बह उठी। शरीर रोमांचित व पुलकित हो उठा, क्योंकि हनुमान जी के हृदय में सीता-राम विराजमान थे तो जब भरत हिरदे श्री हनुमान जी के हृदय से मिला तो साक्षात अनुभव कर रहे हैं कि ‘’मिले आज मोहि सम पिरोते राम ही मिल रहे हैं। इस मौके पर मंदिर प्रांगण प्रभु श्री राम चंद्र व वीर हनुमान जी के जयकारों से गूंज उठा।

स्वामी कमलानंद जी।

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