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सुरमे की रस्म के दौरान हुई मारपीट, दूल्हे को इंसाफ दिलवाने उतरा एलायंस

इंसाफ मिलने का आश्वासन मिला तो उसके बाद बारात वहां से रवाना हुई।

Dainik Bhaskar

Dec 04, 2017, 04:20 AM IST
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गुरदासपुर. 29 नवंबर को थाना दोरांगला के गांव कुत्थी में एक दलित परिवार से संबंधित बीएसएफ के जवान की शादी थी। घर के बाहर दूल्हे की भाभियां सुरमे की रस्म अदा कर रही थीं तो एक युवक वहां ट्रैक्टर-ट्राली लेकर पहुंच गया और उनसे रास्ता देने को कहा। बारातियों ने उसे थोड़ी देर रुकने को कहा तो उक्त व्यक्ति ने अन्य लोगों को बुला लिया और दूल्हे बारातियों से मारपीट की। पीड़ित परिवार अपनी शिकायत लेकर थाना दोरांगला पहुंचे लेकिन वहां उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद दूल्हा बारात के साथ इंसाफ के लिए एसएसपी दफ्तर पहुंचा। वहां इंसाफ मिलने का आश्वासन मिला तो उसके बाद बारात वहां से रवाना हुई।

घटना के अगले दिन थाना दोरांगला में पीड़ित परिवार की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए पृतपाल सिंह, अमनदीप सिंह, अमृतपाल सिंह, पृतपाल सिंह, अमरिन्दर सिंह एक अज्ञात के खिलाफ मारपीट करने जाति सूचक गालियां निकालने के खिलाफ मामला दर्ज किया।

पीड़ित दूल्हा बलजिंदर निवासी गांव कुत्थी ने बताया कि एसएसपी के कहने के बाद दबाव में आकर थाना दोरांगला पुलिस ने मामला तो दर्ज कर लिया लेकिन अभी तक किसी भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया गया जबकि सभी आरोपी गांव के ही निवासी हैं तथा सरेआम घूम रहे हैं तथा हम पर राजीनामा करने का दबाव बना रहे हैं। आरोपी हमें राजीनामा करने पर परिणाम भुगतने की धमकियां भी दे रहे हैं। हमारी पुलिस प्रशासन से मांग की है कि जल्द से जल्द आरोपियों को गिरफ्तार किया जाए।

घटना सामाजिक बहिष्कार उत्पीड़न का बड़ा उदाहरण है : कैंथ

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एलायंस के अध्यक्ष परमजीत सिंह कैंथ ने कहा, “यह घटना सामाजिक बहिष्कार सामाजिक उत्पीड़न का एक प्रमुख उदाहरण है। राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति पर रोष व्यक्त करते हुए कैंथ ने राज्य सरकार और मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को राज्य में इस बिगड़ती हालत के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि कैप्टन अमरिंदर सिंह खुद जाट महासभा के अध्यक्ष हैं और अनुसूचित जातियों के खिलाफ अत्याचारों को रोकने के लिए कुछ भी नहीं कर रहे है। ऐसे राज्य में जहां बीएसएफ के सिपाही सुरक्षित नहीं हैं और इस तरह के जातिवाद को भुगतना पड़ता है, जो पूरे जीवन में याद रहता है। दलित लोगों को अब और भी अधिक खतरा महसूस हो रहा है कि एक जवान को भी ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ सकता है तो आम आदमी का क्या होगा।

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