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जालंधर से देश को मिली ज्योतिका जैसी सिंगर, पांच साल में कामयाबी की बुलंदियों तक पहुंचीं

लड़की साल 2007 में शास्त्रीय गायन के जूनियर मुकाबलों में सैकेंड रही थी।

Danik Bhaskar | Dec 17, 2017, 06:28 AM IST

जालंधर. रागदेस में ठुमरी के लिए तान लगाई ...घिर आई देखो सावन की बदरी। अगली प्रस्तुति थी - राग पीलू में - ऐसी होरी खेलो कन्हाई रे। ज्योतिका तांगड़ी ये प्रस्तुति 2013 के बाबा हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन में दे रही थी। पास ही बैठे म्यूजिक लवर जसविंदर सिंह कहते हैं : भाई साहब आपको पता है यही लड़की साल 2007 में शास्त्रीय गायन के जूनियर मुकाबलों में सैकेंड रही थी। उनकी इस एक लाइन ने महसूस करा दिया कि बाबा हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन ने पांच साल में एक कलाकार को जन्म दे दिया है। आज अपने सफर के ज्योतिका 8 साल पूरे कर चुकी है। वहीं, संगीत सम्मेलन में सालों से सेवाएं दे रहे अरुण कपूर कहते हैं : कभी एक वक्त था। यहां जो कलाकार आते थे, वो अपनी जेब से पैसे देते थे।

तीन साल पहले... पंडाल टूटा, सम्मेलन तब भी हुआ
संगीतमहासभा की प्रेसिडेंट पूर्णिमा बेरी तीन साल पुरानी बात बताती हैं। दिसंबर के शुरुआती दिनों में सम्मेलन रखा था। तभी बरसात गई। पूरा पंडाल डैमेज हो गया। हम पूरे देश के श्रोताओं को कैसे निराश कर देते। दिन-रात मेहनत हुई। पंडाल तैयार किया। तभी ये फैसला हुआ था कि सम्मेलन दिसंबर के शुरुआती दिनों में रखा जाए। कई कलाकार ये कहते हैं कि पहले दिनों में सम्मेलन हो लेकिन दिसंबर की सर्दी में सम्मेलन का अपना मजा भी है।

हरिवल्लभ संगीत महासभा के वाइस प्रेसिडेंट अरुण कपूर से सवाल होता है। इस साल सम्मेलन 142 वां है आखिर ये लंबा सफर गुजरा कैसे? जवाब मिलता है : बात सालों पुरानी है। तब हम बच्चे थे। सम्मेलन की तारीख सारे कलाकारों को बता दी जाती। श्री देवी तालाब के प्रांगण में श्रोताओं के लिए पराली बिछा दी जाती। छोटा सा मंच होता। कलाकार उस पर प्रस्तुति देते। लोग जो पैसा इनाम स्वरूप दे देते। सारे कलाकार वो सारा पैसा बाबा हरिवल्लभ की समाधि पर चढ़ा देते। ऐसा कभी आपने सुना है? जहां डेडीकेशन और समर्पण होती है, वहां हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन का सिलसिला ही पैदा होता है।

तब बात 54 साल पुरानी थी। आज कलाकारों को सभा यहां प्रस्तुति के लिए फीस देती है। कई ऐसे कलाकार भी हैं, जिनके लिए फीस मायने नहीं रखती। दशकों पहले कलाकारों के लिए श्री देवी तालाब मंदिर का लंगर होता था। वह यहां प्रस्तुति देने के साथ ही एक दूसरे को मिलने के मकसद से यहां आते थे। वह हफ्ता पहले यहां जाते। फिर इकट्‌ठे बैठकर रियाज करते। एक दूसरे से जुगलबंदी करते। वह एक दूसरे से सीखते थे। इसी से हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन बना...। सीखते और सुनाते हुए। सम्मेलन में पंडित रवि शंकर, पंडित भीमसेन जोशी, बड़े गुलाम अली खां, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया, उस्ताद अमजद अली खां सहित देश के प्रसिद्ध कलाकार हिस्सा लेते थे।

सम्मेलन ने ऐसे बनाया एक कलाकार को
छोटे से शहर जालंधर ने देश के संगीत को एक बड़ा सा सितारा दिया है। ये है प्ले बैक सिंगर ज्योतिका तांगड़ी। राजस्थान घराने के धरमिंदर कत्थक ने अपनी शिष्या ज्योतिका तांगड़ी को बाबा हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन के जूनियर क्लासिकल म्यूजिक के मुकाबलों के लिए प्रेरित किया। तब साल 2007 था। शहर के भावी कलाकारों के लिए ये बहुत बड़ा मंच बन रहा था। ज्योतिका इसमें जीतीं। ये सफर साल 2013 तक जारी रहा। तब ज्योतिका को मंच से राग मल्हार पर प्रस्तुति देने के लिए मौका मिला। जब वह गा रही थीं तो बरसात भी शुरू हो गई। वो दिन आज तक श्रोता याद करते हैं। ज्योतिका इन दिनों मुंबई में है। वह कुछ दिन के लिए जालंधर आईं थीं। तभी उन्होंने कहा - मुझे जालंधर ने पहचान दी है। मैंने गुरु कत्थक जी से कत्थक डांस, वॉयलिन, वोकल सीखा। हरिवल्लभ ने मुझे पहचान दी। कॉन्फिडेंस दिया। जिसके बाद वॉयस इंडिया, सारेगामापा की फाइनलिस्ट रही। ज्योतिका बताती है कि पिता के देहांत के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी मां भावना तांगड़ी पर थी। बड़ा भाई पुलकित तांगड़ी विदेश में था, ऐसे में घर चलाना और पढ़ाई का सारा खर्च मां ने उठाया उन्होंने कभी म्यूजिक में किसी चीज की कमी नहीं होने दी।