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मंदबुद्धि बेटी को पढ़ाने में परेशानी आई तो ऐसे बच्चों के लिए बनाया स्पेशल स्कूल

इस स्कूल में पढ़ाई के लिए छोड़ा जाए ताकि ऐसे बच्चे भी पढ़-लिखकर बेहतर जिंदगी गुजार सकें।

Danik Bhaskar | Jan 01, 2018, 04:39 AM IST

बटाला. घर में पैदा हुई मंदबुद्धि बच्ची को पढ़ाने के लिए मुश्किलें आईं तो माता-पिता ने मंदबुद्धि बच्चों के लिए स्कूल खोल दिया। अब इस खास स्कूल में केवल अपनी ही नहीं बल्कि पूरे जिले के बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। साथ ही, गांव-गांव जाकर लोगों से कहा जा रहा है कि अगर उनकी नजर में कोई मंदबुद्धि बच्चा है तो उसे इस स्कूल में पढ़ाई के लिए छोड़ा जाए ताकि ऐसे बच्चे भी पढ़-लिखकर बेहतर जिंदगी गुजार सकें।

बटाला के उमरपुरा-जालंधर रोड बाईपास पर स्थित जैसमीन स्कूल फॉर डेफ मास्टर लाल सिंह एजूकेशन चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से चलाया जा रहा है। यह बटाला में इकलौता ऐसा स्कूल है जहां मंदबुद्धि बच्चों को सांकेतिक भाषा के जरिए पढ़ाया जाता है। इस समय स्कूल में 20 स्टूडेंट्स हैं, जोकि शहर के अलग-अलग इलाकों से यहां पढ़ने आते हैं। स्कूल की संचालिका रमनदीप कौर ने बताया कि उनकी बेटी जैसमीन कौर इस स्कूल में चौथी कक्षा में पढ़ती है जो मंदबुद्धि है। उन्होंने बताया कि यह स्कूल खोलने से पहले जैसमीन की पढ़ाई के लिए उन्हें कभी अमृतसर तो कभी जालंधर चक्कर लगाने पड़े, लेकिन उसे पढ़ाने में मुश्किल रही थी। इस बात की परेशानी को गंभीरता से लेते हुए उन्हें ऐसी बच्चों और उनके माता-पिता की परेशानी का ख्याल आया कि अगर उन्हें इस तरह की परेशानी झेलनी पड़ रही है तो बाकी बच्चों के पेरेंट्स को भी दिक्कत आती होगी।

बस, इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने एक ऐसा स्कूल बनाने का सपना बना लिया जहां मंदबुद्धि बच्चों को पढ़ाया जा सके।
स्कूल में गरीब बच्चों से कोई फीस नहीं ली जाती। हां, अगर कोई अच्छे परिवार से हो तो उससे नाममात्र फीस ली जाती है। कारण यह है कि बच्चों को पढ़ाने के लिए लगाए गए अध्यापकों को हर माह वेतन देना पड़ता है। रमनदीप कौर के पति जसकुंवरपाल सिंह पेशे से वकील हैं। इस स्कूल को बनाने के लिए उन्होंने अपनी पत्नी की पूरी मदद की, क्योंकि माता-पिता के दिल में केवल एक ही बात थी कि जिस तरह से उन्होंने अपनी बेटी के उज्जवल भविष्य को बनाने के लिए दरबदर होना पड़ा, उस तरह बाकी बच्चों को होना पड़े।

मकान के निचले हिस्से को तब्दील कर दिया स्कूल में
रमनदीप कौर ने अपनी सोच को साकार रूप देते हुए अपने मकान के निचले हिस्से को स्कूल में तब्दील कर दिया। 4 कमरों के इस स्कूल में प्ले-ग्राउंड भी है और बिल्डिंग के ऊपर के हिस्से में उनका परिवार रहता है। तीन अध्यापक बच्चों को सांकेतिक भाषा में पढ़ाते हैं।