उनके यहां अच्छे अस्पताल, सड़कें या पेट्रोल पंप नहीं हैं।

Ferozepur News - उनके यहां अच्छे अस्पताल, सड़कें या पेट्रोल पंप नहीं हैं। स्कूल भी सरकारी हैं जहां मराठी माध्यम से पढ़ाई होती है,...

Nov 11, 2019, 08:05 AM IST
उनके यहां अच्छे अस्पताल, सड़कें या पेट्रोल पंप नहीं हैं। स्कूल भी सरकारी हैं जहां मराठी माध्यम से पढ़ाई होती है, लेकिन उनमें शौचालय नहीं हैं। महाराष्ट्र के सीमावर्ती तालुका डूडामार्ग- जहां 55 गांव हैं और करीब 80,000 की आबादी है। यहां के हताश-परेशान युवाओं की नजरें गोवा की ओर लगी हैं, जहां उनमें से अधिकांश काम करते हैं या उनके परिवार वहां पर बस चुके हैं। अब ये लोग अपने इलाके को गोवा के साथ मिलाने की मुहिम के लिए समर्थन जुटा रहे हैं। इलाके के अधिकांश युवा काम के लिए रोज गोवा के वॉस्को और वरना जाते हैं। हर तीन महीने में वहां से 100 किमी दूर गोवा के अस्पताल तक ले जाने में एक न एक मरीज की मौत हो जाती है।

हालांकि मुझे इस काम ने अपने एक परिचित एडवोकेट दीपक शेषराव मापरी की याद दिला दी जो अब महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले के सत्र न्यायालय में प्रैक्टिस कर रहे हैं। जब 1985-86 में वे बुलढाणा के लोनार तालुका के ममताल में पांचवीं के छात्र थे, तब उनकी उम्र के कई बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी थी, क्योंकि लोनार स्थित उनका शिवाजी हाईस्कूल उनके गांव ममताल से 7 किमी दूर था। सड़क की हालत इतनी खराब थी कि उस पर बैलगाड़ी चलाना भी दूभर था। हर छात्र को हर रोज आने-जाने में कुल 14 किमी पैदल यात्रा करनी पड़ती थी और स्कूल का समय सुबह 11 बजे और शाम 5 बजे के बीच था। चूंकि सर्दियों में दिन छोटे होते थे, तो ऐसे में बच्चों को अंधेरा होने की वजह से घर जल्दी लौटना पड़ता था, क्योंकि रास्ते में तीन नदियां पड़ती थीं।

दीपक आसानी से हार मानने वाले बच्चों में से नहीं था। उसमें और उसके कुछ दोस्तों में पढ़ने की बहुत ज्यादा ललक थी। वे हर दिन अपने स्कूल की डगर पर निकल पढ़ते थे, जबकि कई बार ऐसा होता था कि बारिश में बाढ़ के कारण उन्हें नदी पार नहीं करने दी जाती थी। ऐसे में उन्हें पानी उतरने तक पास के गांव सरस्वती में ठहरना पड़ता था और वे देर रात घर लौटते थे।

अब सीधे 1999 में चलते हैं। कानून की डिग्री लेने के बाद उसने बुलढाणा में वकालत की प्रैक्टिस शुरू की। नवंबर 2000 में उसने सबसे पहले डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के पास एसटी बस सेवा के लिए एक अपील की और इस सेवा को शुरू करने के लिए राज्य परिवहन को पत्र लिखा। इस पर विभाग ने यह कहते हुए रिपोर्ट दी कि सड़क की स्थिति बस चलाने लायक नहीं है। इसके बाद दीपक ने भवन एवं निर्माण विभाग से सम्पर्क किया और रोड बनाने की मांग की। मांग सुनी गई, लेकिन काम चलाऊ रोड बना दिया गया, बस शुरू हो गई। इससे उस गांव की सूरत पूरी तरह बदल गई। बच्चे स्कूल जाने लगे और कृषि उत्पाद तेजी से बिकने लगा, जिसने गांव की पूरी लाइफस्टाइल बदल गई। सबका ध्यान डामक की अच्छी सड़क बनाने की ओर गया। हालांकि गांव वालों को यह समझाना मुश्किल हो रहा था कि एक साधारण नागरिक भी ऐसे बड़े सार्वजनिक काम करवा सकता है, क्योंकि वे मानते थे कि सिर्फ नेता ही ये सब करा सकते हैं।

जैसा हर जगह होता है, यहां भी हुआ कि इस लोनार-ममताल-बीबी मार्ग के लिए सत्ता में बैठे नेता अपना श्रेय लेने में पीछे नहीं रहे, जबकि इसके लिए जी-जान लगा देने वाले दीपक को लगभग सभी भूल गए। इस वाकये से मुझे महाभारत की कथा से भीष्म और रामायण से जटायु याद आते हैं। भीष्म बहुत शक्तिशाली थे, लेकिन द्रौपदी की सहायता नहीं कर पाए, जटायु बूढ़े और दुर्बल थे, फिर भी उन्होंने सीता की मदद करने की कोशिश की। भीष्म बड़े संस्कारी और सुशिक्षित थे, लेकिन एक नारी की मदद के लिए उन्होंने अपनी असंवेदनशीलता दिखाई, जबकि जंगल में रहने वाले गिद्ध स्वरूप जटायु ने ऐसे काम में अति संवेदनशीलता दिखाई। दिलचस्प है कि द्रौपदी ने तो भीष्म से मदद मांगी थी जबकि सीता ने जटायु से नहीं मांगी। इसका परिणाम क्या हुआ; भीष्म जीवित रहे, लेकिन अपनी अंतरात्मा में रोज मरते रहे, जबकि जटायु मृत्यु को प्राप्त हो गए, लेकिन अपनी अंतरात्मा के लिए अनंत काल तक जीवित रहे।

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