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सरकार के नौकरी देने, गेट बनाने के वादे अभी भी अधूरे, परिजन नाराज

भारतीय सेना के गौरवमयी इतिहास की मिसाल है कारगिल युद्ध। भारतीय सेना हर वर्ष 26 जुलाई को इसे कारगिल विजय दिवस के रूप...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jul 26, 2018, 02:05 AM IST

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    भारतीय सेना के गौरवमयी इतिहास की मिसाल है कारगिल युद्ध। भारतीय सेना हर वर्ष 26 जुलाई को इसे कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाती है। पाकिस्तान के साथ 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने 528 से ज्यादा जवानों की शहादत देकर विजय हासिल कर टाइगर हिल पर तिरंगा फहराया था। जिला होशियारपुर से कारगिल युद्ध में कई जवान शहीद हुए थे, जिनमें मुकेरियां के सबसे ज्यादा जवान शहीद हुए थे। हालांकि शहीदों के परिजनों को इस बात का जरूर मलाल है कि अब देश के लिए शहादत देने के बावजूद सरकारें उनकी सुध नहीं लेतीं। कारगिल विजय दिवस पर दैनिक भास्कर की विशेष रिपोर्ट।

    शहीदों को भूलती जा रही है सरकार : महिंद्र कौर

    गांव रेपुर के 16 डोगरा रेजिमेंट में तैनात जवान राजेश कुमार पुत्र नाथ सिंह ने कारगिल युद्ध में 7 जुलाई 1999 को शहादत पाई थी। माता महिंद्र कौर ने बताया कि राजेश 5 बहनों का इकलौता भाई था और वही उनके बुढ़ापे का भी सहारा था। पिछले 4-5 साल से सरकार उनके बेटे की शहादत को भुला चुकी है। पहले बलिदान दिवस पर कहीं न कहीं उन्हें बुलाकर सम्मान दिया जाता था, पर अब सरकारें कारगिल शहीदों को लगभग भूलती जा रही हैं।

    राजेश कुमार की मां महिंद्र कौर।

    बेटे की याद में न गेट बना और न नौकरी मिली : र|ी देवी

    देस राज की मां र|ा देवी।

    भंडियारां के 18 ग्रेनेडियर रेजिमेंट के शहीद देसराज की माता र|ी देवी अब भी अपने बेटे को याद करके आंसू बहने लग जातीं हैं। र|ी देवी ने बताया कि देसराज की विधवा नीलम देवी अपने बच्चों के साथ अलग रह रही है। देसराज 5 भाई बहनों में चौथे नंबर पर था। जो 20 जुलाई 1999 में कारगिल में शहीद हो गया। र|ी देवी ने भी सरकार के प्रति रोष जताते हुए कहा कि उनके बेटे की याद में न तो यादगारी गेट बना और न किसी सदस्य को नौकरी मिली। उनकी व उनके स्वर्गीय पति की यह चाह थी कि गांव के प्रवेश पर उनके शहीद बेटे की याद में यादगारी गेट बने जो अब तक नहीं बन सका।

    शहीदों से बेरुखी का बर्ताव बंद करे सरकार : जसवंत सिंह

    गांव भंवोताड के 14 जैक राइफल के कारगिल शहीद पवन कुमार ने 5 जून 1999 को देश के लिए अपनी शहादत दी थी। माता बशंबरौ देवी व पिता किशन चंद के 3 बेटों में सबसे छोटे थे शहीद पवन कुमार। शहीद के बड़े भाई जसवंत सिंह ने 19वें कारगिल विजय दिवस पर कारगिल युद्ध में अपने भाई समेत 500 से ज्यादा हुए सभी शहीदों को प्रणाम करते हुए कहा कि उन्हें गर्व है कि बह पंजाब के कंडी क्षेत्र में पैदा हुए। यहां से उनके भाई शहीद पवन कुमार के अलावा कई जवानों ने अपनी जानें देश के लिए कुर्बान की हैं। सरकारों को शहीदों को याद रखते हुए उनके परिवारों के साथ बेरुखी नहीं अपनानी चाहिए।

    पवन कुमार।

    जिला स्तरीय कार्यक्रमाें में बुलाए जाएं शहीदों के परिजन : शीला देवी

    शहीद पवन सिंह की मां शीला देवी व भतीजी।

    भाई जसवंत सिंह

    गांव नंगल विहांला के 13 जैक राइफल के कारगिल शहीद पवन सिंह, जिन्होंने 18 जून 1999 को देश के लिए अपनी शहादत दी थी। माता शीला देवी व पिता जोगिंद्र सिंह यहां अपने बेटे की शहादत पर गर्व महसूस करते हैं। वहीं उनमें भी इस बात को लेकर सरकारों के प्रति रोष है कि वह कुछ समय बाद शहीदों को भूल जाती हैं। माता शीला देवी ने कहा कि अगर सरकारें मन से विजय दिवस मनाती हैं तो सरहदों पर विजय का ढंका बजाने बाले अपने उन शहीद सपूतों जिन्होंने युद्ध में विजय दिलवाने के लिए अपनी जानें न्यौछावर कर दीं के परिवारों को जिला स्तर पर आयोजित कार्यक्रमों में जरूर बुलाएं।

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